Wednesday, February 2, 2011

बलूचिस्तान का संकट


पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग का कहना है कि बलूचिस्तान गृहयुद्ध के कगार पर खड़ा है। पिछले साल वहां सौ से भी अधिक सड़ी-गली लाशें बरामद हुई थीं, और तीन सौ से अधिक लोग अब भी लापता हैं। नाटो के टैंकर्स को आग के हवाले करना तो वहां रोज का काम है।
बलूचिस्तान के इस हालात से कई सवाल उभरते हैं। गायब लोग कहां गए? वहां हत्याएं कौन कराता है? इन सबके पीछे भारतीय और पाकिस्तानी एजेंसियों में से किसका हाथ है? क्या मौजूदा समस्याओं का कोई समाधान है?
जीवन के हर क्षेत्र में बलूचियों को उपेक्षित ही किया गया। यह एक प्रासंगिक प्रश्न है कि पाकिस्तान की नौकरशाही, सेना और सार्वजनिक क्षेत्र में कितने बलूची हैं। सूई से जो राजस्व बलूचिस्तान को मिलता है, वह नाकाफी है, ग्वादर बंदरगाह पर बलूचियों का नियंत्रण नहीं है, बलूचियों की जमीन लगातार पंजाबियों के कब्जे में जा रही है, वहां के कीमती खनिजों का विदेशी एजेंसियां उत्खनन कर रही हैं। बलूचियों के इस शोषण को देखकर सहसा (तत्कालीन) पूर्व पाकिस्तान के दुर्भाग्य की याद आती है। हालांकि दोनों में फर्क है। बलूचिस्तान में आदिवासियों के जो विभिन्न कबीले हैं, उनमें आपसी स्वार्थ इतने ज्यादा हैं कि उनसे एकता और उस बंगाली राष्ट्रवाद की उम्मीद नहीं की जा सकती, जिसने अलग बांग्लादेश के गठन का रास्ता प्रशस्त किया।
वर्ष 2000 में पाकिस्तान के सैनिक शासक ने जहां बलूचियों के शोषण की अति कर दी, वहीं उन्हें उनके जायज आर्थिक लाभ से भी वंचित कर दिया। जब बुग्ती जनजाति ने सूई की रॉयल्टी और पाकिस्तान पेट्रोलियम के ठेके में से अपने हक के लिए आंदोलन शुरू किया, तो इसलामाबाद ने सैनिक कार्रवाई की धमकी दी। 2002 के चुनाव में पाक सरकार ने वहां के धार्मिक नेताओं को तरजीह देकर आदिवासी सरदारों, मुख्यधारा के राजनेताओं और मध्य वर्ग को सत्ता में हिस्सेदारी से सीधे-सीधे वंचित कर दिया। फिर सैन्य कार्रवाई के जरिये नवाब अकबर बुग्ती की हत्या ने मारी, मंगेल और बुग्ती कबीलों को इसलामाबाद के खिलाफ संघर्ष के लिए एकजुट कर दिया।
आजाद बलूचिस्तान के लिएअलगाववादी आंदोलन संभव नहीं है, क्योंकि आधुनिक राष्ट्र-राज्य अपनी संप्रभुता की रक्षा में कहीं ज्यादा हिंसक है। ऐसे में बलूचियों का आंदोलन उनके दमन को ही न्योता देगा। केवल विदेशी हस्तक्षेप और जंग की स्थिति में ही बलूचियों का सपना सच हो सकता है, लेकिन भारत पाकिस्तान, दोनों के परमाणु शक्तिसंपन्न होने के कारण आज जंग की आशंका कम है।
ऐसे में समाधान क्या है? क्या राजनीतिक स्वायत्तता, आर्थिक विकास और मुख्यधारा में भागीदारी के इसलामाबाद के वायदों पर बलूची यकीन कर लेंगे? कतई नहीं। वे शांत तभी होंगे, जब या तो बाहरी शोषण से उन्हें मुक्ति मिलेगी या अफगानिस्तान में उनका समर्थन खत्म हो जाएगा। इसलामाबाद भी चाहता है कि बलूचियों को मिलने वाला समर्थन खत्म हो। लेकिन यह इतना आसान नहीं है। ऐसा तभी होगा, जब इसलामाबाद और नई दिल्ली तथा इसलामाबाद और काबुल के बीच विवाद पूरी तरह खत्म हो। इस लिहाज से देखें, तो बलूचिस्तान के समाधान का रास्ता फिलहाल बहुत लंबा दिखाई देता है।


No comments:

Post a Comment