Monday, February 28, 2011

मप्र के दर्जनभर शहरों के नाम बदलने की कवायद


बंबई से मुंबई, कलकत्ता से कोलकाता, बेंगलोर से बेंगलूरू की तर्ज पर मध्य प्रदेश में भी करीब एक दर्जन शहरों के नाम बदलने की कवायद की जा रही है। होशंगाबाद को नर्मदापुरम् करने के बाद अब भोपाल को भोजपाल बनाने की तैयारी है। हालांकि कांग्रेस राज्य सरकार के इस कदम की विरोधी और उसने इसके खिलाफ आंदोलन की चेतावनी दी है। शिवराज सिंह की अगुआई वाली भाजपा सरकार के पास जबलपुर का नाम जाबालिपुरम, उज्जैन का उज्जयिनी, अवंतिका या अवंतिपुर, इंदौर का इंदुरधार धारा नगरी, महेश्र्वर का माहिष्मति, मंदसौर का दशपुर, अमरकंटक का आम्रकुट, मांडू का मांडवगढ़, विदिशा का भिलसा या देश नगर, ओंकारेश्र्वर का मांधाता और ग्वालियर का नाम गोपगिरिया करने का प्रस्ताव विचाराधीन है। उल्लेखनीय है कि कांग्रेस राज्य सरकार के इस कदम का विरोध कर रही है

