अमेरिका में ट्राई वैली विश्वविद्यालय के भारतीय छात्रों के साथ जिस प्रकार के सलूक करने की खबरें आ रही हैं, उनसे चिंता और क्षोभ पैदा होना स्वाभाविक है। विदेश मंत्री एसएम कृष्णा द्वारा कड़ा प्रतिवाद उचित जान पड़ता है। यह प्रश्न सबके मन में उठ रहा है कि छात्रों को टखने के नीचे रेडियो कॉलर क्यों पहना दिया गया? जीपीएस प्रणाली वाले इस इलेक्ट्रॉनिक उपकरण के द्वारा उनकी निगरानी की जा सकेगी। रेडियो कॉलर पहने छात्र की एक तस्वीर ने देश भर में उत्तेजना पैदा कर दी है। सामान्य प्रतिक्रिया यही है कि वे अपराधी नहीं हैं, जिनकी गतिविधियों पर हर क्षण नजर रखने की जरूरत हो। तो क्या वाकई अमेरिका भारतीय छात्रों के खिलाफ अमानवीय एवं अन्यायपूर्ण कार्रवाई कर रहा है? अमेरिकी अधिकारियों की मानें तो कैलिफोर्निया स्थित ट्राई वैली विश्वविद्यालय ने नियमों-कानूनों की अवहेलना तो की ही, वीजा मामले में भी धोखाधड़ी हुई है। इस विश्वविद्यालय के 95 प्रतिशत छात्र भारतीय हैं। इनकी संख्या 1,555 बताई गई है। अमेरिका में स्टूडेंट विजिटर इन्फॉर्मेशन सिस्टम डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्युरिटी का एक अंग है। इसमें वेब द्वारा विदेशी छात्रों पर नजर रखी जाती है। जब तक यह सक्रिय रहेगा, कोई शैक्षिक संस्थान ऐसे छात्र को अपने कैंपस में नहीं आने देगा। इस समय ट्राई वैली विश्वविद्यालय बंद है और इन छात्रों का भविष्य अधर में लटका हुआ है। अन्य विश्वविद्यालय में उनके प्रवेश का रास्ता नहीं बनता तो उनका कैरियर चौपट हो सकता है। इसमें ऐसा लगता है कि भारतीय छात्रों पर दोहरी मार पड़ी है। वे तो अमेरिका के एक विश्वविद्यालय में पढ़ने गए थे। अगर उस विश्वविद्यालय ने अमेरिका के नियमों का उल्लंघन किया तो इसकी सजा छात्रों को कैसे दी जा सकती है। छात्रों को अवैध अप्रवासी बताकर उनके साथ मुजरिमों-सा सलूक किया जाना पीडि़तों को ही उत्पीडि़त करने जैसा है। आइए, पूरी स्थिति को समझने की कोशिश करें। पिछले एक दशक से अमेरिकी महाविद्यालयों में नामांकन कराने वाले विदेशी छात्रों में सबसे ज्यादा संख्या भारतीयों की है। प्रतिवर्ष इनकी औसत संख्या 10-15 हजार है। ज्यादातर छात्र करीब 50 ऐसे श्रेष्ठ संस्थानों में प्रवेश के लिए प्रयास करते हैं, जो सख्त प्रवेश मानकों का पालन करते हैं। ये जीआरई, जीमैट के साथ अंग्रेजी जांच की टोएफेल परीक्षा भी लेते हैं। जाहिर है, इनमें प्राप्त अंकों के आधार पर नामांकन होता है और स्वीकृत छात्रों को विश्वविद्यालय आई-20 दस्तावेज भेजता है। इसके आधार पर छात्र दूतावास से एफ-1 छात्र वीजा प्राप्त करते हैं, लेकिन जो इनमें नामांकन से वंचित रह जाते हैं, वे दूसरे संस्थानों में नामांकन चाहते हैं और इनका लाभ उठाने वाली शैक्षणिक संस्थाएं खड़ी हो रहीं हैं। ये नामांकन प्रक्ति्रया को तो आसान बनाती ही हैं, अध्ययन के साथ रोजगार की स्वतंत्रता और कुछ अवसर भी