लेखक दस वर्षों की तानाशाही के बाद पाकिस्तान में बनी लोकतांत्रिक सरकार का भविष्य खतरे में देख रहे हैं....
पाकिस्तान में दस सालों की तानाशाही के बाद बनी लोकतांत्रिक सरकार को झटके पर झटके लग रहे हैं। पहला बड़ा आघात तब आया जब गठबंधन सरकार में शामिल एक धार्मिक पार्टी जेयूआइ सरकार से अलग हुई। इसके बाद संसद में 25 वोट रखने वाली दूसरी पार्टी एमक्यूएम भी सरकार को छोड़ चली। एक और झटका तब लगा जब सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी मुस्लिम लीग नवाज ने सरकार को 6 दिन का अल्टीमेटम देकर नए चुनाव की चुनौती दी। जिस समय सरकार को यह अल्टीमेटम मिला बिल्कुलउस समय ही सबसे बड़े प्रांत पंजाब के राज्यपाल की हत्या कर दी गई। सरकार के लिए एक चरमपंथी के हाथों गवर्नर की हत्या भी किसी संकट से कम नहीं। जाहिर तौर पर कहा जाता है कि ईश निंदा कानून के खिलाफ बात करने पर सलमान तसीर को मारा गया है। इस समय देश में सियासी हलचल तेज है, दो तीन ऐसे मुद्दे सामने आ गए हैं कि सरकार को उनका हल आसानी से नहीं मिलेगा। पाकिस्तान की राष्ट्रीय असेंबली 342 सांसदों की है, और सरकार बनाने के लिए किसी भी पार्टी को कम से कम 172 सांसदों का वोट चाहिए। 2008 में बनने वाली इस सरकार को जोड़ने के लिए चार पार्टियों ने गठबंधन किया, जबकि देश के प्रधानमंत्री को सरकार के साथ विपक्षी दलों ने भी वोट दिए। प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी को यह गौरव मिला कि वह देश के पहले निर्विरोध प्रधानमंत्री बन गए, लेकिन हालात एक जैसे कभी नहीं रहते। अब हालत यह है कि निर्विरोध प्रधानमंत्री को संसद में 172 सदस्य पूरे करने के लिए विपक्ष पार्टियों के पास घर घर जाना पड़ रहा है। हालत तब्दील इस तरह हुई कि गठबंधन सरकार का हिस्सा बनने वाली धार्मिक पार्टी जेयूआइ ने इस बात पर सरकार को छोड़ने की घोषणा की कि प्रधानमंत्री ने उनकी पार्टी के एक मंत्री को मंत्रिमंडल से निकाल बाहर कर दिया था। इस घोषणा को दो हफ्ते ही हुए थे कि गठबंधन सरकार की दूसरी पार्टी एमक्यूएम ने भी वही काम किया। एमक्यूएम ने अपने दो मंत्रियों को मंत्रिमंडल छोड़ने को कहा और फिर कुछ दिनों के बाद उन्होने भी सरकार से मुंह मोड़ लिया। इस तरह सरकार के पास इन दो पार्टियों के जो 32 वोट थे वे भी नाराज होकर विपक्ष के खाते में चले गए। यह केवल दो पार्टियों का सरकार को छोड़ना नहीं था, लेकिन सरकार के पास खुद को संभालने के लिए बहुमत नहीं रहा। पाकिस्तान के संविधान के अनुसार जब इस तरह की हालत पैदा हो जाए और सरकार के पास बहुमत न रहे तो देश के राष्ट्रपति प्रधानमंत्री को विश्वास प्रस्ताव लेने को कह सकते हैं या विपक्षी पार्टी जिसके पास संसद में कम से कम 64 वोट हों वह अविश्वास प्रस्ताव के लिए प्रस्ताव करेगी। इस समय अगर ऐसा हुआ तो सरकार गिर भी सकती है, क्योंकि पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के पास 172 नहीं, केवल 160 वोट हाथ में हैं। दस सालों के बाद बनने वाली लोकतांत्रिक सरकार को गिराने की कोशिश के पीछे कौन है? सरकार को छोड़ने वाली पार्टियों को किसका आशीर्वाद प्राप्त है? इस तरह कई और सवाल भी हैं। आम तौर पर माना जाता है कि जिस तरह पहले भी लोकतांत्रिक सरकारों को गिराने या असफल करने में खुफिया हाथ का कमाल होता है, अब भी वही स्थिति हो सकती है। यह बात सब के सामने है कि इस सरकार को तीन सालों से कमजोर करने, गिराने, फंसाने और संकट पैदा करने की कोशिश की जाती रही है। तूफान में घिरी सरकार की हालत यह है कि वह खुद के लिए सहारा ढूंढ रही है। दूसरी ओर सबसे बड़ी विपक्ष पार्टी मुस्लिम लीग नवाज ने सरकार के सामने दस मांगें रखकर उसको छह दिनों का अल्टीमेटम दिया है। इनमें पेट्रोलियम के दामों में की गई बढ़ोतरी वापस करने, भ्रष्टाचार को रोकने और कुछ मंत्रियों को हटाने की मांग भी शामिल है। पाकिस्तानी सरकार के लिए आने वाले दिन कठिन हैं। किसी भी समय कुछ भी हो सकता है। अब सरकार को बचाने-गिराने का काम विपक्षी पार्टियों के हाथ में है। इन सब मामलों से हटकर बड़ा नुकसान पंजाब के गवर्नर की हत्या से हुआ है। सलमान तसीर को मारने वाला तो मुमताज कादरी है, लेकिन सच यह है कि वह अकेला नहीं है। इसके पीछे एक विचारधारा है। मुमताज कादरी के करोड़ों साथी हैं। पाकिस्तान में इन चरमपंथी मुल्लाओं को आज़ादी है कि मजहब के नाम पर जो कुछ चाहें वह कर सकते हैं। इसलिए ही आज सलमान तसीर की सोच के लोग कम मिलेंगे। तसीर की हत्या सरकार के लिए एक संदेश भी है कि ईश-निंदा कानून को छेड़ने की कोशिश की तो आप घाटे में रहेंगे। आज सरकार तेल की कीमतें कम करके कुछ दिन और सत्ता में रह सकती है, लेकिन संसद से कोई कानून पारित करना तब तक मुमकिन नहीं जब तक विपक्ष के कुछ दल अपनी पार्टियों को छोड़कर सरकार से न मिल जाएं। (लेखक पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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