Wednesday, January 19, 2011

ईरान-मिस्र में भी ट्यूनीसिया जैसे बदलाव की आस

ट्यूनीसिया में 23 वर्ष तक राज करने वाले राष्ट्रपति जिने अल आबेदिन बेन अली का शासन खत्म होने से कई पश्चिम एशियाई देशों के लोगों को उम्मीद की किरण नजर आने लगी है। पश्चिम एशिया की लगभग सभी वेबसाइटों पर ट्यूनीसिया में सत्ता परिवर्तन से संबंधित संदेशों की भरमार है। इनमें से अधिकतर में पूछा गया, क्या ऐसा ईरान, मिस्त्र या पश्चिम एशिया के अन्य किसी देश में हो पाएगा? छोटे से अफ्रीकी देश ट्यूनीसिया में जनविद्रोह से तानाशाही के अंत ने मिस्र सहित उन सभी देशों के लोगों को प्रेरित किया है-जहां पर लंबे समय से एक ही पार्टी का शासन चल रहा है। रविवार को यमन की राजधानी सना में यूनिवर्सिटी परिसर से सैकड़ों छात्रों ने ट्यूनीसिया के दूतावास तक मार्च निकाला और अरब देशों के छात्रों से अपने-अपने देशों की सरकारों के खिलाफ बगावत की अपील भी की। रविवार को मिस्र की राजधानी काहिरा में प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक का मजाक बनाया। व्यापार संघ के कार्यकर्ताओं ने जॉर्डन में नारे लगाए, ट्यूनीसिया एक सीख दे रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक फिलहाल वैसे राजनैतिक बदलाव की संभावनाएं बहुत कम दिख रही हैं-जैसी शीतयुद्ध के बाद पूर्वी यूरोप में हुई थी, लेकिन ट्यूनीसिया के घटनाक्रम ने प्रभाव तो छोड़ा है। दूसरा कारण यह भी है कि राजनीतिक दरारों के बावजूद मिस्त्र और ईरान यथास्थिति बनाए रखने के लिए सुरक्षाबलों पर बहुत ज्यादा खर्च कर रहे हैं। उनकी ओर से प्रदर्शनकारियों के साथ मिलने के कोई संकेत नहीं है। यह बात सही है कि अच्छे और मजबूत विपक्ष वाले कुवैत व बहरीन जैसे छोटे देश अपने नागरिकों को तमाम सामाजिक सुविधाएं देते हैं। सामरिक अध्ययन के कुवैत केंद्र में निदेशक सामी अलफराज कहते हैं, ऐसे सभी लोग जो सोचते हैं कि सड़कों पर उतरकर बदलाव लाया जा सकता है उन्हें ईरान चुनौती दे रहा है। उन्होंने यह बात ईरान में जून वर्ष 2009 में हुए राष्ट्रपति चुनावों में राष्ट्रपति मोहम्मद अहमदीनेजाद के दोबारा चुने जाने पर हुए भारी विद्रोह के कुचले जाने का हवाला देते हुए कही। हालांकि ईरान में जो हुआ उसके उलट ट्यूनीसिया की घटना बताती है कि जनशक्ति को कमतर आंकना भारी भूल है। उन्होंने कहा, दिमाग में तय हो रहा है कि ऐसा हो सकता है। लोगों को लगता है कि ऐसा उनके देशों में भी हो सकता है। शुक्रवार को ट्यूनीसिया के राष्ट्रपति बेन अली जब छोड़कर भागे तो विशाल प्रदर्शन किया गया। ऐसा ट्यूनिसिया की कई पीढि़यों में नहीं हुआ था। कई सप्ताह से देश में अशांति थी। युवा वर्ग को देश के आर्थिक विकास से कोई लाभ नहीं हो रहा था। इन मुद्दों ने क्षेत्र में बहुत बड़ा रूप ले लिया, क्योंकि कई अन्य शासन भी ऐसी परेशानियों से जूझ रहे हैं। जॉर्डन में शुक्रवार को करीब 5,000 लोगों ने महंगाई के खिलाफ रैली में भाग लेते हुए प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग की। हालांकि शाह अब्दुल्लाह ने पिछले सप्ताह कुछ भोजन सामग्री और ईधन से कर कम करने और उनके दाम घटाने के आदेश दिए थे, लेकिन वे इससे संतुष्ट नहीं।

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