Sunday, January 23, 2011

रेतीले ट्यूनीशिया में यास्मीनी इंकलाब


नवम्बर 1987 को राष्ट्रपति बोगरुबा को डॉक्टरों द्वारा पागल घोषित करवा प्रधानमंत्री आबेदिन बेन अली खुद राष्ट्रपति बन बैठे। तब से अब तक वह राष्ट्रपति के समस्त अधिकार हथिया कर तानाशाह बने हुए थे। जब उनका कार्यकाल मात्र एक साल रह गया तो उन्होंने अपने दामाद शाबेद अली माटेरी को उत्तराधिकारी नामित कर दिया। तब जनस्वीकार्यता का बांध टूट गया और उन्हें देश छोड़कर भागना पड़ा
मंहंगाई और भ्रष्टाचार के हिसाब से ट्यूनिशिया की दशा भारत से ज्यादा दयनीय नहीं है। फिर भी गत सप्ताह तेईस वर्षों से सत्तासीन रहे वहां के राष्ट्रपति जैनुल आबिदीन बेनअली को सपरिवार देश छोड़ना पड़ा। महंगाई से त्रस्त हजारों बेरोजगार युवा प्रदर्शनकारियों ने राजमहल घेर लिया था। सभी समवेत स्वर में दहाड़ रहे थे कि जैनुल आबिदीन बेनअली को भगाओ। सड़क पर जनाक्रोश स्वत: अभिव्यक्त हो गया। अरब इतिहास में पहली बार जनसत्ता ने किसी तानाशाही सत्ता को पलटा है। वर्ना अमूमन केवल मृत्यु, फौजी साजिश अथवा हत्या से ही ऐसा शासक पदच्युत होता रहा है। कुछ मिलती-जुलती घटना 1974 में अपने देश के पटना में हुई थी जब बिहार के युवाओं ने दिनकर कीहुंकारकी पंक्ति गाते हुए सत्ता को ललकारा किसिंहासन खाली करो, कि जनता आती है।पटना में सत्ता तो नहीं पलटी, मगर ट्यूनिशिया में सत्ताधारी को हेलिकाप्टर से भागना पड़ा और ोादाााति राोांड़कोांर्नाा 1974 रानी, उसे सऊदी अरब में पनाह मिली। दुनिया अचंभित थी कि शान्त दिखने वाले, सैलानियों के चहेते पड़ाव ट्यूनीशिया में इतना कम्पायमान परिवर्तन कैसे गया? आम जन ने इसे यास्मीन इंकलाब का नाम दिया। ट्यूनीशिया का राष्ट्रीय पुष्प चमेली है। उसकी इस सियासी सूनामी का प्रभाव अरब राजधानियों पर भी पड़ा। कहिरा की सड़कों पर प्रदर्शन हुए। यहां होस्नी मुबारक एक बार फिर राष्ट्रपति का चुनाव लड़ रहे हैं। वैसे वे ही एकमात्र प्रत्याशी हुआ करते हैं। सुदूर भूमध्य सागर तटीय इस उत्तर अफ्रीकी गणराज्य का भौगोलिक दूरी के बावजूद अरब सागर तटवर्ती भारतीय गणराज्य से भावनात्मक और वैचारिक सामीप्य है। इसीलिए ट्यूनीशिया में हो रही उथल-पुथल से सीधा सरोकार होना अपरिहार्य है। ट्यूनीशिया के संस्थापक राष्ट्रपति हबीब बोगरुबा महात्मा गांधी के अनुयायी थे। फ्रांसीसी उपनिवेशवादियों ने उन्हें अरसे तक जेल में नजरबन्द रखा। मुक्ति संघर्ष के दौर में वे 1956 में भारत आये थे। निगरुट राष्ट्रों के अगुवा भारत से उन्हें अपार जनसमर्थन मिला था। स्वतंत्र होने के बाद जब ट्यूनीशिया का गणतंत्रीय संविधान रचा जा रहा था तो राष्ट्रपति बोगरुबा को भारतीय ढांचा बड़ा पसन्द आया। शत प्रतिशत अरब मुसलमान होते हुए भी उन्होंने अपने देश को सेक्युलर समाजवादी गणराज्य बनाया। हालांकि अमेरिकी दबाव में आकर निजी क्षेत्र को आर्थिक लक्ष्य बनाया। समाजवाद को छोड़ दिया। पचास के दशक में पाकिस्तानी फौजी तानाशाही के प्रभाव से इस्लामी कट्टरपन उरुज पर था। अफ्रीकी मुसलमानों के समक्ष सऊदी अरब की बहावी अथवा फिर अल्जीरिया की सेक्युलर सोच में से एक को चुनना था। ट्यूनीशिया ने पड़ोसी अल्जीरिया की सेक्युलर व्यवस्था पसन्द की। यूं भी अहमद बेनबेल्ला और युसुफ बेनखेड्डा के सार्वभौम, समतामूलक अल्जीरिया का असर अरबों पर जबरदस्त रहा। हबीब बोगरुबा ने संविधान में फ्रांसीसी नागरिक संहिता अपनाकर निजाम--मुस्तफा को नकार