Wednesday, January 19, 2011

‘स्वदेशी’ नीति से अमेरिका सहमा

भारत की पहली रक्षा उत्पादन नीति में स्वदेशीपर जोर से अमेरिकी खेमे में खलबली है। पिछले कुछ सालों में अमेरिकी हथियारों के खरीददार देशों की सूची में दूसरे नंबर पर रहे भारत के स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा देने को वाशिंगटन अपने व्यापारिक हितों पर चोट के तौर पर देख रहा है।
सूत्रों के अनुसार, रक्षा उत्पादन नीति पर भारत में अमेरिकी राजदूत टिमोथी रोमर समेत ओबामा प्रशासन के आला रणनीतिकारों ने अमेरिकी दूतावास में लंबी चर्चा की और जल्द से जल्द 50 फीसदी से भी ज्यादा हथियारों की जरूरत की स्वदेशी उत्पादन के जरिए ही पूरा करने के भारतीय रक्षा मंत्री एके एंटनी के दावे का आकलन किया।
वाशिंगटन की इस बदहवासी को भांपकर विदेश मंत्रालय ने भी स्वदेशी कार्ड का इस्तेमाल अमेरिका पर दबाव बनाने के लिए शुरू कर दिया है ताकि वह संरक्षणवाद की कड़ी नीति, आउटसोर्सिंग पर पाबंदी और वीजा शुल्क में वृद्धि में बदलाव लाने जैसे राष्ट्रपति बराक ओबामा के आश्वासनों को जल्द पूरा करे। डीआरडीओ और इसरो को प्रतिबंधित संस्थानों की सूची से हटाने को लेकर अमेरिका में शुक्रवार को हुई ठोस पहल को विदेश मंत्रालय स्वदेशी कार्डके नतीजे के तौर पर भी देख रहा है। ओबामा दोनों ही संस्थाओं पर से पाबंदी हटाने का आश्वासन देकर गए थे।
अमेरिका हालांकि भारत की स्वदेशी नीति में बदलाव तो नहीं करा सकता है, लेकिन नई नीति के अमल में आने से पहले हथियारों के सौदों में वह खुद को भारत की सूची में सबसे ऊपर रखना चाहता है। सूत्रों के अनुसार अमेरिकी प्रशासन में यह सोच बन रही है कि भारत में स्वदेशी रक्षा उत्पादन में अमल में समय लगेगा लेकिन सैन्य जरूरतों को तात्कालिक तौर पर पूरा करने के लिए वह रूस, इजरायल जैसे दूसरे देशों को प्राथमिकता दे सकता है क्योंकि अब दूरगामी सैन्य आपूर्ति के लिए अमेरिका को खुश रखने की जरूरत उसे महसूस नहीं होगी। अमेरिका इस स्थिति को अपने हथियार उद्योग पर आघात के रूप में देख रहा है।


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