छंटे नहीं हैं आशंकाओं के बादल


अभी दो हफ्ते पहले मिस्त्र की शांतिपूर्ण क्रांति के बारे में बहुत उत्साह से बात की जा रही थी। उसे रक्तहीन जनक्रांति कहा जा रहा था। आशा और उत्साह के उस अतिरेक पर शंका करने वालों को सनातन सनकी कहकर चुप रहने को मजबूर कर दिया गया था। कहा जा रहा था कि यह जमात कभी सकारात्मक पहलू देख ही नहीं सकती। यह ठीक है भी कि हालिया इतिहास में जनता की ऐसी एकता वाकई बहुत लंबे समय के बाद देखने को मिली थी, लेकिन आततायी सत्ता के प्रतीक होस्नी मुबारक के सत्ता छोड़ देने के उत्साह में लोग इस तथ्य पर ध्यान नहीं दे रहे थे कि इस बदलाव की बागडोर जनता को नहीं, बल्कि सेना को सौंपी गई है। ऐसा नहीं था कि यह सब दबे छिपे ढंग से हो रहा था, लेकिन जनता की हिम्मत और प्रतिबद्धता के इस विराट प्रदर्शन के आगे कोई सोच नहीं पा रहा था कि आखिर अंतरिम सत्ता सेना को क्यों सौंपी जा रही है। यह अपने आप में एक खतरनाक फैसला था। जिस बदलाव के लिए लाखों लोग महीनों तहरीर चौक पर खुले आसमान के नीचे राजकीय हिंसा को झेलते रहे, उसकी यह परिणति कैसे हुई कि सेना को लोकतांत्रिक संक्रमण का वाहक स्वीकार कर लिया गया? असल में जिस बात का डर था, वह अब शायद हकीकत बनने लगी है। 25 फरवरी को तहरीर चौक पर लोकतांत्रिक सुधारों की मांग करने आए प्रदर्शनकारियों के साथ सेना और पुलिस ने जैसा सुलूक किया उससे यह डर और गहरा ही होता है कि सेना कहीं जनता के इस स्वत: स्फूर्त आंदोलन का बीच में ही अपहरण न कर ले। सोशल मीडिया पर आने वाली रिपोर्टो से पता चल रहा है कि शांतिपूर्ण प्रतिरोध करने वाले लोगों पर पुलिस और सेना ने बिजली के कोडे़ इस्तेमाल किए, लोगों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा गया और महिलाओं के साथ बदतमीजी की गई। ध्यान रहे, मुबारक विरोधी प्रदर्शनों के दौरान महिला प्रदशर्नकारियों के साथ बेहद सम्मनाजनक व्यवहार किया गया था। विरोध का नेतृत्व करने वाले समूह ने महिलाओं से कहा था कि यौन हिंसा से बचने के लिए वे दोहरे कपडे़ पहनकर आएं, ताकि पुलिस और सेना के यौन हमलों से सुरक्षित रह सकें। यही नहीं, तब सेना ने भी निहत्थी भीड़ पर गोली चलाने से इनकार कर दिया था, लेकिन अब सेना के हाथ में सत्ता आने के बाद महिला प्रदर्शनकारियों खिलाफ फिर वही कुत्सित खेल शुरू हो गया है। मिस्त्र की इस क्रांति को इतिहास के फलक पर रखकर देखें तो हैरानी इस बात की होती है कि प्रदशर्नकारी संक्रमण काल के दौरान शासन का कामकाज सेना को सौंपने पर शायद इसलिए सहमत होना पड़ा, क्योंकि वहां लोकतांत्रिक संस्थाओं का ढांचा मौजूद नहीं था। इसे पता नहीं विडंबना कहा जाए या एक तार्किक परिणति कि मिस्त्र में अंदर ही अंदर उबल रहे इस जन-असंतोष के संगठनकर्ताओं ने पिछली सदी के उपनिवेश विरोधी आंदोलन से कोई सबक नहीं लिया। याद करें कि चौथे-पांचवें दशक के दौरान दुनिया के तमाम उपनिवेश राजनीतिक रूप से तो आजाद होने लगे थे, लेकिन वहां शासन का ढांचा लोकतांत्रिक नहीं बन पा रहा था। ज्यादातर देशों में सेना सत्ता में भागीदार होती जा रही थी और इसकी अहम वजह यह थी कि तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व ने यह तथ्य समझने के लिए जरूरी होमवर्क नहीं किया था कि लोकतांत्रिक चेतना को गहराई में रोपे बिना और जनता को स्व-शासन का अधिकारी माने बिना सेना के संभावित हस्तक्षेप से बचा नहीं जा सकता। हमारे सामने एशिया और अफ्रीका के उन तमाम पूर्व उपनिवेशों के उदाहरण हैं, जहां विदेशी