चीन सिर्फ सस्ते सामान ही नहीं, अपने जासूस भी दुनिया भर में निर्यात कर रहा है। चीनी सामानों की तरह ही ये जासूस भी दुनिया के लिए सिरदर्द बन रहे हैं। इनसे सावधान रहने की जरूरत है
इस घटना को कोई बहुत ज्यादा वक्त नहीं हुआ है, लेकिन भारत सहित कई देशों की खुफिया एजेंसियों के कर्ताधर्ता आज भी इस घटना से सिहरे हुए हैं। हाल ही में भारत समेत 103 देशों की सरकारें एक मालवेयर (बदनीयती से छोड़ा गया सॉफ्टवेयर) के हमले के असर का अंदाजा लगाने के लिए इकट्ठा हुई थीं। कनाडा स्थित एक इन्फॉर्मेशन वारफेयर मॉनीटर (आय. डब्ल्यू. एम) नामक एक रिसर्च संगठन द्वारा 10 महीनों के शोध व अनुसंधान के बाद तैयार की गई रिपोर्ट के अनुसार हमला चीन में स्थित चार सर्वरों से हुआ था। बदनीयती से छोड़ा गया यह मालवेयर 103 देशों के उन 1295 कंप्यूटरों में प्रवेश कर गया था, जिनमें सरकारी गोपनीय जानकारियां थीं। घोस्ट रैट नामक यह मालवेयर प्रभावित कंप्यूटरों में न सिर्फ टेक्स्ट फाइलें, बल्कि कुंजियों के दबाव की भी जानकारी हासिल कर सकता था। साथ ही, वीडियो और ऑडियो रेकॉर्ड कर और भी काफी कुछ कर सकता था।
चीन की सरकार ने इस बात से इंकार किया कि उनका इस हमले से कुछ भी लेना देना है, लेकिन सायबर युद्ध (वारफेयर) के अधिकांश विश्लेषक उक्त रिपोर्ट की मूलभूत खोजों से काफी भयभीत हैं। पहली खोज तो यह है कि मालवेयर का पता दो साल तक नहीं चला और कई कंप्यूटर तभी से रोगग्रस्त थे। दूसरा यह कि इस मालवेयर का पता और भी कई सालों तक नहीं चलता अगर आय. डब्ल्यू.एम. इसका खुलासा नहीं करता।
इस घटना से यह जाहिर होता है कि चीन ने अपना खुफियागीरी का तरीका बदल दिया है और दूसरे देशों के लिए चीन की खुफिया गतिविधियों पर ध्यान दे पाना तकरीबन असंभव हो गया है। चीन पर नजर रखने वालों के अनुसार भारत के लिए यह अच्छी-खासी चिंता का विषय है।
वैसे भी चीन के खुफिया तंत्र की थाह पाना मुश्किल काफी मुश्किल काम रहा है। पेश है इसका एक उदाहरण- पिछले दिनों महीने भर की मेहनत के बाद तीन चीनी जासूस आंतरिक खुफिया एजेंसी इंटेलिजेंस ब्यूरो के हाथ लगे। अफसरों की उम्मीदें आसमान छू रही थीं कि उन्हें जानकारियों का खजाना मिलेगा, लेकिन उनके उत्साह पर घड़ों पानी पड़ते देर न लगी। उनका मुंह खुलवाने की सारी कोशिशें नाकाम रहीं। काफी थर्ड डिग्री देने के बावजूद उन्होंने कुछ नहीं कबूला। अधिकारियों को शक था कि वे तीनों दलाई लामा पर नजर रखने के इरादे से मैक्लियोड्गंज आए थे। लेकिन अधिकारी यह जानकर अवाक् रह गए कि उन्हें आधुनिक हथियार तकनीक के बारे में कुछ भी मालूम नहीं था। शायद उन्हें केवल दलाई लामा की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए प्रशिक्षित किया गया था, जो चीनियों के लिए भविष्य में उपयोगी होती। चीनी जासूस होने के शक में पकड़े गए वे तीनों तिब्ब्ती आई.बी के अफसरों के लिए एक पहेली साबित हुए। उन्हें सी.आई.ए. के एक अधिकारी की बात याद आई-‘चीनी खुफियागिरी का तरीका जासूसी का सर्वाधिक असाधारण और जटिल तरीका है। चीनी एजेंट रातोंरात 180 डिग्री की मुड़कनी खा सकते है।’