उपलब्ध करा देती हैं। ऐसे संस्थानों ने जीआरई/जीमैट की अनिवार्यता समाप्त कर दी है। बस, उन्हें विभिन्न शुल्कों के तौर पर हजारों डॉलर प्राप्त होते रहें। यही नहीं, अन्य विश्वविद्यालयों में जहां डिग्री के बाद ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग (ओपीटी) एवं क्यूरिक्यूलर प्रैक्टिकल ट्रेनिंग (सीपीटी) कराई जाती है, वहीं ये विश्वविद्यालय नामांकन के साथ ही इसकी शुरुआत कर देते हैं। डिग्री के बाद अमेरिका में रोजगार का रास्ता इन प्रशिक्षणों से ही गुजरता है। ट्राई वैली विश्वविद्यालय इन्हीं में से है। मान्यता प्राप्त सुविख्यात विश्वविद्यालयों में सीपीटी/ओपीटी के लिए एक वर्ष पूर्णकालीक छात्र रहना पड़ता है। ट्राई वैली नामांकन के साथ ही इसे शुरू कर देता था। इसमें अनेक छात्रों को अंशकालिक रोजगार भी मिल जाता है। उन भारतीय छात्रों के लिए जो अमेरिकी नागरिक बनना चाहते हैं, ओपीटी/सीपीटी रोजगार आधारित वीजा यानी एच-1 बी से लेकर ग्रीन कार्ड एवं नागरिकता आदि तक जाने का पहला कदम होता है। इसके बाद यह समझना कठिन नहीं है कि ट्राई वैली में इतने छात्र क्यों गए। हालांकि इसके पास परंपागत रूप से विश्वविद्यालय मानकों के अनुसार कैंपस भी नहीं है। अप्रैल 2010 में खरीदा गया एक सामान्य भवन इसका केंद्र है। इसी में प्रशासनिक कार्यालय से लेकर क्लासरूम आदि सभी हैं। पता चल रहा है कि इनमें कभी-कभार ही कक्षाएं चलती थीं। अमेरिका भर में फैले इसके छात्रों को इंटरनेट के माध्यम से लेक्चर दिया जाता था, जिसे वे रोजगार के साथ जारी रख सकते थे। अमेरिकी कानून के अनसार एफ-1 स्टेटस वाले छात्रों को केवल ऑनलाइन कोर्स नहीं दिया जा सकता। इसकी मान्यता स्थगित रखते हुए इसे 30 विदेशी छात्रों के नामांकन की अनुमति दी गई थी, लेकिन इसने 1500 से ज्यादा छात्रों का नामांकन किया। इस प्रकार इसकी भूमिका गैरकानूनी बन जाती है। ट्राइ वैली की एक और विशेषता थी। इसकी स्थापना चीनी मूल के ईसाई सुसान जियाओ पींग सू ने की और यह चीनी ईसाइयों द्वारा संचालित है, जिसमें कुछ भारतीय भी हैं। इसकी घोषणा थी कि यह ईश्वर की महिमा के लिए ऐसे ईसाई वैज्ञानिक, इंजीनियर, व्यवसायी आदि पैदा करे, जिसे ठोस अकादमिक ज्ञान के साथ ईसाई मत का भी अध्ययन हो और विश्व पर प्रभाव कायम करने तथा प्रकाश की तरह चमकने के लिए यह ईसाई चरित्र, मूल्य एवं भावना के साथ काम करे। ईसाई मत आदि के नाम पर वहां मान्यता मिलना आसान है और चैरिटी के आवरण में नियमों में भी छूट मिल जाती है। ट्राई वैली कैलिफोर्निया के प्लीजांटन में अवस्थित था, पर इसके छात्र पूरे देश में फैले हुए थे। इनमें से अनेक नौकरियां कर रहे थे, जो अवैध है। 