प्रगीथ एकनेलिगोडा, जो श्रीलंका के एक मशहूर राजनीतिक कार्टूनिस्ट थे, उन्हें गायब हुए एक साल बीत गया। 24 जनवरी 2010 को कोलंबो के एक अतिसुरक्षित इलाके से उनका अपहरण हुआ था, जबकि राष्ट्रपति पद के चुनावों के लिए चंद घंटे बचे थे। अभी भी प्रगीथ के परिवारवाले या उनके दोस्त नहीं जानते कि वह जिंदा हैं या नहीं। स्पष्ट है कि उनके इस अपहरण में श्रीलंका के कुख्यात सुरक्षा बलों का हाथ रहा है। मगर अकेले प्रगीथ ही क्यों? दो साल पहले उसी कोलंबो के उसी अतिसुरक्षित इलाके में संडे लीडर नामक अखबार के संपादक लसांथा विक्रमतुंगे की अज्ञात हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। राजपक्षे सरकार की नीतियों के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले, हथियारों एवं सेना के बल पर सभी विवादों का समाधान चाहने वाले, उनकी सरकार के कट्टर आलोचक लसंथा के हत्यारे भी आज तक पकड़े नहीं जा सके हैं। लसांथा को इस बात का पूर्वानुमान था कि राज्य के सुरक्षा बल उनकी कभी भी हत्या कर सकते हैं। इस आशंका को देखते हुए उन्होंने एक संपादकीय भी लिखा था, जो उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित हुआ, जिसमें उन्होंने सीधे सरकार को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया था। लिट्टे पर अपनी जीत से प्रमुदित राजपक्षे सरकार इन दिनों कुपित है कि प्रगीथ का गायब होना, लसांथा की हत्या या श्रीलंका से पत्रकारों को देशनिकाला जाना जैसे मसले अचानक विश्वमीडिया में सुर्खियां बन रहे हैं। इसकी फौरी वजह यह है कि 26 जनवरी से श्रीलंका के दक्षिण में स्थित गाले में एक साहित्य महोत्सव शुरू हुआ है, जिसके बहिष्कार का आह्वान दुनिया के अग्रणी लेखकों ने किया। नोम चोम्स्की, तारिक अली, अरुंधति रॉय, केन लोच, एंथनी लोवेनस्टाइन जैसे कई लेखकों ने इस अपील पर अपने दस्तखत किए। रिपोर्ट्स विदाउट बॉर्डर्स और जर्नलिस्ट फार डेमोक्रेसी जिन्होंने इस सिलसिले में पहल की है, बताते हैं कि एक ऐसे मुल्क में साहित्योत्सव कैसे मनाया जा सकता है, जहां कार्टूनिस्ट, पत्रकार, लेखक और असहमति रखने वाली आवाजों के साथ सरकार दमनात्मक तरीके से पेश आ रही हो। लगभग 2 करोड़ से अधिक आबादी के श्रीलंका में, जिसकी आबादी का लगभग 74 फीसदी हिस्सा सिंहलियों, 12.6 फीसदी भाग तमिलों का है, 5.2 हिस्सा भारतीय मूल के तमिलों का है और 7.4 फीसदी आबादी मूर (मुस्लिम) समुदाय से संबद्ध है, डेढ़ साल पहले तक तमिल आकांक्षाओं के दमन के खिलाफ गृहयुद्ध चल रहा था। आज भले ही गृहयुद्ध खत्म हो गया हो, मगर तमिल आबादी के दमन में कोई गुणात्मक अंतर नहीं आया है। चंद रोज पहले माइनॉरिटीज राइट्स इंटरनेशनल नामक अंतरराष्ट्रीय संस्था ने नो वॉर, नो पीस: द डिनायल ऑफ माइनॉरिटी राइट्स एंड जस्टिस इन श्रीलंका नाम से एक ताजा रिपोर्ट जारी कर बताया कि तमिल विद्रोहियों के दमन के बाद के इस अंतराल में श्रीलंका के दो प्रमुख अल्पसंख्यक समूह तमिल और मुस्लिम किस तरह कठिन भौतिक हालात, आर्थिक हाशियाकरण एवं इलाकों के बढ़ते सैन्यीकरण की समस्या से जूझ रहे हैं। स्थानीय कार्यकर्ताओं, राजनीतिक और धार्मिक अग्रणियों और आम लोगों से बातचीत के आधार पर तैयार यह रिपोर्ट दरअसल श्रीलंका सरकार द्वारा पेश की जा रही शांति एवं समृद्धि के चरण की असलियत को बेपर्दा कर देती है। अभी भी तमिल एवं मुस्लिम समुदाय के तमाम सदस्य अपने अपने घरों से विस्थापित होकर, आंतरिक विस्थापित