शोषण से मुक्ति पाने का संघर्ष कितनी जल्दी सेना की सत्ता आकांक्षाओं की बलि चढ़ गया। भारत को छोड़कर लगभग हर जगह यही हालात सामने आए। इन उपनिवेशों में जनता के पक्ष में लड़ने वाले लोग दरअसल लोकतांत्रिक विचार और संस्थाओं में यकीन नहीं करते थे। उनके लिए आजादी का मतलब सिर्फ सत्ता का हस्तांतरण था। सत्ता के चरित्र में आमूल बदलाव लाना उनकी प्रतिबद्धता नहीं थी। उदाहरण के लिए इंडोनेशिया का अनुभव देखें तो वहां सुकर्णो लोकप्रिय नेता के रूप में उभरे। वे पश्चिमी साम्राज्यवाद के प्रखर विरोधी भी थे और अपने देश को धार्मिक जड़ता से निकालना चाहते थे, लेकिन देश की सैन्य राजनीति से पार पाना उनके लिए मुश्किल होता गया। अंतत: उनके खिलाफ सैन्य षड्यंत्र हुआ और सत्ता सैनिक कमांडर सुहार्तो के हाथों में आ गई। इस तरह आखिर में एक देश की लोकतांत्रिक आकांक्षा एक राजनीतिक विपर्यय में बदलकर रह गई। इसके बाद वहां जो शासकीय ढांचा उभरा, वह सेना की मौजूदगी से बुरी तरह त्रस्त था। आज भी इंडोनेशिया की संसद में सेना के लिए काफी सीटें आरक्षित रहती हैं। लगभग ऐसे ही हालात थाईलैंड में भी हैं। वहां पिछले साल लोकतंत्र समर्थकों और सेना के बीच बार-बार हिंसक टकराव हुए। अफ्रीका के नवस्वाधीन देशों में भी लोकतंत्र का यही हश्र हुआ। वहां लोकतांत्रिक चेतना करिश्माई नेताओं की स्वेच्छाचारिता का शिकार हो गई। ऐसे में भारत में लोकतंत्र के स्थायित्व का स्मरण करना एक तरह से लोकतंत्र के मूल्यगत तकाजों को भी याद करना है। यह ठीक है कि भारत में लोकतंत्र अभी भी सामाजिक बराबरी या अवसरों की समानता के रूप में स्थापित नहीं हो पाया है। आपातकाल आज भी लोकतंत्र के साथ एक छल के रूप में लोगों की स्मृति में अंकित है, लेकिन उसके बाद देश में लोकतंत्र की बहाली को हमारे संविधान निर्माताओं और स्वाधीनता आंदोलन के प्रणेताओं की दूर-दृष्टि माना जाना चाहिए कि उन्होंने शासकीय ढांचे में सेना को किसी भी ढंग से शामिल नहीं होने दिया। व्यापक निरक्षरता के बावजूद उन्होंने जनता के विवेक और उसकी स्व-शासन की आकांक्षाओं का सम्मान किया। इसके उलट भारत के आसपास या उसके बाद आजाद होने वाले देशों में यही काम नहीं किया गया। लोकतांत्रिक मूल्यों, चेतना और जनता के स्वशासन के विचार को पालने-पोसने और उसे सही दिशा देने की जिम्मेदारी नहीं उठाई गई। शायद यह भी एक कारण है कि पाकिस्तान से लेकर मिस्र तक राजनीतिक बदलाव का मतलब हमेशा कुछ करिश्माई राजनेताओं को सत्ता पर कब्जा करना फिर तख्ता पलट तक सीमित रहा। आज मिस्त्र की जनता की लोकतांत्रिक आकांक्षा पर जिस तरह सेना का साया मंडरा रहा है, उसे वहां शासन के ढांचे में जनता के स्वशासन के विचार की अनुपस्थिति का परिणाम ही कहा जाएगा। लोगों का यह डर गलत नहीं है कि कहीं होस्नी मुबारक को हटाकर सेना खुद सत्ता पर काबिज न हो जाए। फिलहाल यह एक आशंका है, लेकिन आशंकाओं को हकीकत बनते देर नहीं लगती। अगर ऐसा हुआ तो इतिहास में हम मिस्त्र के इस अध्याय को एक ऐसी क्रांति के रूप में याद करेंगे, जो जनता की तमाम हिम्मत, त्याग और संकल्प के बावजूद इसलिए असफल हो गई क्योंकि वहां लोकतंत्र को शासन की सच्चाई में बदलने के लिए मूल ढांचा मौजूद नहीं था। अत: यह अलग से कहने की जरूरत नहीं है कि मिस्त्र की जनता की मुक्ति सिर्फ सेना को सत्ता से हटाकर पूरी नहीं होगी। उसके लिए जनता के पक्षधरों को लोकतंत्र के लिए जमीन भी तैयार करनी होगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

