पाकिस्तान में इन दिनों दहशतगर्दी ने एक भयानक शक्ल ले ली है, जिससे वह घोर अराजकता और बर्बरता की तरफ बढ़ता दिख रहा है। बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और पंजाब प्रांत तो पहले ही दहशतगर्दी का शिकार रहे हैं, अब सिंध की राजधानी कराची भी नस्लवादी व राजनीतिक हिंसा की लपेट में है। देश की आर्थिक राजधानी के हिंसाग्रस्त होने से कारोबार और विदेशी निवेश पर भी प्रतिकूल असर पड़ रहा है। कभी रोशनियों का शहर कहा जाने वाला कराची अब शवों का शहर बन गया है। पिछले चंद दिनों में वहां लगभग 50 लोगों की हत्या कर दी गई है। मरने वालों में मुत्तहिदा कौमी मूवमेंट (एमक्यूएम) और अवामी नेशनल पार्टी (एएनपी) के समर्थकों की संख्या सबसे ज्यादा है। काबिले गौर है कि ये दोनों पार्टियां पाक की केंद्रीय गठबंधन सरकार और सिंध की सरकार में शामिल हैं।
एमक्यूएम बंटवारे के समय भारत से गए उर्दू भाषी मुहाजिरों तथा एएनपी अल्पसंख्यक बलूचियों व पख्तून पठानों की पार्टी है। ये दोनों पार्टियां कराची की राजनीति में अपना वर्चस्व कायम करना चाहती हैं। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी व एएनपी के गढ़ को एमक्यूएम खत्म करना चाहती है, जबकि पीपीपी और एएनपी एमक्यूएम का जनाधार ध्वस्त करने की इच्छुक हैं। हत्यारे मोटर साइकिल से आते हैं और जिसे निशाना बनाना होता है, उसे गोली मारकर फरार हो जाते हैं। थोड़ी ही देर में किसी और गली-मोहल्ले या बाजार में जवाबी कार्रवाई में विरोधी गुट के कार्यकर्ता के मारे जाने की खबर आती है। वहां शिया व सुन्नी समुदाय के बीच भी झड़पें होती रहती हैं। मुहाजिर अधिकांशत: सिंध प्रांत में रहते हैं। सिंधियों का मानना है कि मुहाजिरों के आने से वे अल्पसंख्यक होते जा रहे हैं। कराची में बहुत से मुसलिम देशों के जेहादी भी मौजूद हैं, जो अफगानिस्तान में सोवियत यूनियन के खिलाफ जेहाद में भाग लेने के लिए आए थे, लेकिन वापस नहीं गए। ये भी विध्वंसक कार्रवाइयों में लिप्त हैं।
पाक सरकार ने कराची में ताजा हिंसा पर काबू पाने के लिए कुछ खास कदम उठाए हैं। जैसे कि सुरक्षा बलों ने अशांत इलाकों में घर-घर तलाशी अभियान शुरू किया है, जिसमें अनेक लोग पूछताछ के लिए हिरासत में लिए गए हैं। हथियारों के जखीरे को जब्त करने के लिए विशेष दलों का गठन किया गया है। रात में मोटर साइकिल पर डबल सवारी प्रतिबंधित कर दी गई है। अशांत इलाकों में पहचान पत्र रखना जरूरी है। हिंसाग्रस्त क्षेत्रों में असरदार कार्रवाई के लिए हेलीकॉप्टर से कमांडो उतारने पर विचार हो रहा है। सरकार अशांत इलाकों में आंशिक कर्फ्यू लगाने का इरादा भी रखती है। गृह मंत्री रहमान मलिक हालात का जायजा लेने पिछले एक सप्ताह में दो बार कराची जा चुके हैं। उन्होंने इस हिंसा के पीछे किसी दुश्मन देश का हाथ बताया, हालांकि भारत का उन्होंने सीधे-सीधे नाम नहीं लिया। जबकि हकीकत यह है कि मौजूदा हिंसा पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई करा रही है। आईएसआई दहशतगर्दों के विभिन्न गुटों को मदद करती है। पुलिस जब इन पर कार्रवाई करने की कोशिश करती है, तो आईएसआई उसका विरोध करती है। नतीजतन सरकार चाहते हुए भी हिंसा पर काबू नहीं पा रही।
कराची में हिंसा का इतिहास बहुत पुराना है, लेकिन कोई भी सरकार इस पर काबू नहीं पा सकी। इसका सबसे बड़ा कारण राजनीतिक इच्छा शक्ति में कमी है। जब भी कोई दहशतगर्द पकड़ा जाता है, उसकी पार्टी के नेता उसे छुड़ा लेते हैं। कराची में नो गो एरियाज हैं, जो नहीं होने चाहिए। खुद पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ स्वीकारते हैं कि राजनीतिक पार्टियों में ऐसे लोग हैं, जो फिरौती के लिए हत्या और अपहरण तक के घिनौने काम में लिप्त हैं। जाहिर है, स्थिति में सुधार के लिए सरकार को सक्रिय होना होगा। भ्रष्ट और अपराधी तत्वों को पार्टियों से तो निकालना ही होगा, खुद सरकार को नस्लवादी मतभेद की नीतियां छोड़ते हुए सिंधियों, बलूचियों, पख्तूनों, मुहाजिरों और अल्पसंख्यकों को साथ लेकर चलना होगा। इसी तरह सरकारी एजेंसियों को दमनकारी नीतियां त्यागनी होंगी और विदेशी खासकर भारतीय एजेंसियों के खिलाफ झूठा प्रचार बंद करना होगा। सेना, पुलिस और सुरक्षा बलों की कार्रवाई से समस्या का हल नहीं निकल सकता। इसके लिए राजनीतिक समाधान तलाशना जरूरी है। क्या इसलामाबाद इसके लिए तैयार है?
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