लेखक भारत को 1962 के घटनाक्रम से सबक लेकर चीन के प्रति सतर्क रहने की सलाह दे रहे हैं…
चीन अपनी बढ़ती सैनिक शक्ति और राजनीतिक दबदबे की धौंस अपने पड़ोसियों पर दिखाता रहता है, लेकिन उसकी इस धौंस को दूसरे पड़ोसियों की तुलना में भारत ज्यादा महसूस करता है। चीन की शक्ति आजमाने वाली नीति से दोनों देशों के बीच पहले से ही तनाव में चल रहे द्विपक्षीय संबंधों पर और भी बुरा असर पड़ना लाजिमी है। हाल के वर्षो में नई दिल्ली की यात्रा पर आने वाले हर चीनी नेता ने लाभ उठाने का कोई मौका अपने हाथ से जाने नहीं दिया और अपने छिपे उद्देश्यों से साबित किया है कि वह भारत के विरुद्ध हैं। 2006 में राष्ट्रपति हू जिंताओ की यात्रा के मौके पर चीन ने अरुणाचल प्रदेश के मुद्दे को ताइवान की अपेक्षा तीन गुना ज्यादा जोर-शोर से उठाया। एक बार फिर अपनी हाल की यात्रा में चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ ने चीनी फितरत के अनुरूप संवेदनशील कश्मीर का कार्ड भारत के विरुद्ध खेला। अरुणाचल मुद्दे को उठाकर बीजिंग कश्मीर पर भारत पर त्रिस्तरीय रणनीति के तहत दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है। प्रथम रणनीति के तहत चीन जम्मू-कश्मीर पर भारत की प्रभुसत्ता को चुनौती दे रहा है और इस बहाने वह पश्चिमी क्षेत्र में भारत के साथ सीमा विवाद को खारिज करना चाहता है। अपनी इसी रणनीति के तहत चीन जम्मू-कश्मीर के नागरिकों को चीन में प्रवेश के लिए नत्थी वीजा दे रहा है। चीन की दूसरी रणनीति है कि जब भारत और चीन के बीच की लंबी सीमा रेखा सिमटती जाएगी तो बीजिंग को स्विट्जरलैंड के समान अक्साई चिन क्षेत्र और अरुणाचल प्रदेश के मामले में चल रहे दोनों देशों के बीच विवाद को हल करने में सुविधा होगी। चीन जानता है कि अक्साई चिन उसे तभी मिल पाएगा जब भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर मामला सुलटेगा। अपनी इसी नीति के तहत चीन ने 1963 से पाकिस्तान से उत्तर कराकोरम क्षेत्र कब्जा रखा है। तीसरी रणनीति के तहत चीन ने पाक अधिकृत कश्मीर में अपनी सेना की कुछ टुकडि़यां तैनात कर रखी हंै और वह वहां कई रणनीतिक परियोजनाओं पर काम कर रहा है। इस तरह दो तरफ भारत को चीनी टुकडि़यों का सामना करना पड़ रहा है। वेन जियाबाओ ने अपनी भारत यात्रा के दौरान चीन की इसी रणनीति के तहत लाभ उठाने की पूरी कोशिश की। नत्थी वीजा के मामले पर उठे विवाद के मद्देनजर उन्होंने सुझाव के तौर पर यही कहा कि भारत और चीन के अधिकारीगण गहन चर्चा करके कोई समाधान का रास्ता निकालेंगे। उनके इस प्रस्ताव में यही लग रहा है कि चीन नत्थी वीजा के हथकंडे से भारत से लेन-देन आधारित समझौता करना चाहता है। जाहिर है कि समझौता कभी एकतरफा नहीं होता और चीन इस बहाने लेन-देन करना चाह रहा है। वेन जियाबाओ का गहन चर्चा का विशेषणयह संकेत है कि चीन तगड़ा मोल-भाव करने की सोच रहा है। इतना सब होने पर भी नई दिल्ली अभी तक चीन की नई रणनीति को पूरी तरह समझ पाने में असमर्थ दिख रही है। सार्वजनिक तौर पर बयान दिया गया कि नत्थी वीजा के मसले पर गेंद अब चीन के पाले में है और इस बारे में उसे ही निर्णय करना है। इसका मतलब है कि भारत मानकर चल रहा है कि चीन अपने ही द्वारा पैदा की गई इस समस्या को हल करेगा। इस बारे में चीन