Saturday, February 26, 2011

ताजा हमले में १०६ की मौत


अच्छा-बुरा तालिबान


तालिबान के वर्गीकरण पर लेखक की टिप्पणी
कुछ लोग पाकिस्तान और अफगानिस्तान को गृह युद्ध से बचाने के लिए कथित अच्छे तालिबान से बातचीत करने की पैरवी करते हैं, तो कुछ का मानना है कि दोनों तालिबानों में बुनियादी अंतर नहीं है और किसी भी तालिबान से बातचीत करने का कोई औचित्य नहीं है। लेकिन इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान में तालिबान हैं और वे उन मुस्लिम देशों में अपने पंजे फैला सकते हैं, जहां तानाशाह और जन-विरोधी शासकों के खिलाफ व्यापक जन आंदोलन हो रहे हैं। इन हालात में सवाल उठ रहे हैं कि अच्छे तालिबान कौन हैं, कहां हैं और एक अच्छे तालिबान ने अब तक क्या अच्छा किया है? इस बात की अनदेखी नहीं की जा सकती कि तालिबान की कोई राष्ट्रीयता नहीं है और उन्हें इसका कोई पछतावा भी नहीं है। उनका एकमात्र एजेंडा आतंक के जरिए सत्ता हासिल करना है। सर्वविदित है कि तालिबान अच्छे हों या बुरे वे उग्रवाद, असहिष्णुता और कट्टरपंथ का ही पाठ पढ़ाते हैं और उनके जिहाद के यही तीन साधन हैं। हाल ही में, पाकिस्तान पंजाब के उदारवादी गवर्नर सलमान तसीर की उनके कट्टरपंथी अंगरक्षक मुमताज कादरी ने हत्या कर दी थी। उनकी हत्या से दो बातों का खुलासा होता है। पहली, पाकिस्तान के पुलिस प्रशासन में आतंकियों की घुसपैठ हो गई है। दूसरी, ये लोग पाकिस्तान में उदारपंथियों की आवाज को दबाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। सलमान तसीर की हत्या पर अच्छे तालिबान की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है और वे सामने आ कर अपने अच्छेपन का सबूत देने की हिम्मत नहीं कर रहे हैं। वे किस प्रकार के अच्छे पाकिस्तानी और अच्छा पाकिस्तान बनाना चाह रहे हैं? जहां कहीं भी अलगाववाद, आत्मघाती बम हमले और सड़कों पर हिंसा की घटनाएं होती हैं, तालिबान वहां अवश्य ही मौजूद होते हैं। पंजाब, सिंध, खैबर पख्तूनख्वा, बलूचिस्तान तथा अफगानिस्तान के विभिन्न पख्तून, ताजेक और उज्बेक इलाकों तथा विवादास्पद उत्तरी इलाकों में विभिन्न तालिबान समूहों में तरह-तरह के मुखौटे ओढ़े जातीय अलगाववाद के विभिन्न सूत्र नजर आते हैं। इन दिनों उत्तरी और पश्चिमी पंजाब बनाने के लिए पंजाब के एक और विभाजन की मांग करने वाले सेराइकी आंदोलन की आड़ में तालिबान आतंकवादी और उनके पिछलग्गू अपनी गतिविधियां चला रहे हैं। लश्कर-ए-झंगवी ऐसा ही एक कुख्यात कट्टरपंथी आतंकवादी संगठन है। सितंबर 2009 में स्वात का नियंत्रण फिर से सेना के हाथ में आ जाने के बाद से तालिबान द्वारा सार्वजनिक रूप से कोड़े मारने और फांसी पर लटकाए जाने की घटनाएं लगभग बंद हो गई हैं। इसके बावजूद, ह्यूमन राइट्स वाच को जिले में सेना और पुलिस द्वारा उत्पीड़न की खबरें मिल रही हैं। इनमें मार डालने, मनमर्जी से हिरासत में लेने, जबरन बेदखल करने और घरों को गिरा देने की घटनाएं शामिल हैं। ह्यूमन राइट्स वाच ने इनमें से कुछ आरोपों की जांच की और कई लोगों को मौत के घाट उतारे जाने के मामले भी दर्ज किए हैं। ह्यूमन राइट्स वाच की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान सुरक्षा बलों पर संदिग्ध बलूच उग्रवादियों को जबरदस्ती गायब करने के आरोप लगाए जाते रहे हैं। उग्रवादी संगठनों ने गैर-बलूची नागरिकों, शिक्षकों और शिक्षा सुविधाओं पर हमले तेज कर दिए। 2010 में जनवरी-अक्टूबर के दौरान नौ शिक्षाकर्मी मारे गए। क्या तालिबान के साथ समझौते से पाकिस्तान और अफगानिस्तान में सुरक्षा और स्थिरता मजबूत होगी? तब तक तो नहीं, जब तक कि सुशासन या समझौतों के जरिए नागरिक व सैन्य प्रतिष्ठान तथा धार्मिक व आतंकवादी संगठनों को मानवाधिकारों के उल्लंघन से नहीं रोका जाता। दुश्मन से गलबहियां डालने से बात नहीं बनेगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