गुप्तचरी की इस अनोखी चीनी शैली को समझने के लिए पिंग फा नामक पुस्तक का अध्ययन बहुत जरूरी है। इसे चीनी जासूसी की बाइबिल का दर्जा दिया गया है, पिंग फा यानी युद्ध के सिद्धांत। गुप्तचरी पर लिखी गई इस प्राचीनतम पुस्तक की रचना ईसा से 590 वर्ष पूर्व सुन त्सू नामक चीनी जनरल ने की थी। पिंग फा में गुप्तचरों को चार वर्गों में बांटा गया है- स्थानीय गुप्तचर, आंतरिक गुप्तचर, परिवर्तित गुप्तचर और अभिशप्त गुप्तचर। स्थानीय गुप्तचर शत्रु देश में जाकर अपने सद्व्यवहार से जीत कर गुप्तचरी के लिए तैयार करता हैं। आंतरिक गुप्तचर शत्रु के नागरिक और सैन्य अधिकारियों में घुसपैठ कर जानकारी के स्रोत के रूप में उनका उपयोग करता है। परिवर्तित गुप्तचर उसे कहते हैं, जो कभी शत्रु के लिए काम करता था लेकिन बाद में उसे रिश्वत या किसी अन्य प्रलोभन के माध्यम से तोड़ कर इस तरफ मिला लिया गया। अब वह अपने देशवासियों के खिलाफ काम करता है और झूठी खबरें पहुंचाता है। अभिशप्त गुप्तचर वह है जो दुश्मन की गिरफ्त में आकर उसे गलत और भ्रामक जानकारी दे।
खुफियागिरी के जानकारों का कहना है कि चीनी गुप्तचरी में दल बदल नाम की कोई चीज है ही नहीं। सी आय ए जैसी सर्वाधिक पेशेवर समझी जाने वाली अमरीकी खुफिया एजेंसी को भी चिन का पता लगाने में तकरीबन 30 साल लगे। चिन वह चीनी था, जिसे सी आय ए ने चीन के खिलाफ जासूसी के लिए बतौर अमरीकी एजेंट भर्ती किया था।
कांग शेंग चीन के एक जीनियस जासूस थे। उनके निर्देशानुसार ही चीनी खुफियागीरी सेवा का विस्तार और नवीनीकरण कर इसे आधुनिक बनाया गया। इसके पहले इसका नाम केंद्र्रीय बाह्य संपर्क विभाग (सेंट्रल एक्स्टर्नल लायेजन डिपार्टमेंट) था। कांग शेंग शंघाई के एक कॉलेज के छात्र थे और तभी उन्होंने स्वयं की एक गुप्तचर व्यवस्था विकसित कर सेंट्रल यूनिट को काफी महत्वपूर्ण वांछित जानकारियां उपलब्ध करवाई थीं। 1933 में उन्हें उनके आकाओं ने रूसी खुफिया एजेंसी के.जी.बी. के खुफिया तंत्र का अध्ययन करने मॉस्को भेजा था। बाद में वे चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की कार्यसमिति के सदस्य हो गए और मात्र चार सालों में पार्टी की खुफिया इकाई के प्रमुख के पद पर जा बैठे। बाद के वर्षों में च्यांग काई शेक के शासनकाल में वे अपने एजेंटों को मॉस्कों में स्थापित करने में सफल रहे। उनसे उन्हें कई महत्वपूर्ण जानकारियां मिलती रहीं, जिनके आधार पर उन्होंने खुली घोषणा कर दी कि चीन के लिए रूस विश्वसनीय नहीं है। जब चीन और रूस का विवाद गहराया, तो चीन ने मॉस्को के खिलाफ जानकारी की अदला बदली करने की अमरीकी आवश्यकता का भरपूर फायदा भी उठाया। खुफिया केंद्र, उपग्रह एकत्रीकरण, कंप्यूटर डाटा और इंसानी मदद - इन सब का लाभ अमरीका के मुकाबले चीन को अधिक था।
