पिछले एक सप्ताह से विश्व की निगाहें मिश्च में चल रहे विद्रोह पर टिकी हैं। लाखों निहत्थे नौजवान हथियारबंद पुलिस पर कटाक्ष कर रहे हैं और राष्ट्रव्यापी कफ्र्यू का खुलेआम मखौल उड़ा रहे हैं। पंथिक आग्रहों को छोड़कर यह विद्रोह 1978-79 में ईरान में हुए बलवे की याद दिलाता है, जब संगठित भीड़ के आक्रोश के आगे पहलवी वंश के खूंखार सुरक्षा दस्ते बेअसर हो गए थे और उनका तख्ता पलट कर दिया गया था। तीन दिन की क्रांति ने स्पष्ट संदेश दे दिया है कि राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक अब इतिहास बन गए हैं। काहिरा में सत्ता पीठ से मुबारक की औपचारिक विदाई शायद तुरंत न हो। अधिसत्ता के शासक इतनी आसानी से हार नहीं मानते हैं। ईरान के शाह की तरह, जिन्होंने अपरिहार्य स्थितियों को टालने के लिए उदारवादी विपक्षी नेता शपूर बख्तियार को नियुक्त कर दिया था, मुबारक भी उन लोगों के साथ सामंजस्य बैठाने की पहल कर सकते हैं जिन्हें वह जनता की असल मुसीबतें घोषित कर चुके हैं। उनके लिए समस्या यह है कि इसमें पहले ही काफी देर हो चुकी है। यहां तक कि वाशिंगटन भी सत्ता परिवर्तन के पक्ष में मूड बना चुका है। कमजोर पड़ गया अमेरिका जानता है कि उसके पास मिश्च में खेलने के लिए अधिक पत्ते नहीं हैं। एकमात्र उम्मीद वह यह कर सकता है कि मुबारक जल्द से जल्द गद्दी छोड़ें, जल्द से जल्द उदारवादी सत्ता पर काबिज हों और यह सुनिश्चित हो कि मिश्च पश्चिम एशिया का एक और कट्टर दुर्ग न बन जाए। मिश्च को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता इस बात को लेकर भी है कि कहीं यह कट्टरपंथी इस्लामी शक्तियों की गिरफ्त में न आ जाए और पश्चिम एशिया में महत्वपूर्ण संतुलन को गड़बड़ा न दे। यह डर पूरी तरह निराधार नहीं है। जींस पहने हुए नौजवानों के प्रदर्शनों को देखकर लगता है कि मिश्च में फूटा यह विद्रोह मोर्चेबंदी का फेसबुक संस्करण है और यह 1968 में पश्चिमी यूरोप में छात्र आंदोलन सरीखा है, किंतु इन प्रदर्शनों में प्रत्यक्ष पंथिक प्रतीकों की अनुपस्थिति के बावजूद लोगों को परेशान करने वाले दो तथ्यों की तरफ से आंखें नहीं मूंदनी चाहिए। पहला यह कि 1981 में मुबारक वंश के विरोधी राष्ट्रपति अनवर सादात की हत्या के पीछे ऐसे लोगों का हाथ था जो उदारवादी और उग्रवादी, दोनों रूपों में जाने जाते थे। नागरिक समाज में गहरी पैठ रखने वाला द मुस्लिम ब्रदरहुड परंपरागत और सर्वाधिक संगठित विपक्ष है। यह संगठन पिछले दो दशकों में हिंसा त्याग चुका है और हालिया घटनाओं में नेतृत्वकारी भूमिका के बजाय प्रदर्शनों को समर्थन देने की नीति पर चल रहा है। इसके अलावा वहां ओसामा बिन लादेन के नायब अल जवाहिरी के नेतृत्व में उग्र इस्लामिक प्रतिरोध भी जारी है। पश्चिम के लिए यह मानना आसान है कि उदारवादी विपक्षी नेता जैसे नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद अलबरदेई इस्लामिक विपक्ष के बगैर ही वैकल्पिक समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। पिछले सप्ताह अलबरदेई ने जोरदारी से इखवान की वकालत की, हमें इखवान की विशेषताओं को पहचानना चाहिए। इसने पिछले पांच दशकों से कोई हिंसा नहीं की है। यह भी बदलाव चाहता है। अगर हम लोकतंत्र और स्वतंत्रता चाहते हैं तो हमें इसे हाशिये पर धकेलने के बजाय मुख्यधारा में लाना चाहिए। दुर्भाग्य से अलबरदेई के इस समावेशी संदेश