बातचीत की बेजा बेचैनी


अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की जोरदार पैरवी के बावजूद रेमंड डेविस का मामला लाहौर हाईकोर्ट की कानूनी प्रक्रिया में उलझ रहा है। पाकिस्तानी अमेरिका की मजबूरियों से खेलना सीख गए हैं। अरबों डॉलर की सैनिक-असैनिक अमेरिकी मदद का पाकिस्तान कोई अहसान नहीं मानता। पाकिस्तान की सड़कों पर खुलेआम अपराध, अराजकता इस हद तक बढ़ी हुई है कि आम नागरिकों का जीना मुहाल हो गया है। डेविस ने अमेरिकी होने के गुरूर में लूट के प्रयास का उसी भाषा में जवाब देना चाहा, लेकिन वह मुश्किलों में फंस गए। अगर आप पाकिस्तान में हफ्ता-दस दिन गुजार कर आएं तो अपना भारत वाकई महान दिखेगा। वरिष्ठ पत्रकार एवं पूर्व विधायक तनवीर हैदर उस्मानी का हालिया वृत्तांत हैरत में डालने वाला है। पाकिस्तान में किसी भी भारतीय को अपनी आमद दर्ज कराने पुलिस मुख्यालय जाना पड़ता है। पुलिस मुख्यालय कराची की इंडियन सेल के रजिस्टर में नाम दर्ज करने के लिए तनवीर हैदर से 25 हजार रुपये की मांग की गई। किसी तरह बात दस हजार पर बनी। पैसे तो अलग, सिगरेट का पैकेट भी बड़ी बदतमीजी से झपट लिया गया। सौभाग्य से उसी वक्त कराची के पुलिस कमिश्नर का काफिला आ पहुंचा। स्टाफ की मुट्ठियां गरम कर उन्होंने कमिश्नर तक अपना कार्ड पहुंचाया। भारत की एक प्रमुख पार्टी के नेता का कार्ड देख कर पुलिस कमिश्नर उन्हें बड़ी इज्जत से अपने आफिस में ले गए। उस्मानी साहब ने सारी कहानी बयान की। कहा कि हम दोनों देश एक ही जैसे हैं, लेकिन रेट का फर्क जबरदस्त है। हमारे यहां का पुलिसवाला शायद सौ-दो सौ रुपये तक की मांग करता। इस काम के लिए पच्चीस हजार तो वह सोच भी नहीं सकता। शर्मसार पुलिस कमिश्नर ने तुरंत ही सारी इंडियन सेल को लाइनअप किया। तलाशी में हिंदुस्तानियों से दिन भर की वसूली के सोलह लाख रुपये मिले। सिगरेट का पैकेट भी बरामद हुआ। साफ दिखा कि हमें जिहाद एक्सपोर्ट करने वाले मौका पाते ही हमारी जेबें काट लेते हैं। बहरहाल, पूरी की पूरी इंडियन सेल को सस्पेंड कर दिया गया। उस्मानी साहब एक पारिवारिक शादी में भाग लेने वहां गए थे। नई मर्सिडीज गाड़ी सजने के लिए भेजी गई। चाइनीज पिस्टल दिखाकर गाड़ी, मोबाइल, पैसे वगैरह सब छीन लिए गए। पुलिस कमिश्नर के दखल के बाद भी गाड़ी नहीं मिली। जब मिली तो उसके अंजर-पंजर ईंटों पर रखे थे। गाड़ी के टायर, इंजन, सीटें और जो भी खोला जा सकता था, सब गायब था। शादी के घर की रखवाली के लिए एके 47 लिए दो गार्ड दरवाजे पर खड़े थे। पूछा, यह क्या है? जवाब मिला कि ये गार्ड न हों तो शादी के घर से सारा माल-असबाब लुट जाए। यहां बाजारों में कभी कोई पर्स नहीं खोलता। पैसे कॉलर से लेकर मोजे तक कई जगहों पर छिपाने पड़ते हैं। पाकिस्तान में न्याय एके 47 की गोलियों से निकलता है। यह पता ही नहीं होता कि फौज, लोकतंत्र और तालिबान में से कौन कहां ताकतवर हो जाए। जिहाद को जिंदाबाद बोलते पाकिस्तान का बस खुदा ही मालिक है। पाकिस्तान बनवाने वाले हमारे यूपी, बिहार से गए मुहाजिरों का और भी बुरा हाल है। वे रिफ्यूजी के रिफ्यूजी ही रह गए। आज के पाकिस्तान में उनकी हैसियत सबसे निचले दर्जे की है। वे रोते हैं अपने गांव, अपने वतन के लिए। बाराबंकी से गए एक बुजुर्ग ने दरख्वास्त की थी कि हमारे गांव की मिट्टी लेते आना। तनवीर भाई ने बताया कि अपने गांव की मिट्टी अपने माथे पर लगाते वक्त उनके चेहरे पर जो खुशी का भाव था उसे वे ताउम्र नहीं भूल पाएंगे। एक भरे-पूरे देश में अपनी जिंदा संस्कृति छोड़कर वह उस देश में चले गए हैं जो अभी तक बसा ही नहीं है। वह बंटवारे के दिन को कोसते हैं। वह वापस अपने गांवों, कस्बों में दफन होना चाहते हैं। कोई पूछता है-दंगों में तो बहुत से मुसलमान मारे जाते होंगे। तनवीर भाई ने जवाब दिया-नहीं, दंगे कम हो गए हैं। ऐसे मौकों पर मुल्क हमारा साथ देता है। समस्या तुम्हारी वजह से है। तुम्हारी वजह से हम पर पाकिस्तानी सोच के इलजाम लग जाते हैं। पाकिस्तान ऐसा देश है, जिसे शायद ही कहीं सम्मान से देखा जाता हो। न जाने क्यों हम पाकिस्तान से वार्ता के लिए बेचैन रहते हैं। जिनके वजूद का कोई ठिकाना नहीं, उनसे होने वाली वार्ताओं का अर्थ भी क्या है? कश्मीर कोई समस्या नहीं, सिर्फ एक बहाना है। 26/11 एक मजाक बन कर रह गया है। अब फिर से मुशर्रफ फार्मूले की बातें हो रही हैं। पाकिस्तानी राजनयिक आस्तीनों में मुंह छिपाकर हंसते होंगे। कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, यह कहने के बाद दूसरी सांस में वार्ताओं के बयान का दोमुंहापन हमें कहां ले जाएगा? नेहरू ने इस देश को विदेश नीति की प्रयोगशाला बनाने की कोशिश की थी। इसकी परिणति कश्मीर और चीन सीमा विवाद जैसी स्थायी समस्याओं के रूप में हुई है। अगली पीढि़यां अपना सिर धुनेंगी कि पाकिस्तान हमारे लिए एटम बमों के जखीरे बनाता गया और हम उन्हें वार्ताओं के गुलदस्ते पेश करते रहे। (लेखक पूर्व सैन्य अधिकारी हैं)

