Saturday, January 15, 2011

विफल अफगान नीति

अफगानिस्तान में भारतीय हितों पर लेखक के विचार…..
जबसे अमेरिकी प्रशासन ने अफगानिस्तान से अपने सैनिकों को वापस बुलाने का ऐलान किया है, तभी से अफगानिस्तान में नई शतरंजी चालें शुरू हो गई हैं। अमेरिकी फौज की वापसी के परिणाम जो भी हों फिलहाल पाकिस्तान की चालें बहुत हद तक सफल होती दिख रही हैं। नाटो फौज की विदाई का असर भारत पर भी पड़ सकता है। सवाल यह है कि क्या विदाई के बाद भारत के अफगानिस्तान में हित उतने ही सुरक्षित रहेंगे, जितनी उम्मीद जताई जा रही है। पिछले दिनों अफगानिस्तान की यात्रा पर गए भारत के विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने पाकिस्तान को संदेश देते हुए कहा कि कि वह उसके मंसूबे पूरे नहीं होने देंगे, लेकिन किस तरह से? इस प्रश्न का उत्तर कृष्णा ने नहीं दिया। अफगानिस्तान में शांति स्थापित करने के लिए चल रही वार्ता में मध्यस्थता के लिए भी पाकिस्तान दबाव बना रहा है। उसके सैन्य प्रमुख अशफाक परवेज कियानी कई बार अमेरिकी नेताओं के समक्ष यह प्रस्ताव रख चुके हैं, लेकिन उनका प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया गया। अफगानिस्तान में भारत की उपस्थिति तबसे है जब तालिबान की कमर टूटी थी। भारत ने अफगानिस्तान को 1.3 अरब डॉलर की मानवीय सहायता देने के साथ-साथ अधिसंरचनात्मक विकास में भी सहयोग दिया। भारत अफगानिस्तान की नई संसद का निर्माण भी करा रहा है। अफगानिस्तान में भारतीयों की सुरक्षा नाटो गठबंधन द्वारा उपलब्ध कराई जा रही सुरक्षा पर निर्भर रही है। अमेरिका के विदा होते ही राजनीतिक-सैन्य स्थितियां बदलेंगी। इस स्थिति का अंदाजा अमेरिका, पाकिस्तान और अफगानिस्तान को भी है। हामिद करजई इस हकीकत से कुछ ज्यादा ही वाकिफ होंगे, क्योंकि असली चुनौती तो उन्हीं के समक्ष पेश होने वाली है। शायद उन्हें कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा है, क्योंकि एक तरफ उन्हें संरक्षण देने वाली अमेरिकी सेनाओं की वापसी की उलटी गिनती शुरू हो गई है और दूसरी तरफ पाकिस्तान करजई विरोधियों में शक्ति संचार करने का हरसंभव प्रयास कर रहा है। इस स्थिति में उनके लिए यह विवशता होगी कि वह पाकिस्तान द्वारा तैयार किए गए पिट्ठुओं के आगे झुक जाएं। पिछले कुछ समय में भारतीय राजनय की सक्रियता देखें तो ऐसा नहीं लगता कि अफगानिस्तान में बन रही स्थितियों के प्रति भारत में कोई चिंता है। अफगानिस्तान की भू-सामरिक स्थिति देखें तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि वह भारतीय राजनय के लिए कितना महत्वपूर्ण है। कमजोर पाकिस्तान भारत के हितों के अधिक अनुकूल होगा और अफगानिस्तान का रणनीतिक प्रयोग करके पाकिस्तान को कमजोर करने में कामयाब हुआ जा सकता है। चूंकि इस दिशा में भारतीय राजनय की गतिविधियां काफी शिथिल हैं इसलिए असहाय महससू कर रहे करजई पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआइ के समर्थन वाले जिहादी समूहों के साथ बातचीत करने और पाकिस्तान के साथ नजदीकी रिश्ता कायम करने के लिए विवश हैं। भारतीय विदेश नीति का यह उपेक्षा भाव भारत के हित में नहीं है। ऐसी सूचनाएं मिलीं हैं कि अफगानिस्तान के लोग भारत द्वारा दी जाने वाली मानवीय एवं आर्थिक सहायता के प्रसंशक हैं। पर उनकी यह प्रशंसा हमारी विदेश नीति का विकल्प नहीं बन सकी। इन परिस्थितियों में भारत के लिए जरूरी है कि वह अफगानिस्तान में केवल सहायता ही न दे, बल्कि अपने रणनीतिक उद्देश्यों को भी पूरा करे। सभी अफगानी चाहे वे पख्तून हों, ताजिक हों, उजबेक हों या फिर हाजरा भारत का आदर करते हैं। इसके बावजूद यदि भारत इसका फायदा नहीं उठा पा रहा है तो यह भारतीय विदेश नीति की असफलता ही कही जाएगी। क्या भारत इन बदल रही स्थितियों में अफगानिस्तान में अपने हितों को सुरक्षित रख पाएगा, फिलहाल तो उम्मीद कम ही है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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