अमरीका को आखिर तक यह समझ में नहीं आया कि उसे गलत जानकारी दी जा रही है। जब रूस ने चीन को प्राग स्थित यूरोपीय जासूसी मुख्यालय से निकाल बाहर किया तो चीन ने यूरोपीय देशों पर नजर रखने के लिए अल्बानिया को अपना आधार बनाया। उसने बर्न में भी एक खुफिया केंद्र स्थापित किया। चीन की गुप्तचर व्यवस्था हेग, पेरिस और जेनेवा में भी अच्छी चली। वियेना में चीन यूराटम एजेंसी के माध्यम से यूरोप के आणविक रहस्यों को हथियाने में सफल रहा।
बहरहाल मालवेयर हमले का जहां तक सवाल है, आय डब्ल्यू एम के शोधकर्ता उसे महज एक निगरानी मिशन मान रहे है। उनका कहना है कि इस हमले की शुरुआत यह पता लगाने के लिए हुई कि दलाई लामा और तिब्बत के अन्य निर्वासित नेता क्या कर रहे हैं, वे किन-किन देशों से संपर्क में हैं और उनके मददगार कौन-कौन हैं, उन्हें कौन-कौन से देश समर्थन दे रहे हैं। सही मायनों में तो सरकारी नेटवर्कों को रोगग्रस्त बना देने वाला मालवेयर सारी जानकारियां चीन के उन चार सर्वरों को भेज रहा था।
एक दिलचस्प किस्सा जासूसी की दुनिया में काफी मजे ले-ले कर सुनाया जाता है। खबर मिली कि मियामी समुद्रतट पर रेत के कणों में कुछ रहस्य छिपे हुए हैं, तो रूसी क्या करेंगे? रात के अंधेरे में एक रूसी पनडुब्बी समुद्रतट पर आएगी, उसमें से एक रूसी उतरेगा और एक बाल्टी में रेत भर कर लौट जाएगा, पनडुब्बी जिस खामोशी से आई थी, उसी तरह गायब हो जाएगी। अमरीकी क्या करेंगे? सबसे पहले वे रेत के उपग्रह चित्र हासिल करेंगे, फिर उनकी विश्लेषणात्मक रिपोर्ट सेंट्रल इंटेलिजेंस के डायरेक्टर को भेजी जाएगी, वे उसे व्हाइट हाउस भेजेंगे। ओवल ऑफिस में फैसला हो जाने के बाद एक हेलिकॉप्टर उस जगह पर भेजा जाएगा, फिर एक अमरीकी उस रेत के कुछ नमूने उठाएगा, जिन्हें केमिकल एनालिसिस के लिए लेबोरेटरी में भेजा जाएगा।...और चीनी क्या करेंगे? करीब दस लाख चीनी पर्यटकों के भेस में मियामी समुद्रतट पर टूट पड़ेंगे। हर चीनी अपनी जेबें रेत से भर लेगा। उसी शाम वे वहां से रवाना हो जाएंगे। दूसरे दिन दुनिया को पता चलेगा कि मियामी बीच पर रेत का एक भी कण नहीं बचा है!
पकड़े जाते हैं, पर बाज नहीं आते
कुछ दिनों पहले ही बहराइच में सशस्त्रसीमा बल के कैंपों की फोटो लेते तीन चीनी नागरिक जासूस होने के शक में गिरफ्तार हुए। संदेह और पुख्ता तब हुआ, जब उनके पास एक भारतीय पैन कार्डनिकला। तीनों को चीनी सरकार की ओर से आएएक वक्तव्य में केवल पर्यटक बताया गया। जबकि उन तीनों, एक महिला, दो पुरुष, का कहना था कि वे नेपाल में चीनी टेलीकम्युनिकेशन कंपनी के मोबाइल टावर्स इंस्टालेशन से संबंधित इंजीनियर हैं और गलती से घूमते-घामते भारतीय सीमा में आ पहुंचे।मई 2010 को अरुणाचल प्रदेश के ईटानगर में गुआन लिआंग नाम के युवक को चीनी जासूस होने के शक के तहत गिरफ्तार किया गया। कहा जाता है कि अरुणाचल प्रदेश में पर्यावरविद्, शोधकर्ता या सामाजिक कार्यकर्ता बनकर चीनी ही नहीं कई देशों के जासूस आराम से आते-जाते रहते हैं। 2009 में दलाई लामा के अरुणाचल आगमन के दौरान इस इलाके से ही एक और चीनी जासूस के पकड़े जाने की खबर थी।
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