Thursday, January 13, 2011

पड़ोसी का प्रचंड प्रपंच

अपने हालिया भारत दौरे के वक्त नेपाली माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी सीपीएन (एम) के नेता बाबूराम भट्टराई ने मीडिया को आश्वस्त करने की भरपूर कोशिश की। बाबूराम भट्टराई चूंकि अपनी पार्टी के दूसरे नंबर के महत्वपूर्ण नेता हैं, नेपाल में क्रांति लाने में उनकी भूमिका अहम रही है, लिहाजा उनकी बातों को अहमियत नहीं देने की वजह नजर नहीं आती। लेकिन नेपाल से जिस तरह से खबरें आ रही हैं, उससे साफ है कि भट्टराई औपचारिकतावश ऐसी बातें कह रहे थे। जबकि हकीकत तो यही है कि नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी में विचारधारा ही नहीं, भारत को लेकर संघर्ष बढ़ता जा रहा है। नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव और पूर्व प्रधानमंत्री पुष्पकमल दहल उर्फ प्रचंड की की कोशिशें भारत विरोध पर टिकी हुई हैं। उन्हें भारत की तुलना में चीन ज्यादा नजदीकी रहनुमा और दोस्त नजर आता है। अगर ऐसा नहीं होता तो पार्टी के राजनीतिक प्रस्ताव में उन्हें भारत सबसे बड़े खतरे के तौर पर नजर नहीं आता। उन्हें भारत विस्तारवादी लगता है। भारत की तुलना में उन्हें चीन ज्यादा अपना नजर आता है। ये उस प्रचंड के विचार हैं, जिन्होंने माओवादी लड़ाके के तौर पर भारत में बरसों तक फरारी में जिंदगी गुजारे हैं। माओवादी वैचारिक दर्शन के सहारे नेपाल की पहाडि़यों और गांव-देहातों में क्रांति और बदलाव की चाहत का जो जज्बा प्रचंड के कायम किया, उसका लोहा पूरी दुनिया मानती है। लेकिन शायद दुनिया के बड़े हिस्से को इस बात की जानकारी नहीं है कि उनके इस जज्बे को पालने-पोसने में भारतीय धरती का भी बड़ा योगदान रहा है। यह भी बिडंबना ही है कि भारत के ज्यादातर लोगों को नेपाल में वीरेंद्र वीर विक्रम शाह शासन की उपस्थिति राहत की प्रतीक थी, उसी भारतीय धरती पर प्रचंड ने शाही सल्तनत को उखाड़कर नेपाल को लोकतांत्रिक देश बनाने का सपना देखा था। दिल्ली के दिल मंडी हाउस का चौराहा, पुश्किन की मूर्ति के नीचे का फव्वारा और फिरोजशाह रोड की चाय की दुकान पर सैकड़ों शामें उन्होंने अपने भारतीय मित्रों के साथ नेपाल में क्रांति लाने का सपना देखते हुए गुजारी हैं। साहित्य अकादमी के लॉन के पत्थरों पर बैठने वाले प्रचंड नेपाल के प्रधानमंत्री तो बन गए, लेकिन सामने चाय की दुकान ज्यों की त्यों है और चाय वाला भी। उसे भी इस बात का रंज है कि जिसे उसने अपने हाथों चाय पिलाई है, उसी शख्स की नजर में भारत दुश्मन नंबर एक है। जाहिर है कि प्रचंड की भारत विरोध की यह लाइन आम भारतीयों को पसंद नहीं आई है। प्रचंड की राजनीतिक सोच में आए इस बदलाव को समझने के लिए नेपाल की राजनीति के लिए महत्वपूर्ण दो तारीखों पर गौर किया जाना जरूरी है। 2006 में नेपाली माओवादियों के साथ हुए 12 सूत्रीय समझौते के मुताबिक इस साल 15 जनवरी तक माओवादी विद्रोहियों को सेना में शामिल किया जाना था। इसी तरह आने वाली 28 मई की तारीख भी नेपाल के लिए खासा मायने रखती है। 12 सूत्रीय समझौते के मुताबिक नेपाल में इस दिन तक नया संविधान बन जाना चाहिए, लेकिन तय तारीख तक सेना में माओवादी लड़ाकों को भर्ती किए जाने की कोई सूरत नजर नहीं आ रही। राष्ट्रीय संविधान सभा में जिस तरह का वैचारिक और राजनीतिक अवरोध बना हुआ है, उसमें नया संविधान बनने की दूर-दूर तक गुंजाइश नजर नहीं आ रही। नेपाली संविधान सभा में माओवादी सबसे बड़ा दल है, इस नाते प्रचंड प्रधानमंत्री भी रह चुके हैं, लेकिन नए संविधान को लेकर जारी गतिरोध को वे तोड़ नहीं पाए। इसके लिए वे राजनीतिक दलों को दोषी मानते हैं। चूंकि नेपाली कांग्रेस पार्टी का भारत सरकार से गहरा रिश्ता रहा है, लिहाजा प्रचंड को लगता है कि भारत सरकार ही माओवादियों की राह की बड़ा कांटा है। यह सच है कि नेपाल को लेकर भारत की चिंताएं सबसे ज्यादा हैं। सदियों से भारत और नेपाल के बीच रोटी और बेटी का रिश्ता रहा है। जाहिर है ऐसे में भारत की चिंताएं बढ़ जाती हैं, लेकिन यह भी सच है कि तमाम सद्इच्छाओं के बावजूद भारत सरकार ने माओवादियों की राह में खुले तौर पर कभी रुकावट बनने की कोशिश नहीं की। जब प्रचंड प्रधानमंत्री पद की दौड़ में सबसे आगे थे, तब भी भारत ने इसे नेपाल का अंदरूनी मामला बताकर किनारा कर लिया था। हालांकि हाल के दिनों में भारत सरकार के विशेष दूत के तौर पर श्याम सरन ने नेपाल का दौरा किया तो प्रचंड और उनके लड़ाकों ने इसे संविधान बनाने में अपनी तरह से भारत के हस्तक्षेप के तौर पर देखा। इसके बाद से उनका रवैया खुलकर भारत विरोधी हो गया है। 