शिविरों में रह रहे हैं, जहां न उनके पास आवास की उचित व्यवस्था है और न ही जीवनयापन के साधन हैं। उनकी रिहाइश के कई इलाकों को आज भी उच्च सुरक्षा क्षेत्रों के तौर पर चिह्नांकित किया गया है, जिसका अर्थ है वहां रहने वाले लोग अभी उन इलाकों में लौट नहीं सकते। दूसरे इलाकों में, जहां से वे विस्थापित किए गए हैं, जमीनों को होटलों और अन्य विकास परियोजनाओं के लिए अधिग्रहण किया गया है, जहां अन्य इलाकों से सिंहली श्रमिकों को लाकर काम कराया जा रहा है। सेना द्वारा नियंत्रित इलाकों के अल्पसंख्यकों ने यह भी उजागर किया कि किस तरह सेना के हाथों उन्हें तरह तरह की प्रताड़नाओं का सामना करना पड़ता है, जिसमें महिलाओं के यौन अत्याचार का मसला भी शामिल है। मानवाधिकारों के बहुआयामी दमन के अलावा इन समुदायों के प्रतिनिधियों ने यह भी बताया कि किस तरह इलाकों का सिंहलीकरण किया जा रहा है और उनके सांस्कृतिक, धार्मिक और भाषिक पहचान को दबाया जा रहा है। उनके मुताबिक लिट्टे पर सरकारी बलों की जीत को सिंहली बौद्धों की (मुख्यत:) हिंदू तमिलों और मुसलमानों पर जीत के तौर पर प्रोजेक्ट किया जा रहा है। न केवल इलाकों के तमिल नामों को सिंहली नामों में बदला जा रहा है, बल्कि तमाम स्थानों पर बौद्ध की प्रतिमाएं भी खड़ी की जा रही हैं। वैसे लिट्टे के दमन के नाम पर श्रीलंकाई सेना द्वारा किस तरह निरपराधों को मारा गया, अस्पतालों पर हवाई हमले किए गए, बड़े पैमाने पर लोगों को बंदी बनाया गया, इसके बारे में रपटें पहले ही प्रकाशित हुई हैं। पिछले साल तमिल बंदियों को हाथ के पीछे बांध कर मारे जाने की वीडियो क्लिप भी लोगों ने यूट्यूब पर जारी की थी, जिसे लेकर काफी हंगामा मचा था। पिछले दिनों बूसा स्थित हिरासत शिविर में रखे गए बंदियों तथा सरकार द्वारा निर्मित लेसंस लर्न्ट एंड रिकनसिलिएशन कमीशन के बीच की बैठक को कवर करने की दस श्रीलंकाई पत्रकारों व विदेशी पत्रकारों की योजना पर आखिरी समय में रोक लगा दी गई थी। इन पत्रकारों ने अपनी इस प्रस्तावित यात्रा के लिए कमीशन और मीडिया सेंटर फॉर नेशनल सिक्युरिटी की तरफ से अनुमति भी हासिल की थी। प्रश्न उठा था कि आखिर ऐन वक्त में पाबंदी लगाने की क्या वजह थी। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के मुताबिक इस हिरासत शिविर में स्थूल रूप में 700 से अधिक तमिल टाइगर विद्रोही रखे गए थे और वहां पर कैदियों को यातना देने तथा उनके गायब कर देने की घटनाएं भी दिखाई दी हैं। कुल मिला कर देखें तो अपने विरोधियों पर फौजी जीत भले ही राजपक्षे सरकार ने हासिल की हो, मगर जैसा कि लसांथा विक्रमतुंगे कहते थे कि राजनीतिक समाधान का सवाल हल किए बिना समस्या ज्यों की त्यों बनी रहेगी। कहा जा रहा है कि गाले के साहित्योत्सव के बहिष्कार की अपील को लेकर राजपक्षे सरकार क्षुब्ध है। दरअसल लिट्टे पर अपनी जीत से इतराते श्रीलंका के हुक्मरानों को समझना होगा कि श्रीलंका की राजनीतिक प्रणाली में आमूलचूल बदलाव, जिसमें सत्ता का व्यापक विकेंद्रीकरण और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की पूरी हिफाजत जैसे मसले शामिल हों, का मसला एजेंडे पर आया है। और ऐसे बदलावों को अंजाम दिए बिना उसकी छवि निखर नहीं सकती, भले वह यह भ्रम पाल ले कि राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय उत्सवों के आयोजनों से उसकी इमेज सुधर सकती है।
Wednesday, February 2, 2011
श्रीलंका में सिसक रही मानवता
