ढाका से मिलने वाले संकेत भारत-बांग्लादेश के मजबूत आपसी संबंधों के पक्ष में लगते हैं, लेकिन आईएसआई और उसका इस्लामवाद बाधा बन रहा है। संकेत हैं कि बांग्लादेश की शेख हसीना सरकार भारत के साथ अपने संबंधो को लेकर गंभीर है, जिसने उन्हें पश्चिम पाकिस्तान की तानाशाही से मुुुक्त होने में मदद की थी। यह कट्टरपंथी जमीयत के समर्थन वाली बेगम खालिदा जिया के पहले के बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) शासन काल की स्थिति से एकदम विपरीत है। उनके जमाने में भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के विद्रोहियों से आतंकवादी बने संगठनों को उनके देश में सुरक्षित पनाह दी गई थी और पाकिस्तान की बदनाम आईएसआई को बांग्लादेश की जमीन पर अपनी स्थिति मजबूत करने का मौका दिया था, जैसा कि पहले कभी नहीं हुआ था। बांग्लादेश की विदेश मंत्री दीपू मोनी 11 नवंबर को दक्षिण त्रिपुरा के चोट्टाखोला में बांग्लादेश युद्ध स्मारक की आधारशिला रखने आई हुई थीं। यहीं से मुक्ति वाहिनी के लड़ाके तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में प्रवेश किया करते थे। पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि चटगांव बंदरगाह के साथ-साथ बंगाल की खाड़ी में सोनादिया द्वीप की बंदरगाह के विकास के लिए भारत बांग्लादेश में निवेश कर सकता है। इन दो परियोजनाओं को हथियाने के लिए चीन अपनी स्टि्रंग ऑफ पर्ल्स रणनीति के तहत जबरदस्त कोशिश कर रहा है। मोनी ने कहा, चीन ही क्यों? हम चाहते हैं कि हमारे सभी पड़ोसी चटगांव बंदरगाह और सोनादिया द्वीप में शामिल हों। भारत इससे अलग नहीं है। चीन की खासतौर से हांगकांग से लेकर अफ्रीका में सूडान तक कारगर समुद्री संचार माध्यमों को विकसित करके भारत को घेरने की स्टि्रंग ऑफ पर्ल्स रणनीति के बाद से बांग्लादेश में खास दिलचस्पी पैदा हो गई है। इस साल मार्च में बीजिंग की अपनी यात्रा के दौरान बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने चीन से अपने देश में निवेश करने की अपील की थी, जिसके बाद चीन ने चटगांव और सोनादिया द्वीप में बंदरगाहों को विकसित करने के साथ ही म्यांमार के रास्ते कुनमिंग से चटगांव तक का तीन देशों का एक हाइवे बनाने की अपनी पुरानी योजना पर फिर से काम शुरू किया। चटगांव बंदरगाह का महत्व इसलिए बढ़ जाता है कि यह बांग्लादेश समुद्रतट पर स्थित है और यहां से भारत तथा म्यांमार नजदीक हैं और सोनादिया द्वीप, कॉक्स बाजार से करीब सात किलोमीटर दूर है। बांग्लादेश निवेश बोर्ड में 2010 के पूर्वार्द्ध तक चीन के 32 करोड़ डॉलर के निवेश के करीब 186 प्रस्ताव पंजीकृत हो चुके थे। इसे देखते हुए ढाका के साथ अपने व्यवहार में नई दिल्ली को यथार्थपरक और सक्रिय होना होगा और चीन को बांग्लादेश विकास परियोजनाओं को हथियाने से रोकना होगा। भारत अपने पड़ोसी बांग्लादेश के विकास मार्ग पर जबरदस्ती प्रवेश नहीं कर रहा है, बल्कि बांग्लादेश, उसे अपने विकास में सहभागी बनने का न्यौता दे रहा है। क्षेत्र की जरूरतों से परिचित विवेकशील नई दिल्ली को इस अवसर को हाथ से नहीं जाने देना होगा। बांग्लादेश की विदेश मंत्री मोनी ने कहा कि भारत और उनका देश जल्दी ही आतंकियों और दूसरे अपराधियों के आसानी से एक-दूसरे को सौंपने के बारे में एक प्रत्यर्पण संधि कर सकते हैं। नए संबंधों को मजबूत करने के भारत और बांग्लादेश के संकल्प को व्यक्त करते हुए वह कहती हैं, प्रधानमंत्री शेख हसीना ने स्पष्ट कहा है कि हम अपनी जमीन का इस्तेमाल किसी भी भारत-विरोधी गतिविधि के लिए नहीं होने देंगे। अगर जरूरत पड़ी तो दोनों देश अपराधियों और आतंकियों के आदान-प्रदान में तेजी लाने के लिए प्रत्यर्पण संधि कर सकते हैं। और यह काम किसी भी क्षण हो सकता है। नई दिल्ली और ढाका दोनों को ही प्रत्यर्पण संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए तैयारी कर लेनी चाहिए, क्योंकि यह दोनों के हित में होगा और इससे स्पष्ट संदेश जाएगा कि दोनों देशों के संबंध विश्वास और परस्पर सहयोग के संबंधों में बदल गए हैं और अब उन्होंने पूरे भारत-बांग्लादेश क्षेत्र को आतंकियों से मुक्त कराने का प्रण कर लिया है। 2001 में जिया के सत्ता में आने के बाद से कट्टरपंथी लीडरों ने दोनों देशों के संबंधों को बंधक बना रखा था और खुद बीएनपी प्रमुख ने राजनीतिक फायदे के लिए भारत-विरोधी रुख अपनाया हुआ था, लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत और बांग्लादेश द्वारा प्रत्यर्पण संधि किए जाने पर देशभर में भारी सख्या में मौजूद इस्लामी कट्टरपंथियों के सहयोग से गहराई से जड़े जमाए आईएसआई की बांग्लादेश इकाई चुप रहेगी और क्या शेख हसीना सरकार अपने देश में मौजूद ताकतवर कट्टरपंथी गुटों को नाराज करने का साहस कर सकेगी।
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