Sunday, January 23, 2011

नेपाल में भारत-चीन परीक्षण


पाकिस्तान को अपने पाले में कर लेने के बाद अब चीन हिमालयी रियासत के साथ पूरी गंभीरता से पींगें बढ़ा रहा है। उच्च स्तरीय यात्राओं और कानकुन जलवायु शिखर सम्मेलन के हल्ले-गुल्ले के बीच नेपाल के प्रति चीन की नीति में स्पष्ट बदलाव की ओर किसी का ध्यान ही नहीं गया है। फिलहाल, हम इसे नेपाल के अंदरूनी मामलों में दखल तो नहीं कह सकते, लेकिन हिमालय क्षेत्र में प्रभुत्व की दिशा में चीन की पहल तो समझ ही सकते हैं। चीन ने पंचशील सिद्धांतों पर आधारित नेपाल नीति की घोषणा की है। इसके अनुसार चीन नेपाल के अंदरूनी मामलों में दखल नहीं देगा और नेपाल तिब्बत और ताइवान के बारे में चीन की प्रभुसत्ता और प्रादेशिक अखंडता का सम्मान करेगा। चीन को तिब्बती प्रदर्शनकारियों का डर भी सता रहा है, खासकर बीजिंग ओलंपिक से तुरंत पहले चीन में भड़के तिब्बतियों के प्रदर्शन के बाद। नेपाल से तिब्बत में आसानी से प्रवेश किया जा सकता है। भारत के बाद सबसे अधिक तिब्बती शरणार्थी नेपाल में ही हैं। इसलिए चीन नेपाल में बसे करीब बीस हजार तिब्बतियों की भूमिगत गतिविधियों को रोकना चाहता है। चीन का आरोप है कि अंतरराष्ट्रीय ताकतें नेपाल में मौजूद तिब्बतियों के जरिए चीन के खिलाफ अभियान चला रही हैं। इसी सिलसिले में जब फरवरी, 2009 में छह नेपाली सांसदों ने दलाई लामा से धर्मशाला में मुलाकात की थी तो चीन ने कड़ी आपत्ति जताई थी। इसके बाद ही चीन ने नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ अच्छे संबंध बनाने शुरू कर दिए थे। माओवादी नेता खुद को भारत-विरोधी दिखा रहे हैं, फिर भी उनमें से अधिकतर जानते हैं कि दोनों देशों के भौगोलिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक-आर्थिक संबंधों को देखते हुए उन्हें आखिरकार भारत की ओर ही देखना पड़ेगा। नेपाल की अंदरूनी स्थिति की बात करें तो माओवादियों ने मदद के लिए चीन से गुहार लगाई है। लेकिन चीन ने स्पष्ट कर दिया है कि वह तभी मदद करेगा, जब वे सत्ता में होंगे। किंतु माओवादियों ने चीन से कहा कि जब तक नेपाल में भारतीय दखलंदाजी जारी रहेगी, वे सत्ता में नहीं आ सकते। इसी से चीन के नए आक्रामक रवैये का कारण समझ में आता है। दिलचस्प बात यह है कि भारत और चीन दोनों ही नेपाल-चीन सीमा पर प्रभाव के लिए होड़ कर रहे हैं। दूरदराज के मुस्तांग पर्वतीय क्षेत्र के लिए भारत द्वारा 10 करोड़ डॉलर की सहायता दिए जाने के फौरन बाद चीन ने भारत के प्रभाव को कम करने के लिए उसी इलाके में छोसर गांव में स्कूल निर्माण के लिए एक करोड़ रुपए की सहायता की घोषणा की। उधर, चीन अपनी रेललाइन को तिब्बत से नेपाल सीमा तक ला रहा है, तो इधर भारत भी नेपाल तक अपनी रेललाइन ले जा रहा है। भारत ने भारत-नेपाल सीमा पर पांच स्थानों पर रेल सेवाओं के विस्तार के लिए 10 अरब 88 करोड़ रुपये की सहायता की घोषणा की है, जिसका पहला चरण तातोपानी के दक्षिण में 350 किलोमीटर ब्रिनजंग से शुरू होगा। यह वही जगह है जिसे चीन भी रेल मार्ग से जोड़ने वाला है। कैसा संयोग है! क्या नेपाल में शक्ति परीक्षण की शुरुआत नहीं हो रही है? अगर चीन भड़काऊ भूमिका अदा करना चाहता है तो भारत की सुरक्षा के लिए निश्चित ही इसके गंभीर मायने होंगे। वैसे भी चीन भारत के तमाम पड़ोसी देशों में अपना असर बढ़ाकर नई दिल्ली को घेरने की नीति पर चल रहा है। अगर भारत नेपाल में चीन के बढ़ते प्रभाव की काट नहीं करता, तो वह अपना पड़ोसी चीन के हवाले कर देगा और उसकी सामरिक पैठ खत्म हो जाएगी। भारत-चीन के लिए आदर्श स्थिति यह होगी कि वे अपने बीच के बफर-देश का सम्मान करें। इससे नेपाल में राजनीतिक स्थिरता पैदा होगी, और दोनों देशों के हित भी सुरक्षित रहेंगे। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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