Wednesday, February 2, 2011

खतरनाक खेल में लगे हैं कुछ तिब्बती शरणार्थी


डेजौन, मॉनपा, तवां, खुन..आदि आदि! ये चीन या तिब्बत के नहीं वरन भारत के इलाके हैं। मॉनपा यानी अरुणाचल प्रदेश, डेजौन यानी सिक्किम और हिमाचल प्रदेश का किन्नौर जिला यानी खुन। देश के सीमावर्ती राज्यों व जिलों का अब तिब्बती भाषा में नामकरण हो गया है। बीते दिनों सारनाथ में दलाईलामा के प्रवास के दौरान बौद्ध धर्मावलंबियों में से कुछ से वार्ता के बाद कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। अब तो इन क्षेत्रों को तिब्बत का ही मूल भाग बताया जा रहा है और वहां के निवासियों को तिब्बती मूल का। यह मुहिम सिर्फ चीन ही नहीं चला रहा, बल्कि तिब्बत से निर्वासित होकर भारत में रह रहे कई तिब्बती समूह व मठ भी इसमें जी-जान से लगे हुए हैं। धर्मशाला में करमापा के ठिकाने से विदेशी मुद्रा का भंडार पकड़ में आने के बाद इस मुहिम के पीछे भी विदेशी ताकतों का हाथ होने का संदेह जताया जाने लगा है। तिब्बत पर चीन के आक्रमण के बाद वहां से निर्वासित लोगों ने भारत में शरण ली। भारत में ये लोग अपनी संस्कृति को सहेजने का खासा जतन कर रहे हैं लेकिन इनके बीच कई ऐसे भी हैं जो तिब्बत को चीन से स्वतंत्रता दिलाने की जगह भारतीय भागों को ही तिब्बत का बताने की मुहिम छेड़े हैं। ये लोग सभी पर्वतीय क्षेत्रों पर दावा ठोंक रहे हैं और चीन की ही तर्ज पर इन्हें तिब्बत का मूल भाग बता रहे हैं। इनकी मानें तो लेह-लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश व सिक्किम तक कभी तिब्बत के भाग व प्रांत हुआ करते थे। इस मुहिम को भारत के कुछ सीमावर्ती पर्वतीय जिलों में तिब्बत में बोली जाने वाली भाषा से मिलती-जुलती भोट भाषा के चलन के कारण खासा बल मिला है। इस भाषाई समानता के आधार पर तिब्बत से निर्वासित धर्मगुरुओं ने इन क्षेत्रों में अपना डेरा जमा लिया और वहां से अन्य पर्वतीय क्षेत्रों में फैल गए। इस समय तिब्बतियों द्वारा संचालित मठों में 90 प्रतिशत छात्र व भिक्षु इन्हीं क्षेत्रों के हैं। मठों में पढ़ाई भोट भाषा में ही कराई जाती है। साथ ही बताया जा रहा है कि उनका मूल भारत नहीं, तिब्बत है। एससी-एसटी आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष व राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व सदस्य लामा चोसेल जोपा के अनुसार देश में बौद्ध धर्म व अनुयायियों से जुड़ी हर चीज को तिब्बत का बताने की मुहिम चल रही है। पहाड़ में सदियों से बोली जाने वाली भोट भाषा को तिब्बती भाषा कहा जा रहा है। यहां के परंपरागत ज्ञान जिसमें स्वरिपा के नाम से प्रसिद्ध आयुर्वेद ज्ञान भी शामिल है को तिब्बत का बताया जा रहा है। केंद्र सरकार ने हाल ही में स्वरिपा को मान्यता दी है। उनके अनुसार इस मुहिम के लिए केंद्र सरकार ही जिम्मेदार है। 


No comments:

Post a Comment