दिया। बहुपत्नी प्रथा को खत्म कर दिया। तलाक को गैरकानूनी बना दिया। बुर्के पर पाबन्दी लगा दी। शादी के लिए वधू की आयु सत्रह वर्ष कर दी। वक्फ की सारी जमीन राज्य की हो गई। मदरसे की जगह आधुनिक शिक्षा व्यवस्था लागू कर दी। संसद में 25 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए और निचले सदन में श्रमिक यूनियनों, दानीरों और विशेषज्ञों हेतु उपयुक्त सीटें रखीं। लेकिन ऐसी प्रगतिशील, समतावादी, सेक्युलर विशिष्टतायें राष्ट्र में फैले व्यापक भ्रष्टाचार के कारण दब गईं। फिर अचानक सात नवम्बर 1987 की शाम को राष्ट्रपति बोगरुबा को डॉक्टरों द्वारा पागल घोषित करवा प्रधानमंत्री जेनुल आबेदिन बेन अली खुद राष्ट्रपति बन बैठे। उन्होंने अपने आका को धोखा दिया। तब से अब (10 जनवरी 2011) तक वह राष्ट्रपति के समस्त अधिकार हथिया कर तानाशाह बने हुए थे। वह सेना और पुलिस के बल पर राजकाज चलाने लगे। दबंगों ने शासन को विकृत कर देश पर तानाशाही थोप दी और उसके तहत 23 साल तक लोग कराहते रहे। आर्थिक इतिहास में उत्तर अफ्रीका का यह कृषिप्रधान देश रोम साम्राज्य को रोटी की आपूर्ति कराने वाला उत्पादन क्षेत्र था। उसी तरह यह हिटलर के सेनाध्यक्ष मार्शल एर्विन रौमल की सेना के लिए भी अनाज और अस्त्र मुहैया करने का प्रमुख क्षेत्र था। इसकी रेतीली सतह के तले प्राकृतिक गैस, तेल और मूल्यवान धातु के भंडार हैं जिस पर अनेक की गिद्धदृष्टि लगी हुई है। यहां अणु ऊर्जा के दो केन्द्र हैं। वि आर्थिक फोरम के आकलन में यह छोटा सा गणराज्य दुनिया के प्रमुख अर्थकेन्द्रों में चालीसवें सोपान पर है। आस-पड़ोस के पिछड़े, विपन्न, निरक्षर अरब राष्ट्रों में ट्यूनीशिया काफी ऊंचा है। प्रगतिशील सामाजिक तथा मजहबी अवस्था के कारण यहां जनहितकारी काम भी होते रहे। लेकिन लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कुंठित कर जैनुल आबेदीन बेनअली ने देश को दिशाभ्रमित कर दिया। पहले आस्त किया था कि आर्थिक तरक्की प्राथमिकता के तौर पर हो जाए तो संसदीय सुधार भी हो जाएंगे। मगर हुआ उल्टा। पूरा राजकाज एक परिवार के दायरे में सिमट गया। राष्ट्रपति मतदान में जालसाजी कर जीतते रहे तथा अपने पद की अवधि बढ़ाते रहे। एक बार तो बेन अली को 88 प्रतिशत वोट मिले तो उन्होंने प्रशासन से नाराजगी जाहिर की। वे 96 प्रतिशत मत चाहते थे। दो अवधि तक की सीमा को संशोधित कर उसे पांच अवधि तक कर दिया और अवकाश प्राप्ति की आयु सीमा को 75 साल तक दी। जब उनका कार्यकाल एक वर्ष मात्र रह गया तो उन्होंने अपने दामाद शाबेद अली माटेरी को उत्तराधिकारी नामित कर दिया। तब जन स्वीकार्यता का बांध टूट गया। जब फ्रांस ने शरण देने से इनकार कर दिया था तो बेन अली समझ गये कि अब खेल खत्म हो गया। फ्रांस में लाखों ट्यूनीशियाई रहते हैं अत: सारकोजी को शंका हुई कि यदि बेन अली को शरण दी गई तो पेरिस में सिविल वार (गृहयुद्ध) की स्थिति पैदा हो जाएगी। जब बेन अली देश छोड़कर भागे तो उनकी दूसरी पत्नी लैला ने बड़ी चतुराई दिखाई। वह ट्यूनिश के बैंक से डेढ़ टन सोना लेकर पति के साथ चम्पत हो गई। दरअसल एक नाई के सैलून में कार्यरत लैला ही बेन अली के भ्रष्टाचार की प्रेरणा स्रेत और सहायिका रही हैं। बेन अली अपने घर-परिवार में ही सिमटे थे अत: देश से कटे रहे। इसीलिए आज उन्हें ऐसे परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।



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