Friday, January 21, 2011

चीन की दोमुंही नीति

चीनी प्रधानमंत्री जियाबाओ की भारत यात्रा के कई आर्थिक-व्यावसायिक तकाजों के बाद भी पेइचिंग ने नई दिल्ली के साथ कूटनयिक रिश्तों में जिस तरह का स्वांग अपनाया है, वह अचरज में डालता है। एक तरफ वह सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का हिमायती होने की बात करता है, उसी समय उसका यह बयान भी आता है कि वह अरुणाचल प्रदेश को लेकर अपनी सोच में बदलाव नहीं करने जा रहा। पेइचिंग अरुणाचल को अपना हिस्सा बताते हुए उस पर दावा करता है और वहां भारतीय संविधान के अनुसार लोकतांत्रिक आधार पर चुनी सरकार होने के बावजूद उसे विवादास्पद क्षेत्रबताता है जबकि भौगोलिक व पारिस्थितिकीय कारणों से अरुणाचलवासियों के रंग-रूप के अलावा वहां की संस्कृति का कोई अंश चीनी संस्कृति से मेल नहीं खाता। इस मुद्दे के समाधान के लिए दोनों देशों में अब तक चौदह दौर की वार्ता हो चुकी है किंतु नतीजा ढाक के तीन पातही है। चीन अरुणाचलवासियों को अपना नागरिक मानते हुए रटता रहता है कि उन्हें चीन यात्रा के लिए वीजा की जरूरत नहीं है। पर उसने पिछले साल उन दो खिलाड़ियों को नत्थी वीजा जारी किया जो वहां के फुजियान प्रांत में वेटलिफ्टिंग ग्रां प्री में भाग लेने जाना चाहते थे। इस सम्बंध में भारत की आपत्ति को अनसुना किये जाने पर भारतीय आव्रजन अधिकारियों को खिलाड़ियों की यात्रा रोकनी पड़ी। चीन यह स्पष्ट नहीं कर रहा कि वह अरुणाचल के लोगों को लेकर अपनी नीति में कोई बदलाव करेगा या नहीं। मुख्यमंत्री दोरजी खांडू के वर्तमान सलाहकार विशाल नाबाम 2006 में एक महीने की यात्रा पर चीन गये थे तो उन्हें पर्यटक वीजा दिया गया था पर 2007 में अरुणाचल के एक अधिकारी को पेइचिंग जाना था तो उन्हें वीजा नहीं दिया गया। इसके पूर्व पिछले साल जम्मू कश्मीर के लोगों को यात्रा के लिए चीन ने नत्थी वीजा की व्यवस्था की थी। पिछले दिनों खबरें थीं कि अब यह व्यवस्था खत्म कर दी गई है। तथ्य यह है कि तब से भारतीय हिस्से के किसी कश्मीरी ने चीन जाने की कोशिश नहीं की। चीन के रुख में बड़ी अस्पष्टताहै जो दोनों देशों के दीर्घकालिक कूटनयिक तथा व्यावसायिक सम्बंधों के मद्देनजर ठीक नहीं है। भारत-चीन को इस मसले के हल के लिए प्राथमिकता से प्रयास करने होंगे। वैश्विक आर्थिक सम्भावनाएंविषयक रिपोर्ट में विश्व बैंक ने कहा है कि 2011-12 में वैश्विक आर्थिक वृद्धि में करीब आधा योगदान भारत-चीन का होगा। उभय देशों के हित में चीन को इसे समझना चाहिए। उभरती अर्थव्यवस्था होने के नाते अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की भूमिका के महत्व को चीन स्वीकार करता है लेकिन इसे आंतरिक मामलों में उलझाये रखना चाहता है। चाहे अरुणाचल का मसला हो या पश्चिमोत्तर में कश्मीर के हिस्से का। इससे लगता है कि वह भारत को झांसे में रखकर सिर्फ कारोबारी दृष्टि से इसका लाभ उठाना चाहता है। भारतीय राजनय को चीन की इस छलपूर्ण चतुराई को समझना होगा। भारत से अच्छा रिश्ता चीन की मजबूरी है।

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