इंडोनेशिया दक्षिण पूर्व एशिया में भारत का दूसरा बड़ा व्यापारिक साझेदार है। उससे भारत तेल खनिजों और लुगदी का आयात करता है। देश को उद्योगों के लिए अच्छी गुणवत्ता वाले कोयले की जरूरत है जो इंडोनेशिया प्रदान कर सकता है। दूसरी ओर इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ाने के लिए इंडोनेशिया को भारतीय निवेश की जरूरत रही है। वह कुछ समय से भारत की कम्पनियों को निवेश के लिए आकर्षित करता रहा है। पहले से ही कई बड़ी भारतीय कम्पनियां इंडोनेशिया में अपना कारोबार कर रही हैं
इंडोनेशियाई राष्ट्रपति सुसिलो बामबंग युधोयोनो का 24-26 जनवरी के दरम्यान भारत का राजकीय दौरा न केवल दोनों देशों के लिए वर्षो पहले टूट चुकी पुरानी दोस्ती को जोड़ने व पुख्ता बनाने का एक अवसर था, बल्कि आपसी सहयोग को नयी ऊंचाइयों तक ले जाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भी था। दोनों देशों के बीच राजनयिक सम्बंधों की स्थापना छह दशक पहले 1951 में हुई थी जब इंडोनेशिया ने पहले जापानी और फिर डच उपनिवेशी शासन से आजादी हासिल की थी और संसदीय जनतंत्र को अपनाया था। तब स्वतंत्र इंडोनेशिया के पहले राष्ट्रपति सुकर्णो और नेहरू ने नासिर, टीटो और अन्य विश्व नेताओं के साथ मिलकर गुटनिरपेक्ष आंदोलन की स्थापना की थी। किंतु कुछ समय बाद खुद सुकर्णो के सर्वसत्तावाद की दिशा में भटकाव के बाद इंडोनेशिया में जनतंत्र समाप्तप्राय हो गया। बाद में सैन्य-प्रमुख सुहातरे के तख्ता पलटकर सत्ता पर कब्जा करने के बाद वहां जनतांत्रिक संस्थाएं ठप हो गई और फिर सोवियत संघ के विध्वंस के साथ ही गुट-निरपेक्ष आंदोलन जब अप्रासंगिक होने लगा था तब दोनों देशों के बीच सहयोग का जो रहा-सहा आधार था वह भी नहीं रहा। इस तरह ऐसा साझा कोई मंच नहीं रह गया था जिसे वे अपने सहयोग और आपसी विकास का आधार बना सकें। पर 2004 में इंडोनेशिया में सैन्य सत्ता की समाप्ति के बाद जनतंत्र का पुन: उभार हुआ और कुछ समय बाद ही राष्ट्रपति युधोयोनो ने 2005 में अपना पहला भारतदौ रा किया। टूटी हुई राजनीतिक-आर्थिक कड़ियों को जोड़ने का यह पहला ठोस प्रयास था। राजनीतिक-आर्थिक मित्रता को पुनर्जीवित करने के उस दौरे के दौरान राष्ट्रपति युधोयोनो और प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने व्यापार में रणनीतिक साझेदारी स्थापित करने के लिए एक संयुक्त घोषणा हस्ताक्षरित किया और तब से दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय सम्बंध विभिन्न क्षेत्रों में तेजी से बढ़ने लगे। इस रणनीतिक साझेदारी का मुख्य उद्देश्य द्विपक्षीय व्यापार को चार अरब अमेरिकी डालर से बढ़ा कर वर्ष 2010 में 10 अरब तक लाना था। पर यह लक्ष्य दो वर्ष पहले ही वर्ष 2008 में हासिल कर लिया गया। अब यह अपेक्षा की जा रही है कि वर्ष 2015 तक द्विपक्षीय व्यापार दुगुने पर पहुंच जाएगा। उस बीच दोनों देशों के अधिकारियों के संयुक्त दल ने व्यापक आर्थिक सहयोग संधि के मसौदे को अंतिम रूप दिया जो इंडोनेशियाई राष्ट्रपति के वर्तमान दौरे के समय वार्ताओं का मुख्य आधार बना। इस बार दोनों देशों ने खनन, परिवहन, विनिर्माण और इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में 15.1 अरब अमेरिकी डालर के 18 व्यावसायिक समझौते सम्पन्न किये हैं। ये समझौते द्विपक्षीय सम्बंधों को एक व्यापक आर्थिक आधार को प्रदान करते हैं। इसके अलावा भारत की अग्रणी निजी क्षेत्र की कम्पनी जीवीके पावर ने- जो भारत में मुम्बई के छत्रपति शिवाजी हवाई अड्डे और बेंगलुरू हवाई अड्डे का संचालन करती है, इंडोनेशिया के बाली और जावा में दो हवाई अड्डे बनाने के लिए भी समझौता किया है। इसके अंतर्गत जीवीके इन हवाई अड्डों की योजना और डिजाइन तैयार करेगी, साथ ही इनके संचालन और प्रबंधन में सहायता