Wednesday, February 2, 2011

अरब जगत में बदलाव


ट्यूनीसिया में सत्ता परिवर्तन के साथ ही अरब जगत में जिस तरह जन आक्रोश उमड़ पड़ा है वह एक व्यापक बदलाव के संकेत दे रहा है। ट्यूनीसिया के बाद यमन और मिस्र में जिस तरह सरकार विरोधी प्रदर्शन हो रहे हैं तथा कुछ और इस्लामी देशों में ऐसा होने के संकेत नजर आने लगे हैं उससे यह स्पष्ट है कि इन देशों की जनता अपने यहां के शासकों और शासन व्यवस्था से ऊब चुकी है। यह महज एक दुर्योग नहीं कि जिन भी देशों में सरकार विरोधी प्रदर्शन हो रहे हैं वहां ऐसे शासक हैं जो दशकों से सत्ता पर काबिज हैं। जहां कुछ देश तानाशाही व्यवस्था के प्रतीक हैं वहीं कुछ राजशाही के। ट्यूनीसिया में विद्रोह इसलिए पनपा, क्योंकि आम जनता गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई आदि से आजिज आ चुकी थी और वहां के शासक इस सबसे बेपरवाह नजर आ रहे थे। यमन, मिस्र की स्थितियां ट्यूनीसिया से कोई बहुत अलग नहीं हैं। विडंबना यह है कि ऐसी ही स्थितियां अन्य अनेक अरब देशों में भी हैं। फिलहाल यह कहना कठिन है कि इन देशों में बदलाव की बयार क्या गुल खिलाएगी, लेकिन जो स्पष्ट है वह यह कि उनका मौजूदा राजनीतिक ढांचा दरकने लगा है। इन स्थितियों में बेहतर यह होगा कि विश्व समुदाय इन देशों के शासकों को अपनी शासन व्यवस्था में सुधार के लिए प्रेरित करे। वैसे भी आम लोगों का आक्रोश यही इंगित कर रहा है कि अरब जगत के शासक या तो सुधरें या फिर सत्ता का परित्याग करें। दुनिया की निगाहें जितना अरब जगत और विशेष रूप से मिस्र, यमन, जार्डन आदि पर हैं उतनी ही अमेरिका पर भी। अब अमेरिका के लिए यह संभव नहीं कि वह अपने मित्र अरब देशों के शासकों की तानाशाही को तो सहन करे और अन्य अरब देशों के शासकों को सुधरने अथवा लोकतांत्रिक तौर-तरीके अपनाने की नसीहत दे। अमेरिका को इसका अहसास होना चाहिए कि ट्यूनीसिया के लोगों का संदेश सऊदी अरब जैसे देशों में भी जा सकता है। भले ही इस्लामी जगत के नेता ट्यूनीसिया, मिस्र, यमन के हालात की व्याख्या इस रूप में करें कि इन देशों में सरकार विरोधी प्रदर्शन इस्लाम आधारित क्रांति की आहट दे रहे हैं, लेकिन उनसे असहमत होने के पर्याप्त आधार मौजूद हैं। सबसे बड़ा आधार यह है कि इन देशों की जनता तानाशाही व्यवस्था और यथास्थिति से छुटकारा पाना चाहती है। शायद उसे अब यह अहसास हो गया है कि दुनिया किस तेजी से बदल रही है। मिस्र, यमन, जार्डन आदि के शासकों और साथ ही उनके मददगार पश्चिमी देशों को इसका आभास होना चाहिए कि ट्यूनीसिया से शुरू हुआ बदलाव अरब जगत को उन स्थितियों की ओर ले जा सकता है जिनसे एक समय साम्यवादी व्यवस्था वाले देश गुजरे। पश्चिमी देशों और विशेष रूप से अमेरिका के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वह अपने स्वार्थो को ध्यान में रखकर अरब जगत में अनावश्यक हस्तक्षेप करने से बचे। एक तो अरब जगत में अमेरिका की छवि अच्छी नहीं और दूसरे अभी ऐसे हालात नहीं कि इन देशों के लोग पश्चिमी रंग-ढंग के लोकतंत्र को अपनाने के लिए तैयार हों। अरब जगत और विश्व समुदाय के हित में यही है कि वहां जो भी बदलाव हो वह आम जनता की आकांक्षाओं के अनुरूप हो, न कि धार्मिक नेताओं के मन मुताबिक।



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