Sunday, January 9, 2011

विभाजन की ओर सूडान

एक अविभाज्य राष्ट्र के रूप में सूडान अपनी आखिरी सांसें गिन रहा है। अगर कुछ अप्रत्याशित नहीं घटा तो कुछ ही दिनों में विश्व मानचित्र में एक सूडान की बजाय दो सूडान नजर आएंगे। दरअसल 9 जनवरी से लेकर 15 जनवरी के दौरान दक्षिण सूडान में यह जनमत संग्रह कराया जा रहा है कि दक्षिण सूडानवासी एकीकृत सूडान का ही हिस्सा बना रहना चाहते हैं अथवा वह विभाजन चाहते हैं। प्रबल संभावना यही है कि दक्षिण सूडान स्वतंत्रता की मांग करेगा। यह जनमत संग्रह 2005 में हुए उस शांति समझौते का हिस्सा है जिससे उत्तरी और दक्षिणी सूडान के बीच लगभग दो दशक से चल रहा गृहयुद्ध खत्म हो गया था। सूडान की राजधानी खारतूम में बैठे सत्ताधीशों ने यह तथ्य स्वीकार कर लिया है कि दक्षिण सूडान स्वतंत्र होने के लिए ही मतदान करेगा। सूडानी राष्ट्रपति उमर-अल बशीर भी इस हकीकत से वाकिफ हो चुके हैं कि वोट अलगााव के पक्ष में ही होगा। उत्तर वालों ने दक्षिण वालों के साथ दोयम दर्जे का बरताव किया है। दक्षिण सूडानवासियों का यह भी मानना है कि ईसाई होने के कारण उनका धार्मिक आधार पर भी उत्पीड़न हुआ है। राजधानी खार्तूम में जहां कुछ महीने पहले तक अलगाव की संभावना अकल्पनीय-सी थी वहां माहौल थोड़ा उदासी और चिंता भरा है, जबकि दक्षिण सूडान में माहौल उत्साहजनक है। करीब चालीस लाख लोगों ने वोट करने के लिए पंजीकरण कराया है। चुनाव में यह प्रावधान रखा गया है कि साठ प्रतिशत पंजीकृत रजिस्टर्ड मतदाताओं के मतदान करने पर ही जनमतसंगा्रह को वैधता हासिल होगी। उत्तर सूडान के अलावा अमेरिका, कनाडा, केन्या, इथियोपिया, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन व युगांडा में रह रहे दक्षिण सूडानवासी भी अपना मत डाल सकेंगे। विभाजन के बाद भी दक्षिण सूडान की सारी समस्याएं छूमंतर नहीं होने वाली। हालांकि धन की कमी दक्षिण सूडान में नहीं होगी। व्यापक निरक्षरता और मूलभूत सुविधाओं की कमी जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने में स्पीडब्रेकर का काम करेगी। शांति बहाली में सबसे बड़ी बाधा यह होगी कि किस प्रकार दोनों सूडान तेल की कमाई का बंटवारा करते हैं। दरअसल दक्षिण सूडान तेल से संपन्न इलाका है। सूडान का तीन-चौथाई तेल दक्षिण से ही निकलता है जहां से पाइपलाइनों से उत्तर के इलाके में ले जाया जाता है फिर वहां तेल का परिशोधन करके उसे बेचा जाता है। अलगााव के बाद तेल से भरपूर क्षेत्र को खोना सूडान के राष्ट्रपति उमर-अल बशीर के लिए एक बड़ा झटका होगा। उम्मीद है कि कुछ समय के लिए तेल के बंटवारे पर कोई संधि की जाएगी जिससे हिंसा को रोका जा सके। इसके अलावा उत्तर और दक्षिण की सीमाओं का निर्धारण करना भी टेढ़ी खीर होगी। उत्तर में रहने वाले ईसाईओं और दक्षिण में रह रहे मुसलमानों के भविष्य को लेकर भी आशंकाएं हैं। विश्र्व राजनीति में सूडान का नाम जिहादी आतंकवाद, गरीबी और नस्लीय झगड़ों लिए ही लिया जाता है। वर्तमान राष्ट्रपति बशीर पर नरसंहार के लिए अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में मुकदमा संयुक्त राष्ट्र की देखरेख में 2005 में गृहयुद्ध को समाप्त करने के लिए एक शांति समझौता किया गया था जिसके तहत अ‌र्द्धस्वायत्त दक्षिण सूडान की सरकार का गठन हुआ। साथ ही संयुक्तराष्ट्र ने सूडान में अपना एक विशेष मिशन भी स्थापित किया था। भारत और सूडान के ऐतिहासिक रिश्ते रहे हैं और सूडान की आजादी के वक्त भारत और सूडान का गहरा नाता रहा है। यह आश्चर्य की बात हो सकती है कि भारत के पहले चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन के नेतृत्व में ही सूडान के पहले आम चुनाव कराए गए थे। आज जब सूडान को बांटने की तैयारी चल रही है तो भारत भी इस ऐतिहासिक घटना का प्रत्यक्ष साक्षी रहेगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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