2005 में सत्ता संभालने के बाद उन्होंने खुलकर कहा था कि भारत को संतुलित करने के लिए नेपाल को चीन का साथ जरूरी है। प्रचंड और नेपाली माओवादी पहले से ही भारत विरोधी रुख अख्तियार करते रहे हैं। उन्हें भारत की योजनाएं विस्तारवादी ही लगती हैं। हालांकि भारतीय समाजवादियों ने नेपाल में लोकतंत्र लाए जाने की हमेशा वकालत की है। 1990 में तो जनता दल के महत्वपूर्ण नेता चंद्रशेखर लोकतंत्र बहाली के लिए नेपाली कांग्रेस पार्टी के मंच पर जा बैठे थे। तब वीरेंद्र की शाही सरकार को काफी असुविधाएं भी हुई थीं। चूंकि नेपाली कांग्रेस पार्टी जनतांत्रिक पार्टी रही है, लिहाजा उससे भारतीय राजनीतिक दलों का रिश्ता रहा है। नेपाली कांग्रेस के नेता कृष्ण प्रसाद भट्टराई, गिरिजा प्रसाद कोइराला और नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के नेता मनमोहन अधिकारी जैसे नेताओं की पढ़ाई-लिखाई बनारस के काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हुई है। लिहाजा, उनका भारतीय नेताओं से मेलजोल रहा है। नेपाली कांग्रेस पार्टी के महासचिव प्रदीप गिरि तो जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में पढ़े हैं। लिहाजा, उनके रिश्ते डीपी त्रिपाठी से लेकर मोहन प्रकाश और नीतीश कुमार से हैं। हिंदी के मशहूर कथाकार फणीश्र्वर नाथ रेणु तक ने नेपाल में लोकतंत्र के आंदोलन में हिस्सा लिया था। 1950 के बाद से नेपाल में होने वाले तमाम बड़े परिवर्तनों में भारत की भूमिका रही है। 2005 के नई दिल्ली घोषणापत्र के जरिए ही माओवादियों और राजनैतिक दलों में राजशाही को खत्म करने के लिए समझौता हुआ। यही वजह है कि कभी प्रचंड को भी भारतीय धरती ही सबसे ज्यादा मुफीद नजर आती रही। चूंकि भारतीय नेताओं का भरोसा खून-खराबे की बजाय लोकतांत्रिक आंदोलनों में ज्यादा रहा है, लिहाजा प्रचंड और उनके लड़ाकों से वैसी आत्मीयता नहीं बन पाई, जैसी नेपाली कांग्रेस या नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी एमाले के साथ रही है, लेकिन इससे यह भी साबित नहीं होता कि नेपाल में माओवादी क्रांति से भारत अछूता रहा। प्रचंड को जहां चीन और उसकी दिलचस्पी अपने राजनीतिक लक्ष्यों के ज्यादा करीब लग रही है तो इसकी बड़ी वजह सिर्फ यह नहीं है कि नेपाली माओवाद को वैचारिक खाद चीन के माओवाद से ही मिलती रही है, बल्कि चीन नेपाल के जरिए भारत को सामरिक नजरिए से घेरने की फिराक में है। चूंकि उसकी इस महत्वाकांक्षा में सिर्फ प्रचंड ही साथ दे सकते हैं। प्रचंड को लगता रहा है कि उनकी सरकार को भारत की ही शह पर अस्थिर किया गया तो उन्हें चीन का साथ ज्यादा अहम नजर आता है, लेकिन बाबूराम भट्टराई और उनके समर्थकों को लगता है कि चीन की बजाय भारतीय पक्ष ही उनके लिए ज्यादा मुफीद हो सकता है। लिहाजा, उन्हें भारत की विस्तारवादी नीतियों पर एतराज नहीं हैं। उनके इस वैचारिक बदलाव की वजह को भारत सरकार के नजरिए में आए बदलाव के तौर पर भी देखा जा सकता है। जब पिछले दिनों बाबूराम भट्टराई भारत आए तो प्रणब मुखर्जी और चिदंबरम समेत कई महत्वपूर्ण भारतीय नेताओं को उनसे मिलने से कोई परहेज नहीं रहा। ऐसे में भट्टराई के समक्ष भी सवाल उठ खड़ा हुआ है। अगर तय वक्त तक शांति प्रक्रिया पूरी नहीं हुई तो उन्हें अपने लड़ाकों को जवाब देना होगा। जाहिर है, कोई संतोषजनक जवाब देने की कोई सूरत फिलहाल नजर नहीं आ रही। ऐसे में वे एक बार फिर क्रांति के पुराने औजार यानी बीहड़ों में कूदने की बात कर रहे हैं। जबकि भट्टराई को लगता है कि पहाड़ी और आर्थिक तौर पर पिछड़ा इलाका होने के चलते उनका पारंपरिक आंदोलन लंबे समय तक चल नहीं सकता। उन्हें मौजूदा शांति प्रक्रिया में ही भूमिका तलाशनी होगी। बहरहाल, यह तय है कि नेपाल में नई राह नहीं निकली तो एक बार फिर भारत विरोधी हवाएं बहने लगेंगी। जिसका सीधा असर नेपाल में बसे भारतीय कारोबारियों के कामकाज पर पड़ेगा। इसकी शुरुआत माओवादियों ने भारत विरोधी भावनाएं भड़काकर कर दी हैं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)


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