Thursday, February 3, 2011

हुस्नी मुबारक का साथ देने से दर रहे सैन्य कमांडर


जनविद्रोह का सामना कर रहे मिस्र के राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक ने स्थिति से निपटने के लिए रविवार को सैन्य कमांडरों के साथ मुलाकात की। यह तो सर्वविदित है कि मौजूदा समय में सेना की भूमिका अहम है। शनिवार को मुबारक ने 18 वर्षो से देश के खुफिया प्रमुख उमर सुलेमान को उपराष्ट्रपति बनाकर संकेत दे दिया कि उनके लिए सत्ता पर पकड़ बनाए रखना अब बेहद कठिन हो गया है। तो क्या वह भी ट्यूनीसिया के राष्ट्रपति जिने अल आबेदिन बेन अली की तरह देश छोड़ेंगे या फिर जनविद्रोह को दबाने के लिए शक्ति का इस्तेमाल करेंगे? समाचार पत्र द वॉशिंगटन पोस्ट के अनुसार मुबारक ने उमर सुलेमान को उपराष्ट्रपति बनाने के बाद सेना को विद्रोह से निपटने का आदेश देकर स्पष्ट कर दिया कि वह बेन अली की तरह देश तो नहीं छोड़ने वाले। ऐसा तभी संभव होगा जब सेना यह समझे कि वह अब उनकी रक्षा नहीं कर पाएगी। महत्वपूर्ण बात यह भी है कि मिस्र के सैन्य कमांडर मुबारक की सत्ता को बचाने के इच्छुक हैं भी या नहीं? द न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार शनिवार को बहुत से सैनिक वर्दी उतारकर प्रदर्शनकारियों के साथ शामिल हो गए। छह दिनों से जारी प्रदर्शनों के दौरान यह तो सभी ने देखा कि सेना ने जनविद्रोह को कुचलने का कोई प्रयास नहीं किया। सेना प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने की हर संभव कोशिश कर रही है। हालांकि रविवार देर रात तक सेना ने स्थिति पर शिकंजा कसने के लिए प्रयास तेज कर दिए। ऐसे में कहना मुश्किल है कि आगे क्या होगा? बहरहाल समाचार एजेंसी रायटर को मिली सूचना के अनुसार मिस्र के सैन्य कमांडरों के समक्ष इस समय दो विकल्प हैं। पहला-वे राष्ट्रपति मुबारक की सत्ता को बचाने के लिए जनविद्रोह को कुचलें और दूसरा-वे जनता को अपना कार्य करने दें। रायटर के मुताबिक सैन्य कमांडर मुबारक पर दांव लगाने से बच रहे हैं। कई स्थानों पर सेना के प्रदर्शनकारियों के साथ मिलने की खबर से मुबारक की मुश्किल बढ़ गई है। उन्होंने रविवार को उपराष्ट्रपति उमर सुलेमान, रक्षामंत्री मुहम्मद हुसैन तनत्वई, चीफ ऑफ स्टाफ सामी अल-अनान और अन्य वरिष्ठ कमांडरों से इस मुद्दे पर बात की। मुबारक ने यह भेंट उन खबरों के आने के बाद की, जिनमें कहा गया कि कई जगहों पर सुरक्षाबल भी प्रदर्शनकारियों के साथ मिल गए हैं। इस बीच कई जगहों पर पुलिस को हटा कर सुरक्षा का जिम्मा सेना को सौंप दिया गया है। प्रदर्शनकारियों की तरफ से एक मुश्किल यह सामने आ रही है कि उनका कोई एक संगठन या नेता नहीं है, जिसे राष्ट्रपति अपने पास बात करने के लिए बुला सकें। यद्यपि लोकतंत्र समर्थक नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद अलबरदेई मिस्र लौट आए हैं, लेकिन उनके नजरबंद कर दिए जाने की खबर है। कई लोग यह भी मानते हैं कि अलबरदेई कई वर्षो तक देश से बाहर रहे हैं, अत: अब वह हालात को पहले की तरह नहीं समझ सकते। एक अन्य इस्लामी विद्रोही समूह, द मुस्लिम ब्रदरहुड है, लेकिन वह प्रदर्शनों में सीधे शामिल नहीं हुआ है। वैसे सरकार ने इस पर इस विरोध को हवा देने के आरोप लगाए हैं।



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