अब इराक के तहरीर चौक पर उमड़ा जन सैलाब


इराक में शुक्रवार को हुए प्रदर्शनों में कम से कम नौ लोग मारे गए, जबकि हजारों की संख्या में लोगों ने आर्थिक सुधारों, बेहतर सामाजिक सेवा, रोजगार के अवसर और भ्रष्टाचार पर रोक लगाने की मांग को लेकर सख्त सुरक्षा के बीच विरोध प्रदर्शन किए। समाचार एजेंसी डीपीए के मुताबिक धार्मिक और सरकारी अधिकारियों ने लोगों से बगदाद के तहरीर चौक और अन्य शहरों में प्रदर्शन न करने की चेतावनी दी थी। इसके बावजूद लोगों ने चेतावनी का उल्लंघन करते हुए प्रदर्शन किया। अधिकारियों का आरोप है कि आतंकवादी संगठन अल कायदा और पूर्व नेता सद्दाम हुसैन के निष्ठावानों द्वारा इन प्रदर्शनों की साजिश रची गई है। सुरक्षाबलों द्वारा इराक के उत्तरी शहर मोसुल में की गई गोलीबारी में पांच प्रदर्शनकारी मारे गए और दर्जनों घायल हुए। प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि प्रदर्शनकारी एक स्थानीय सरकारी इमारत में घुसने का प्रयास कर रहे थे। इसके अलावा किर्कुक के उत्तर में स्थित हवेजा कस्बे में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हुई झड़पों में भी चार लोग मारे गए। प्रांतीय परिषद के भवन में आग लगाने के लिए शुक्रवार सुबह करीब 2000 प्रदर्शनकारी यहां जुटे थे। प्रदर्शनकारियों ने शुक्रवार के दिन को रेवॉल्यूशन ऑफ इराकी रेज का नाम दिया है, जिसका मतलब है कि इराक में क्रांति की लहर। राज्यपाल पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए बसरा के दक्षिणी शहर में करीब 4000 लोगों ने धरना दिया। अलसुमारिया अखबार के मुताबिक प्रदर्शन के कुछ ही घंटों बाद राज्यपाल शेल्ताग अब्बूद ने इस्तीफे की घोषणा कर दी है। उल्लेखनीय है कि प्रदर्शनकारियों पर कथित रूप से बल प्रयोग करने और मीडिया पर पाबंदी लगाने पर प्रधानमंत्री नूरी अल-मलिकी की सरकार को आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। अमेरिका स्थित ह्यूमन राइट्स वाच (एचआरडबल्यू) ने कहा कि इस सप्ताह के पहले बगदाद में इराकी पुलिस ने हत्यारों को शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर हमले करने की इजाजत दी थी