के अधिक कद्रदान नहीं हैं। पिछले सप्ताह मौलाना अबु उमर ने विलाप किया, अलबरदेई और उन जैसे लोगों का इस्लाम से कोई नाता नहीं है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि पंथनिरपेक्ष मिश्च के विचार को तथाकथित अरब स्ट्रीट से स्वीकृति मिलनी बाकी है। इतना ही अशुभ यह तथ्य है कि मुबारक की अधिक आलोचना फलस्तीन को लेकर उनके कथित विश्वासघात और इजरायल के प्रति उदार रवैया अपनाने को लेकर की जाती है। नौजवान प्रदर्शनकारियों में से अनेक का संबंध उदारवादी किफाया आंदोलन से है, जो घोर इजरायल विरोधी है। वे सादात और मुबारक की विदेश नीति को बदलना चाहते हैं। इस दृष्टि से मिश्च सीरिया और ईरान के करीब आ जाएगा और पश्चिम एशिया की नाजुक शांति के लिए खतरा बन जाएगा। अंतत: मिश्च का भविष्य मिश्चवासियों के हाथों में ही रहना है। मिश्च एक ऐसा देश है जिसने उदार लोकतंत्र का स्वाद नहीं चखा है। दमन और पूंजीवादी मुबारक शासन के खिलाफ उनका गुस्सा समझ में आता है, किंतु बदलाव के हश्र का सही अनुमान नहीं लगाया जा सकता और मिश्च के भविष्य में ट्यूनीशिया और म्यांमार के भविष्य से अधिक खतरे निहित हैं। मुबारक बाद के मिश्च के बारे में कुछ भी अनुमान नहीं लगाया जा सकता। अनेक संभावनाएं हैं। अच्छाई कभी भी बुराई में बदल सकती है। ईरान के अनुभव से चेतावनी मिल चुकी है कि जन विद्रोह के माध्यम से नफरत भरे शासन को पलटने का हमेशा बेहतर नतीजा नहीं निकलता। इतिहास हमेशा मानव कल्याण की गाथा नहीं कहता। आगे बढ़ा एक कदम अकसर दो कदम पीछे ले जाता है। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)
Wednesday, February 2, 2011
मिश्च में बगावत का मतलब
पिछले एक सप्ताह से विश्व की निगाहें मिश्च में चल रहे विद्रोह पर टिकी हैं। लाखों निहत्थे नौजवान हथियारबंद पुलिस पर कटाक्ष कर रहे हैं और राष्ट्रव्यापी कफ्र्यू का खुलेआम मखौल उड़ा रहे हैं। पंथिक आग्रहों को छोड़कर यह विद्रोह 1978-79 में ईरान में हुए बलवे की याद दिलाता है, जब संगठित भीड़ के आक्रोश के आगे पहलवी वंश के खूंखार सुरक्षा दस्ते बेअसर हो गए थे और उनका तख्ता पलट कर दिया गया था। तीन दिन की क्रांति ने स्पष्ट संदेश दे दिया है कि राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक अब इतिहास बन गए हैं। काहिरा में सत्ता पीठ से मुबारक की औपचारिक विदाई शायद तुरंत न हो। अधिसत्ता के शासक इतनी आसानी से हार नहीं मानते हैं। ईरान के शाह की तरह, जिन्होंने अपरिहार्य स्थितियों को टालने के लिए उदारवादी विपक्षी नेता शपूर बख्तियार को नियुक्त कर दिया था, मुबारक भी उन लोगों के साथ सामंजस्य बैठाने की पहल कर सकते हैं जिन्हें वह जनता की असल मुसीबतें घोषित कर चुके हैं। उनके लिए समस्या यह है कि इसमें पहले ही काफी देर हो चुकी है। यहां तक कि वाशिंगटन भी सत्ता परिवर्तन के पक्ष में मूड बना चुका है। कमजोर पड़ गया अमेरिका जानता है कि उसके पास मिश्च में खेलने के लिए अधिक पत्ते नहीं हैं। एकमात्र उम्मीद वह यह कर सकता है कि मुबारक जल्द से जल्द गद्दी छोड़ें, जल्द से जल्द उदारवादी सत्ता पर काबिज हों और यह सुनिश्चित हो कि मिश्च पश्चिम एशिया का एक और कट्टर दुर्ग न बन जाए। मिश्च को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता इस बात को लेकर भी है कि कहीं यह कट्टरपंथी इस्लामी शक्तियों की गिरफ्त में न आ जाए और पश्चिम