ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका जैसे पश्चिमी देशों में भारतीयों छात्रों के साथ बदसलूकी किसी से छिपी नहीं है। पर अफसोस इस बात का है कि भारत की सरकार ऐसी घटनाओं पर सख्त रुख नहीं अपनाती। बहुत हुआ तो इसे एक चिंताजनक हरकत बताकर पल्ला झाड़ लेती है। अब पिछले दिनों पड़ोस के श्रीलंका जैसे देश ने भी ऐसी हरकत कर डाली, जिसे भारत को कतई बर्दाश्त नहीं करना चाहिए। श्रीलंकाई सैनिकों ने राह भटके दो भारतीय मछुआरों को पकड़कर जान से मार दिया। इस घटना ने तमिलनाडु में उबाल ला दिया है। संप्रग सरकार की महत्वपूर्ण कड़ी डीएमके ने सरकार पर दबाव बनाया तो आनन-फानन में भारतीय विदेश सचिव निरुपमा राव को श्रीलंका भेज दिया गया। दरअसल, मुिश्कल यह है कि श्रीलंका की सरकार इस हत्या से अपना हाथ पूरी तरह खींच चुकी है। श्रीलंका के सरकारी विज्ञापन में यह कहा गया है कि न तो श्रीलंका की सेना और न ही नौसेना ने ऐसा किया है। फिर प्रश्न उठता है कि श्रीलंका के समुद्री ठिकानों के भीतर कौन-से ऐसे भारत विरोधी जत्थे हैं, जो भारतीय मछुआरों को अपना निशाना बना रहे हैं। ऐसा नहीं है कि ऐसी घटना पहली बार हुई है। अक्टूबर 2008 को श्रीलंका और भारत के प्रधानमंत्री द्वारा संयुक्त उद्घोषणा में कहा गया था कि दोनों देशों के बीच मछुआरों से संबधित समस्याओं का हल ढूंढ़ लिया जाएगा। ऐसी परिस्थितिया नहीं बनेंगी, जिससे किसी भी देश को नुकसान पहुंचे। लेकिन सरकारी उद्घोषणाएं महज राज्य की उन नीतियों की खानापूर्ति बनकर रह गई, जिनकी चर्चा 1974 और 1976 के भारत-श्रीलंका समझौते में किया गया था। 1974 का समझौता दोनों देशों के बीच सौहार्द्रपूर्ण वातावरण में किया गया था। इस बात की उम्मीद की गई थी कि भारतीय मछुआरों को कचाथीवू द्वीप के ईद-गिर्द मछली पकड़ने से श्रीलंका के भीतर कोई बवाल नहीं होगा। दूसरी तरफ भारतीय मछुआरे श्रीलंका के संवेदनशील क्षेत्र जो सुरक्षा के लिहाज से अत्यंत ही अहम हैं, में प्रवेश नहीं करेगें। इन सबके बावजूद दोनों देशों के मछुआरे गोलियों के शिकार होते रहे हैं। भविष्य में भी संभवत: ऐसी घटनाएं होती रहेंगी, जब तक कि दोनों देशों के उच्च अधिकारी जमीनी सच्चाइयों को ध्यान में रखकर समझौतों पर अमल नहीं करते। पूरी दुनिया में मछुआरों को घुमंतू या बंजारा समुदाय के रूप में जाना जाता है। दक्षिण एशिया का जातीय समीकरण और भौगोलिक बंटवारे में यह पहलू विशेष रूप से देखा जा सकता है। समुद्री किनारों पर बसे मछुआरों का संबंध दूसरे मुल्क के उन समुदायों से अत्यंत घनिष्ट है, जो उन्हीं की भाषा बोलते हैं, एक तरह दिखते हैं और आर्थिक जीवनशैली भी एक तरह की है। ऐसे हालात में राज्य द्वारा बनावटी रेखांकन महज राज्य की सार्वभौमिकता का प्रतीक बनकर रह जाता है, जिसका पालन व्यावहारिक जीवन में नहीं हो पाता। संयुक्त राष्ट्र संघ के समुद्री कानून के तहत समुद्री संप्रभुता का श्रेत्रफल 12 नॉटिकल माइल्स तक है। एक नॉटिकल्स माइल्स में 1852 मीटर होता है, लेकिन अक्सर भारत-बांग्लादेश के बीच और भारत-श्रीलंका के बीच ऐसी घटनाएं होती हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ के समुद्री नियमों के अनुसार ऐसे अपराध को आर्थिक अपराध की श्रेणी में रखा जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुच्छेद 145 के अंतर्गत मानवीय हितों और जान-माल की सुरक्षा की बात कही गई है। भारत और श्रीलंका दोनों संयुक्त राष्ट्र संघ के समुद्री नियमों का पालन करते हैं। फिर भी ऐसी दुर्घटनाएं क्यों हाती हैं। दरअसल श्रीलंका की सेना और नेवी को यह शक है कि तमिलनाडु से मछुआरों के रूप में तमिल टाइगर्स के हितैषी श्रीलंका में प्रवेश करते हैं और उन्हें खतरनाक किस्म के हथियारों की सप्लाई करते हैं। अगर इस पहलू को भारतीय नजर से देखा जाए तो श्रीलंका की सेना का शक बेबुनियाद और मनगंढ़त है। अन्य बातें पुरानी हो चुकी हैं। किसी भी तरीके का असलहा तमिल आतंकवादियों को नहीं दिया जाता। विशेषकर श्रीलंका सरकार की तमिल टाइगर्स पर विजय के उपरांत इस तरह के प्रश्न बिल्कुल नहीं उठने चाहिए। चिंता का विषय यह भी है कि भारत और श्रीलंका के बीच नए सिरे से आर्थिक और सामरिक समीकरण की तैयारी चल रही है। विगत के छह महीनों में प्रधानमंत्री से लेकर विदेश सचिव की वार्ता हुई है। अपने-अपने समुद्री इलाकों की सुरक्षा को लेकर दोनों देशों के बीच समझौते भी हुए हैं। बाहरी दुनिया की नजरें विशेषकर चीन की नीति श्रीलंका में स्थायी गढ़ बनाने की है। ऐसे माहौल में मछुआरों की हत्या दोनों देशों के संबंध में खटास पैदा करती है। इस दिक्कत का हल हर संभव खोजना होगा। इसमें ही दोनों देशों का हित है।
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