प्रगीथ एकनेलिगोडा, जो श्रीलंका के एक मशहूर राजनीतिक कार्टूनिस्ट थे, उन्हें गायब हुए एक साल बीत गया। 24 जनवरी 2010 को कोलंबो के एक अतिसुरक्षित इलाके से उनका अपहरण हुआ था, जबकि राष्ट्रपति पद के चुनावों के लिए चंद घंटे बचे थे। अभी भी प्रगीथ के परिवारवाले या उनके दोस्त नहीं जानते कि वह जिंदा हैं या नहीं। स्पष्ट है कि उनके इस अपहरण में श्रीलंका के कुख्यात सुरक्षा बलों का हाथ रहा है। मगर अकेले प्रगीथ ही क्यों? दो साल पहले उसी कोलंबो के उसी अतिसुरक्षित इलाके में संडे लीडर नामक अखबार के संपादक लसांथा विक्रमतुंगे की अज्ञात हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। राजपक्षे सरकार की नीतियों के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले, हथियारों एवं सेना के बल पर सभी विवादों का समाधान चाहने वाले, उनकी सरकार के कट्टर आलोचक लसंथा के हत्यारे भी आज तक पकड़े नहीं जा सके हैं। लसांथा को इस बात का पूर्वानुमान था कि राज्य के सुरक्षा बल उनकी कभी भी हत्या कर सकते हैं। इस आशंका को देखते हुए उन्होंने एक संपादकीय भी लिखा था, जो उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित हुआ, जिसमें उन्होंने सीधे सरकार को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया था। लिट्टे पर अपनी जीत से प्रमुदित राजपक्षे सरकार इन दिनों कुपित है कि प्रगीथ का गायब होना, लसांथा की हत्या या श्रीलंका से पत्रकारों को देशनिकाला जाना जैसे मसले अचानक विश्वमीडिया में सुर्खियां बन रहे हैं। इसकी फौरी वजह यह है कि 26 जनवरी से श्रीलंका के दक्षिण में स्थित गाले में एक साहित्य महोत्सव शुरू हुआ है, जिसके बहिष्कार का आह्वान दुनिया के अग्रणी लेखकों ने किया। नोम चोम्स्की, तारिक अली, अरुंधति रॉय, केन लोच, एंथनी लोवेनस्टाइन जैसे कई लेखकों ने इस अपील पर अपने दस्तखत किए। रिपोर्ट्स विदाउट बॉर्डर्स और जर्नलिस्ट फार डेमोक्रेसी जिन्होंने इस सिलसिले में पहल की है, बताते हैं कि एक ऐसे मुल्क में साहित्योत्सव कैसे मनाया जा सकता है, जहां कार्टूनिस्ट, पत्रकार, लेखक और असहमति रखने वाली आवाजों के साथ सरकार दमनात्मक तरीके से पेश आ रही हो। लगभग 2 करोड़ से अधिक आबादी के श्रीलंका में, जिसकी आबादी का लगभग 74 फीसदी हिस्सा सिंहलियों, 12.6 फीसदी भाग तमिलों का है, 5.2 हिस्सा भारतीय मूल के तमिलों का है और 7.4 फीसदी आबादी मूर (मुस्लिम) समुदाय से संबद्ध है, डेढ़ साल पहले तक तमिल आकांक्षाओं के दमन के खिलाफ गृहयुद्ध चल रहा था। आज भले ही गृहयुद्ध खत्म हो गया हो, मगर तमिल आबादी के दमन में कोई गुणात्मक अंतर नहीं आया है। चंद रोज पहले माइनॉरिटीज राइट्स इंटरनेशनल नामक अंतरराष्ट्रीय संस्था ने नो वॉर, नो पीस: द डिनायल ऑफ माइनॉरिटी राइट्स एंड जस्टिस इन श्रीलंका नाम से एक ताजा रिपोर्ट जारी कर बताया कि तमिल विद्रोहियों के दमन के बाद के इस अंतराल में श्रीलंका के दो प्रमुख अल्पसंख्यक समूह तमिल और मुस्लिम किस तरह कठिन भौतिक हालात, आर्थिक हाशियाकरण एवं इलाकों के बढ़ते सैन्यीकरण की समस्या से जूझ रहे हैं। स्थानीय कार्यकर्ताओं, राजनीतिक और धार्मिक अग्रणियों और आम लोगों से बातचीत के आधार पर तैयार यह रिपोर्ट दरअसल श्रीलंका सरकार द्वारा पेश की जा रही शांति एवं समृद्धि के चरण की असलियत को बेपर्दा कर देती है। अभी भी तमिल एवं मुस्लिम समुदाय के तमाम सदस्य अपने अपने घरों से विस्थापित होकर, आंतरिक विस्थापित