19 जनवरी को विश्वविद्यालय के मुख्य भवन पर छापे के साथ जो रिकॉर्ड मिला, उससे प्रशासन के लोग देश भर में छात्रों तक पहुंचे या फिर उनको उपस्थित होने का नोटिस दिया गया। कुछ मामलों में मामूली पूछताछ हुई, किंतु कुछ छात्रों से लंबी पूछताछ भी की गई। बांड सभी को भरना पड़ा। हां, किसी की राशि कम थी तो किसी की ज्यादा। कुछ ने स्वयं जाना स्वीकार नहीं किया तो उनका पासपोर्ट रख लिया गया और जिन मामलों में लगा कि वीजा नियमों का घोर उल्लंघन है या वीजा संदेहास्पद लगा, उनके टखनों पर अगली छानबीन तक के लिए इलेक्ट्रॉनिक उपकरण लगा दिया गया। इस प्रकार पूरे घटनाक्रम से कुछ बातें बिल्कुल साफ हैं। निस्संदेह, अमेरिकी प्रशासन की भूमिका सवालों के घेरे में है। आखिर इतने छात्रों का नामांकन वहां कैसे हुआ और उन्हें दूतावास ने एफ-1 वीजा कैसे जारी कर दिया? किंतु सारे छात्र या उनके अभिभावक स्थितियों से बिल्कुल अनभिज्ञ नहीं रहे होंगे। सच कहें तो अमेरिका में किसी प्रकार शिक्षा ग्रहण करने, रोजगार पाने और अंतत: वहां की सुख-सुविधाएं भोगने की लालसा ही आज उनकी दुर्दशा के कारण हैं। आज क्या हुआ? लालच में कुछ अनजाना शिकार बने तो कुछ जानते हुए फंसे। उन्हें धन हानि भी हुई, जलालत झेलनी पड़ रही है, नाम पर भी बट्टा लगा, समय नष्ट हुआ और कुछ को तो निश्चित तौर पर अमेरिका से बाहर धकेला जाएगा। अमेरिका के लिए तो यह शर्म की बात है कि ईसाइयत के नाम पर संस्थान इस प्रकार की धोखाधड़ी करता है। किंतु जो भारतीय छात्र गए थे, क्या वे ईसाइयत से सहमत होकर उसे अपनाने की तैयारी से गए थे? विश्वविद्यालय के उद्देश्य में यह साफ तौर पर लिखा है। मुख्य बात ध्यान में रखनी की यह है कि अमेरिका में आर्थिक संकट के कारण कंपनियां ऐसे विश्वविद्यालयों का लाभ उठाकर कर्मचारी प्राप्त करने लगी हैं। ऐसी कई कंपनियां सामने आई हैं, जो एच-1 बी वीजा की जरूरत से बचने के लिए ट्राई वैली जैसे संस्थानों की सीपीटी/ओपीटी आधारित एफ-1 वीजा का उपयोग करती थीं। एच-1 बी वीजा इस पर जोर देता है कि अमेरिकी कर्मचारियों का स्थानापन्न न किया जाए। साथ ही वेतनमान आदि के निश्चित नियम का पालन भी इसमें अनिवार्य है। एफ1 के साथ ऐसा नहीं है। उनमें प्रशिक्षण के नाम पर आप कम वेतन पर किसी को रख सकते हैं। जिस तरह अमेरिका सहित पूरे पश्चिम में बेरोजगारी बढ़ रही है, उसमें वहां के ज्यादातर छात्र, आम नागरिक विदेशियों को नौकरी दिए जाने के विरोधी हो रहे हैं। इस घटना के पीछे भी रोजगार से वंचित कुछ अमेरिकी युवाओं की भूमिका है, जिनने प्रशासन तक यह सूचना पहुंचाई। तो यह अमेरिका के लिए भले अपने गिरेबां में झांकने का मामला हो, पर अमेरिका या दूसरे पश्चिमी देशों में सुख भोगने को लालायित वर्ग के लिए भी कड़ी चेतावनी है। यहां ऑस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों के साथ सलूक भी याद करिए। कुल मिलाकर इस घटना की सीख यही है कि पश्चिम के मोह का परित्याग किया जाए, अन्यथा इससे ज्यादा धन और मान-सम्मान की हानि उठानी होगी। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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