प्रदान करेगी। बाली और जावा इंडोनेशिया के प्रमुख पर्यटन स्थल हैं और इन हवाई अड्डों के निर्माण में इंडोनेशिया में पर्यटन को बल मिलेगा। भारत की सार्वजनिक क्षेत्र कम्पनी, स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) भी इंडोनेशिया में Rs15,000 करोड़ की लागत वाला संयंत्र लगाने जा रही है जो लगभग 30 लाख टन प्रति वर्ष का उत्पादन करेगी। दोनों देशों ने प्रत्यर्पण संधि और पारस्परिक कानूनी सहायता संधि भी हस्ताक्षरित की है जो इस दृष्टि से महत्वपूर्ण कही जा सकती हैं कि दोनों देश आतंकवाद के निशाने पर रहे हैं और इससे वे एक-दूसरे के भगोड़े अपराधियों को कानूनी कटघरे में ला सकते हैं। इसके अलावा शिक्षा, परिवहन, शोध आदि के क्षेत्र में समझौते हुए और एक महत्वपूर्ण समझौता भारत और इंडोनेशिया की प्रेस काउंसिलों के बीच हुआ है जिसे दोनों देशों के बीच संचार माध्यमों में पारदर्शिता की दिशा में एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। इंडोनेशिया में भारत का निवेश 2007 में 11.7 मिलियन डालर से बढ़कर 2010 में 44 मिलियन हुआ है। इसी प्रकार द्विपक्षीय व्यापार पिछले पांच वर्षो में तिगुना हुआ है। इंडोनेशियाई राष्ट्रपति ने न केवल निजी क्षेत्र के प्रतिनिधियों के साथ अपनी बैठक में भारतीय उद्योग को अपने देश में निवेश के लिए आमंत्रित किया बल्कि यह आशा भी जताई कि हमारा अगला लक्ष्य वर्तमान द्विपक्षीय व्यापार को अगले 5 वर्षो में तिगुना करके 25 मिलियन डालर तक पहुंचाना है। इन सभी तथ्यों से यही स्पष्ट होता है कि इंडोनेशिया भारत के निवेश के लिए अपने दरवाजे खोलने को तैयार है और वह अपने आर्थिक विकास का हित भी इसी में देखता है। दोनों देशों के कई मायनों में एक जैसे सरोकार हैं। दोनों विश्व के दो विशाल जनतांत्रिक देश हैं। जनसंख्या की दृष्टि से जहां भारत दूसरे स्थान पर है वहीं इंडोनेशिया चौथे स्थान पर है। दोनों ही देश आतंकवाद की समस्या से जूझते आये हैं। इंडोनेशिया में विश्व की विशाल मुस्लिम आबादी रहती है, पर भारत की तरह वह धार्मिक और भाषाई दृष्टि से वह बहुलता वाला देश है। दोनों देशों को ‘एकता में बहुलता वाला’ देश कहा जाता है। वह भी जी-20 समूह का सदस्य है। आर्थिक क्षेत्र में भी भारत की तरह एक विकासमान अर्थव्यवस्था वाला देश है। गत वर्ष उसकी विकास दर जहां 5-6 प्रतिशत थी वहां अगले कुछ वर्षा में वह 7 प्रतिशत विकास दर हासिल करने का प्रयास कर रहा है। वह दक्षिण पूर्व एशिया में भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापार साझेदार है। भारत इंडोनेशिया से तेल, खनिजों और लुगदी का आयात करता है और साथ ही उसे अपने उद्योगों के लिए अच्छी गुणवत्ता वाले कोयले की जरूरत है जो इंडोनेशिया उसे प्रदान कर सकता है। दूसरी ओर इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ाने के लिए इंडोनेशिया को भारतीय निवेश की जरूरत रही है। इंडोनेशिया कुछ समय से भारत की कम्पनियों को निवेश के लिए आकर्षित करता रहा है। पहले से ही कई बड़ी भारतीय कम्पनियां इंडोनेशिया में अपना कारोबार कर रही हैं। पर जैसा कि नई दिल्ली में जारी संयुक्त वक्तव्य से प्रकट होता है, दोनों देश द्विपक्षीय आर्थिक सम्बंधों से परे जाकर भूमंडलीय स्तर पर राष्ट्र संघ, विश्व व्यापार संगठन और जी-20 समूह में व्यापक सहयोग के इच्छुक हैं। इसके अलावा व्यवसाय और व्यापार के साथ-साथ एशिया की राजनीति और सुरक्षा ढांचे में दोनों देशों की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। आर्थिक और राजनीतिक शक्ति के रूप में चीन के आक्रामक उभार को देखते हुए एशियाई राजनीति में संतुलन की स्थिति बनाने की दृष्टि से भी यह साझेदारी महत्वपूर्ण हो सकती है।
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