Friday, February 25, 2011

सेना विद्रोहियों के साथ


क्रांति का बढ़ता कारवां


ट्यूनीशिया-मिस्र में जन आंदोलन से जिने अल अबेदीन बेन अली और होस्नी मुबारक की सत्ता उखड़ने के बाद यमन, बहरीन, लीबिया, जॉर्डन, ईरान सहित अरब और उत्तर अफ्रीकी देशों में सत्ता विरोधी लहर चल रही है। हालांकि इसका आंशिक प्रभाव चीन, यूनान और इटली में भी देखने को मिला, लेकिन इन देशों में छिटपुट प्रदर्शन हुए, जिन्हें अरब और उत्तर अफ्रीकी देशों की रक्तहीन क्रांति से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। वैसे यह पहली बार नहीं हो रहा, जब क्रांति की आग एक साथ कई जगह फैली हो। इससे पहले वर्ष 1848, 1968 और 1989 में भी ऐसा ही दौर अया था। वर्ष 1848 की यूरोपीय क्रांति उदारवादी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए हुई। इसने पश्चिम और मध्य यूरोपीय देशों को प्रभावित किया। 1968 के दौरान मैक्सिको सिटी, पेरिस, न्यूयॉर्क सहित कई जगहों पर वामपंथी लहर चली। इसी दौर में चीन की मशहूर सांस्कृतिक क्रांति को भी दुनिया ने देखा। 1968 की इस क्रांति ने वामपंथी और कट्टरपंथी विचार का प्रसार किया। इसके बाद वर्ष 1989 में क्रांति हुई, जिसने पूर्वी यूरोप को प्रभावित किया। 1992 तक चलने वाली यह क्रांति सोवियत संघ के विघटन का कारण बनी। इस क्रांति ने साम्यवादियों को हाशिए पर पहुंचा दिया। अब 2011 की रक्तहीन क्रांति की बात करते हैं। जैसा कि सभी जानते हैं कि इसका प्रभाव अरब-उत्तर अफ्रीकी देशों में है। अभी तक जिन-जिन देशों में क्रांति की यह चिंगारी पहुंची है, उनमें स्थिति लगभग समान है। सबसे पहली समानता प्रभावित देशों में या तो राजशाही है या तानाशाही। ट्यूनीशिया, मिस्र, लीबिया, बहरीन, यमन, जॉर्डन आदि में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हाल भी लगभग एक जैसा ही है। इन सभी देशों में लंबे समय से एक ही शासक का साम्राज्य स्थापित है। ट्यूनीशिया के राष्ट्रपति बेन अली ने 23 वर्षो तक शासन किया तो होस्नी मुबारक मिस्र की सत्ता पर 30 वर्षो से अधिक समय तक काबिज रहे। लीबिया के शासक मुअम्मर गद्दाफी को 41 साल हो गए हैं। बहरीन का सुन्नी शाही परिवार भी वर्षो से शिया बहुल आबादी पर राज कर रहा है। मुबारक की सत्ता उखड़ने के बाद मिस्र में सेना शासन संभाल रही है तो ट्यूनीशिया में अंतरिम सरकार देश चला रही है। बाकी बचे लीबिया, बहरीन और यमन में आंदोलन अभी जारी है। इस समय जहन में एक ही सवाल चल रहा है कि क्या अरब-उत्तर अफ्रीकी देशों में रक्तहीन क्रांति रंग ला पाएगी? जो लोग मिस्र-ट्यूनीशिया में क्रांति को सफल कह रहे हैं, उन्हें समझना होगा कि इन दोनों देशों ने अभी कुछ हासिल नहीं किया, बल्कि पहली बाधा पार की है। वर्ष 1848 की यूरोपीय क्रांति की लहर ने 2011 की रक्तहीन क्रांति से भी ज्यादा देशों को अपनी चपेट में लिया था और आंदोलन की रफ्तार भी इससे कहीं तेज थी। बदलाव उस समय भी हुआ था, लेकिन परिवर्तन स्थिर नहीं रह सका, इसलिए 1848 की क्रांति को सफल नहीं माना गया। इसकी शुरुआत फ्रांस में राजशाही के खिलाफ हुई थी। परिणामस्वरूप राजशाही का खात्मा हुआ और लोकतांत्रिक सरकार गठित हुई, लेकिन चार साल बाद वहां फिर राजशाही आ गई। इसी प्रकार से यूरोप के बाकी देशों में भी परिवर्तन तो आए, लेकिन व्यवस्था में पूर्ण बदलाव का सपना अधूरा रह गया। 1848 की क्रांति का जिक्र यहां इसलिए भी अधिक हो रहा है, क्योंकि 2011 की रक्तहीन क्रांति इससे काफी मिलती है। उस वक्त भी आम आदमी अगुआ था और आज भी है। 1848 की क्रांति माओ की सांस्कृतिक क्रांति की तरह न तो संगठित थी और न ही विकल्प प्रदान करने वाली थी। 2011 की कलर रेवॉल्यूशन में शामिल देश ट्यूनीशिया, मिस्र, जॉर्डन, बहरीन, यमन व लीबिया में भी कमोबेश ऐसी ही स्थिति है। केवल मिस्र में मुस्लिम ब्रदरहुड एकमात्र संगठित विपक्षी दल है, लेकिन सत्ता संभालने के लिए वह खुद को तैयार करने में लगा है। यही हाल ट्यूनीशिया का है, जबकि यमन, बहरीन, लीबिया, जॉर्डन की स्थिति और दयनीय है। ये देश तो अभी मौजूदा शासन को ही नहीं उखाड़ पाए हैं। दरअसल, सत्ता उखाड़ फेंकने के लिए इतने व्यापक प्रदर्शनों की जरूरत है कि संपूर्ण व्यवस्था पंगु हो जाए। इसके बाद प्रदर्शनकारियों का सामना सुरक्षाबलों से होता है और किसी भी क्रांति को यहीं से दिशा मिलती है। शासन या तो प्रदर्शनकारियों को कुचल देता है या फिर सेना जनता के साथ आ जाए। सेना के साथ आए बगैर मौजूदा परिदृश्य में क्रांति सफल होने के आसार कम ही हैं। मिस्र-ट्यूनीशिया में सेना के समर्थन से ही सत्ता परिवर्तन हो सका। बहरीन भी इसी राह पर है, वहां प्रदर्शनों का सिलसिला जारी है। आंदोलनरत शियाओं के लिए यह अच्छा संकेत है। 