शिविरों में रह रहे हैं, जहां न उनके पास आवास की उचित व्यवस्था है और न ही जीवनयापन के साधन हैं। उनकी रिहाइश के कई इलाकों को आज भी उच्च सुरक्षा क्षेत्रों के तौर पर चिह्नांकित किया गया है, जिसका अर्थ है वहां रहने वाले लोग अभी उन इलाकों में लौट नहीं सकते। दूसरे इलाकों में, जहां से वे विस्थापित किए गए हैं, जमीनों को होटलों और अन्य विकास परियोजनाओं के लिए अधिग्रहण किया गया है, जहां अन्य इलाकों से सिंहली श्रमिकों को लाकर काम कराया जा रहा है। सेना द्वारा नियंत्रित इलाकों के अल्पसंख्यकों ने यह भी उजागर किया कि किस तरह सेना के हाथों उन्हें तरह तरह की प्रताड़नाओं का सामना करना पड़ता है, जिसमें महिलाओं के यौन अत्याचार का मसला भी शामिल है। मानवाधिकारों के बहुआयामी दमन के अलावा इन समुदायों के प्रतिनिधियों ने यह भी बताया कि किस तरह इलाकों का सिंहलीकरण किया जा रहा है और उनके सांस्कृतिक, धार्मिक और भाषिक पहचान को दबाया जा रहा है। उनके मुताबिक लिट्टे पर सरकारी बलों की जीत को सिंहली बौद्धों की (मुख्यत:) हिंदू तमिलों और मुसलमानों पर जीत के तौर पर प्रोजेक्ट किया जा रहा है। न केवल इलाकों के तमिल नामों को सिंहली नामों में बदला जा रहा है, बल्कि तमाम स्थानों पर बौद्ध की प्रतिमाएं भी खड़ी की जा रही हैं। वैसे लिट्टे के दमन के नाम पर श्रीलंकाई सेना द्वारा किस तरह निरपराधों को मारा गया, अस्पतालों पर हवाई हमले किए गए, बड़े पैमाने पर लोगों को बंदी बनाया गया, इसके बारे में रपटें पहले ही प्रकाशित हुई हैं। पिछले साल तमिल बंदियों को हाथ के पीछे बांध कर मारे जाने की वीडियो क्लिप भी लोगों ने यूट्यूब पर जारी की थी, जिसे लेकर काफी हंगामा मचा था। पिछले दिनों बूसा स्थित हिरासत शिविर में रखे गए बंदियों तथा सरकार द्वारा निर्मित लेसंस लर्न्ट एंड रिकनसिलिएशन कमीशन के बीच की बैठक को कवर करने की दस श्रीलंकाई पत्रकारों व विदेशी पत्रकारों की योजना पर आखिरी समय में रोक लगा दी गई थी। इन पत्रकारों ने अपनी इस प्रस्तावित यात्रा के लिए कमीशन और मीडिया सेंटर फॉर नेशनल सिक्युरिटी की तरफ से अनुमति भी हासिल की थी। प्रश्न उठा था कि आखिर ऐन वक्त में पाबंदी लगाने की क्या वजह थी। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के मुताबिक इस हिरासत शिविर में स्थूल रूप में 700 से अधिक तमिल टाइगर विद्रोही रखे गए थे और वहां पर कैदियों को यातना देने तथा उनके गायब कर देने की घटनाएं भी दिखाई दी हैं। कुल मिला कर देखें तो अपने विरोधियों पर फौजी जीत भले ही राजपक्षे सरकार ने हासिल की हो, मगर जैसा कि लसांथा विक्रमतुंगे कहते थे कि राजनीतिक समाधान का सवाल हल किए बिना समस्या ज्यों की त्यों बनी रहेगी। कहा जा रहा है कि गाले के साहित्योत्सव के बहिष्कार की अपील को लेकर राजपक्षे सरकार क्षुब्ध है। दरअसल लिट्टे पर अपनी जीत से इतराते श्रीलंका के हुक्मरानों को समझना होगा कि श्रीलंका की राजनीतिक प्रणाली में आमूलचूल बदलाव, जिसमें सत्ता का व्यापक विकेंद्रीकरण और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की पूरी हिफाजत जैसे मसले शामिल हों, का मसला एजेंडे पर आया है। और ऐसे बदलावों को अंजाम दिए बिना उसकी छवि निखर नहीं सकती, भले वह यह भ्रम पाल ले कि राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय उत्सवों के आयोजनों से उसकी इमेज सुधर सकती है।
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