के विदेश मंत्रालय का बयान आया कि दोनों देशों में सहमति बनी है कि अधिकारी मिलकर इस समस्या का उचित समाधान तलाशेंगे। इससे चीन की मंशा समझी जा सकती है। हालांकि यह एक ताजा उदाहरण है कि किस तरह चीन की कूटनीति भारत को नचाने में समर्थ है। चीन बहुत चालाकी से भारत का ध्यान लंबे अरसे से चले आ रहे दोनों देशों के बीच के महत्वपूर्ण मुद्दों से हटाने अथवा बांटने के लिए नए मुद्दों को पैदा कर रहा है। यह भारतीय कूटनीति का भी एक उदाहरण है कि वह किस तरह से अपनी समस्याओं को हल करता है। पृथक वीजा के मसले पर एक ही सिक्के से चीन तिब्बत क्षेत्र में प्रभुत्व रखने वाले हान विस्थापितों के मामले से जुड़ा खेल भी खेल रहा है। अब भारतीय अधिकारी चीन से यह मांग कर रहे हैं कि वह वीजा नीति को त्याग दे। दरअसल बीजिंग जानता है कि इसी तरीके से भारतीय उनके पास घुटने टेकने को मजबूर हो सकते हैं। इस तरह चीन अपने से सीधे तौर पर न जुड़े मसलों पर भी भारत से कुछ छूट हासिल कर सकता है। पश्चिमी क्षेत्र में सीमारेखा के पार भारतीय क्षेत्र में समय-समय पर चीनी सेना की घुसपैठ की घटनाएं होती रहती हैं। इस बात का प्रमाण है कि चीन किस तरह लेन-देने के लिए कूटनीति की छड़ी घुमा रहा है। वेन जियाबाओ भारत खाली हाथ आए थे, लेकिन जब वह अपने परंपरागत दोस्त देश पाकिस्तान गए तो उनके हाथ में 23 अरब डॉलर का भारत से किया गया आर्थिक सौदा था। भारत और चीन के बीच बढ़ते व्यापार का एक सच यह भी है कि भारत चीन को बड़े पैमाने पर कच्चा माल निर्यात करता है और बदले में चीन से बड़ी तादाद में बने-बनाए चीन निर्मित सामानों का आयात करता है। यह चीन की नव-उपनिवेशिक अर्थव्यस्था का एक प्रमाण है। इस कारण भारत को चीन से व्यापार में घाटा ही अधिक हो रहा है, दूसरे चीनी सामान भारत के बाजारों में पटते जा रहे हैं। इससे स्थिति दिनोंदिन खराब ही हो रही है। चीन अपने यहां निर्मित सामानों को भारतीय बाजारों में भरकर यहां निर्माण करने वाली औद्योगिक इकाइयों को खत्म करने का काम कर रहा है। राजनीतिक विवाद होने के बावजूद चीन केवल अपने आर्थिक हितों तक सीमित है। जहां चीन को अधिक से आधिक व्यापारिक फायदा हासिल करने का मौका दिया जा रहा है वहीं चीन हमारे देश को ज्यादा रणनीतिक घाव देने में जुटा है। वेन जियाबाओ की चालाक कूटनीति को इससे समझा जा सकता है कि उन्होंने सीमा विवाद को हल करने की प्रतिबद्धता जताते हुए कहा कि जल्द ही इसके लिए कोई तिथि तय की जाएगी। इसके कुछ घंटों बाद एक भाषण में वह कहते हैं कि सीमा विवाद को भविष्य की पीढि़यों के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए, क्योंकि इसे हल करने में लंबा समय लगेगा। भारत में आकर इतना स्पष्ट संदेश दिए जाने के बावजूद क्या भारत को संभलना नहीं चाहिए? 1962 में धोखा खाने के बाद अब हमें किसी भी तरह की गलती से बचना चाहिए और निर्भीक नीति बनाना चाहिए ताकि चीन पर दबाव पड़े। चीन के नए दांव को भांपते हुए भारत को उसके किसी भी झांसे में आने से बचना होगा। भारत को भी तिब्बत और ताइवान के मुद्दे पर चीन को घेरने की रणनीति बनानी चाहिए, क्योंकि चीन भय की ही भाषा समझता है। (लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)
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