1979 की ईरानी क्रांति के समय भी ऐसा ही हुआ था। युवाओं ने पूरी व्यवस्था ठप कर दी थी और वे व्यवस्था में संपूर्ण बदलाव कर पाए। हालांकि लीबिया में स्थिति अलग है, वहां सेना बंटी हुई है। इसके अलावा वहां इस्लामिक मिलिशिया सशस्त्र विद्रोह कर रहे हैं, इसलिए लीबिया में जो रहा है, वहां रक्तहीन क्रांति का प्रभाव तो है, लेकिन इसे रक्तहीन क्रांति कहना उचित नहीं होगा। लीबिया में मौजूदा क्रांति को खूनी विद्रोह कहना ठीक होगा। विशेष रूप से अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों के लिए यह अच्छा संकेत नहीं है। हालांकि वे पूरी कोशिश कर रहे हैं कि आंदोलन का परिणाम लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना के रूप में निकले, क्योंकि वे कट्टरपंथियों को मौके का लाभ उठाने से रोकना चाहते हैं। यह कहना मुश्किल है कि अमेरिका या बाकी पश्चिमी देश उन्हें निश्चित रूप से रोक पाएंगे, क्योंकि मौजूदा बदलाव में उनकी भूमिका आंशिक है। अरब-अफ्रीकी देशों में 2011 की रक्तहीन क्रांति का मतलब पश्चिम के लिए आज भी वैसा ही है, जैसा 1950 से लेकर 1970 के दौरान था। उस वक्त भी अरब-अफ्रीकी देशों में विदेशी ताकतों के समर्थन से चल रहे साम्राज्य उखाड़ फेंके गए। गद्दाफी ने 1969 में विदेशी समर्थन प्राप्त राजशाही समाप्त कर सत्ता संभाली। ईरान में भी 1979 में ऐसा ही हुआ, लेकिन अरब-अफ्रीकी मुस्लिम देशों का दुर्भाग्य रहा कि परिवर्तन के बाद भी उनका शासन विदेशी ताकतों के हाथों में ही रहा। दरअसल, वहां जब-जब सत्ता विरोधी लहर चली, तब-तब जनता के पास विकल्प मौजूद नहीं रहे। इसका परिणाम यह निकला कि कोई छोटा समूह, व्यक्ति विशेष या सेना ने मौके का लाभ उठाया। इराक-बहरीन जैसे शिया बहुल देशों में सुन्नी शाही शासक सद्दाम हुसैन और हमाद बिन ईसा अल खलीफा का साम्राज्य स्थापित होना इसी समस्या को दर्शाता है। मिस्र में भी पूर्व की क्रांति का हाल ऐसा ही रहा। हाल में पद छोड़ने वाले होस्नी मुबारक ने 30 वर्षो तक राज किया। वह अनवर अल सादत की हत्या के बाद सत्ता में आए। सादत मिस्र के तीसरे राष्ट्रपति थे, वह उस फ्री ऑफिसर्स संगठन में शामिल थे, जिसने 1952 में हुई मिस्र की क्रांति के दौरान मोहम्मद अली के साम्राज्य का अंत किया। इसके बाद गमाल अब्देल नसीर राष्ट्रपति बने। नसीर के भरोसेमंद सादत ने 1970 से 1981 तक राज किया। उनके बाद होस्नी मुबारक ने कमान संभाली और उन्होंने भी वही किया। इसी प्रकार से लीबिया में गद्दाफी क्रांति के नायक बनकर उभरे और 41 वर्षो से सत्ता पर काबिज हैं। फ्रांस से आजादी पाने के बाद ट्यूनीशिया में हबीब बुर्गिबा ने 1957 में कमान संभाली, लेकिन उन्होंने जीवनभर फ्रांस के इशारे पर कार्य किया। बुर्गिबा से लोग त्रस्त हो गए तो बेन अली ने फ्रांस के इशारे पर उनका तख्तापलट किया। इस बार भी परिवर्तन का परिणाम वही हुआ। इसमें शक नहीं कि 2011 की कलर रेवॉल्यूशन और पिछले सत्ता परिवर्तनों में काफी अंतर है। इस बार क्रांति का नायक कोई सैन्य कमांडर नहीं है, लेकिन विकल्प की पुरानी समस्या बरकरार है। ऐसे में अराजकता फैलने का भी भय बना हुआ है। अरब-अफ्रीकी देशों की जनता जिस प्रकार का बदलाव चाहती है, उसके लिए चार बातें अहम हैं। सबसे पहले जिन-जिन देशों में क्रांति जारी है, वहां मौजूदा शासन खत्म होना चाहिए। इसके बाद लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर बहस हो और फिर आम चुनाव से पहले विकल्प के तौर पर सुसंगठित दल सामने आएं। बाद में लोकतांत्रिक सरकार गठित हो और फिर जो दल सरकार बनाए वह जनता की इच्छा का सम्मान कर लोकतंत्र की डगर पर चले, तब जाकर अरब-अफ्रीकी देशों में जारी यह रक्तहीन क्रांति हो पाएगी। (लेखक दैनिक जागरण से जुड़े हैं)