एशिया में महत्वपूर्ण संतुलन को गड़बड़ा न दे। यह डर पूरी तरह निराधार नहीं है। जींस पहने हुए नौजवानों के प्रदर्शनों को देखकर लगता है कि मिश्च में फूटा यह विद्रोह मोर्चेबंदी का फेसबुक संस्करण है और यह 1968 में पश्चिमी यूरोप में छात्र आंदोलन सरीखा है, किंतु इन प्रदर्शनों में प्रत्यक्ष पंथिक प्रतीकों की अनुपस्थिति के बावजूद लोगों को परेशान करने वाले दो तथ्यों की तरफ से आंखें नहीं मूंदनी चाहिए। पहला यह कि 1981 में मुबारक वंश के विरोधी राष्ट्रपति अनवर सादात की हत्या के पीछे ऐसे लोगों का हाथ था जो उदारवादी और उग्रवादी, दोनों रूपों में जाने जाते थे। नागरिक समाज में गहरी पैठ रखने वाला द मुस्लिम ब्रदरहुड परंपरागत और सर्वाधिक संगठित विपक्ष है। यह संगठन पिछले दो दशकों में हिंसा त्याग चुका है और हालिया घटनाओं में नेतृत्वकारी भूमिका के बजाय प्रदर्शनों को समर्थन देने की नीति पर चल रहा है। इसके अलावा वहां ओसामा बिन लादेन के नायब अल जवाहिरी के नेतृत्व में उग्र इस्लामिक प्रतिरोध भी जारी है। पश्चिम के लिए यह मानना आसान है कि उदारवादी विपक्षी नेता जैसे नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद अलबरदेई इस्लामिक विपक्ष के बगैर ही वैकल्पिक समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। पिछले सप्ताह अलबरदेई ने जोरदारी से इखवान की वकालत की, हमें इखवान की विशेषताओं को पहचानना चाहिए। इसने पिछले पांच दशकों से कोई हिंसा नहीं की है। यह भी बदलाव चाहता है। अगर हम लोकतंत्र और स्वतंत्रता चाहते हैं तो हमें इसे हाशिये पर धकेलने के बजाय मुख्यधारा में लाना चाहिए। दुर्भाग्य से अलबरदेई के इस समावेशी संदेश के अधिक कद्रदान नहीं हैं। पिछले सप्ताह मौलाना अबु उमर ने विलाप किया, अलबरदेई और उन जैसे लोगों का इस्लाम से कोई नाता नहीं है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि पंथनिरपेक्ष मिश्च के विचार को तथाकथित अरब स्ट्रीट से स्वीकृति मिलनी बाकी है। इतना ही अशुभ यह तथ्य है कि मुबारक की अधिक आलोचना फलस्तीन को लेकर उनके कथित विश्वासघात और इजरायल के प्रति उदार रवैया अपनाने को लेकर की जाती है। नौजवान प्रदर्शनकारियों में से अनेक का संबंध उदारवादी किफाया आंदोलन से है, जो घोर इजरायल विरोधी है। वे सादात और मुबारक की विदेश नीति को बदलना चाहते हैं। इस दृष्टि से मिश्च सीरिया और ईरान के करीब आ जाएगा और पश्चिम एशिया की नाजुक शांति के लिए खतरा बन जाएगा। अंतत: मिश्च का भविष्य मिश्चवासियों के हाथों में ही रहना है। मिश्च एक ऐसा देश है जिसने उदार लोकतंत्र का स्वाद नहीं चखा है। दमन और पूंजीवादी मुबारक शासन के खिलाफ उनका गुस्सा समझ में आता है, किंतु बदलाव के हश्र का सही अनुमान नहीं लगाया जा सकता और मिश्च के भविष्य में ट्यूनीशिया और म्यांमार के भविष्य से अधिक खतरे निहित हैं। मुबारक बाद के मिश्च के बारे में कुछ भी अनुमान नहीं लगाया जा सकता। अनेक संभावनाएं हैं। अच्छाई कभी भी बुराई में बदल सकती है। ईरान के अनुभव से चेतावनी मिल चुकी है कि जन विद्रोह के माध्यम से नफरत भरे शासन को पलटने का हमेशा बेहतर नतीजा नहीं निकलता। इतिहास हमेशा मानव कल्याण की गाथा नहीं कहता। आगे बढ़ा एक कदम अकसर दो कदम पीछे ले जाता है। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)
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