Friday, January 21, 2011

ट्यूनीसिया में जनविद्रोह के मायने


अफ्रीका के उत्तरी छोर पर बसे लगभग एक करोड़ से अधिक की आबादी वाले ट्यूनीसिया में हुए जनविद्रोह के कारण 23 साल से सत्ता पर काबिज तानाशाह बेन अली को भागने के लिए मजबूर होना पड़ा है। वहां अब एक राष्ट्रीय सरकार बनाने की कवायद चल रही है, जिसमें विपक्षी दलों के अलावा पेशेवर अर्थशास्ति्रयों और ट्रेड यूनियन के कार्यकर्ताओं को शामिल करने की बात की जा रही है। अभी फिलहाल संसद के स्पीकर फोआद मेबाजा को अंतरिम तौर पर सत्ता संभालने को कहा गया है।। मुस्लिम बहुल इस अरब देश में जो कुछ हुआ वह वाकई अरब जगत के इतिहास में अभूतपूर्व है।। यह अकारण नहीं कि 23 साल से सत्ता में जमे तानाशाह बेन अली की जनविद्रोह द्वारा बेदखली को मीडिया ने जस्मीन इंकलाब के तौर पर संबोधित किया है। जस्मिन का अर्थ है जूही या मोगरा, जो टयूनीसिया का राष्ट्रीय फूल है। समूचे अरब जगत में इसे एक ऐतिहासिक घटनाक्रम के तौर पर देखा जा रहा है, जिसकी शुरुआत एक मामूली सी लगने वाली घटना से हुई थी। 17 दिसंबर को टयूनिस के पास स्थित एक शहर में स्नातक शिक्षित युवक मोहम्मद बुआजी ने तब खुदकुशी कर ली, जब पुलिस ने उसके फलों की गाड़ी को जब्त कर लिया और उसे उसे दंडित भी किया। बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहे मोहम्मद ने पुलिसिया व्यवहार से क्षुब्ध होकर आत्मदाह कर लिया, क्योंकि उसके पास इसके अलावा परिवार को पालने के लिए दूसरा कोई उपाय नहीं था। आत्महत्या की यह खबर सुनकर तमाम बेरोजगार युवकों और आम लोगों का गुस्सा भ्रष्टाचार और नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के खिलाफ फूट पड़ा और देश के तमाम शहरों में प्रदर्शन शुरू हो गए। दो दशक से अधिक समय तक हुकूमत पर अपनी मजबूत पकड़ जमाए बेन अली के सुरक्षाबलों एवं व्यापक गुप्तचर तंत्र के सहारे इन उग्र प्रदर्शनों को दबाने की कोशिश की गई। अपने पश्चिमी जगत के आकाओं को खुश करने के लिए और उनका समर्थन जुटाने के लिए शुरुआत में राष्ट्रपति ने उग्र जनता को आतंकवादी कहा, लेकिन इससे डरी नहीं। लोगों में सुरक्षाबलों की गोलियों का डर गोया खत्म हो गया और हर जगह जनता आगे आ गई। फिर बेन अली ने अपने राष्ट्रीय संबोधन में समझौते की पेशकश की। 2014 के संभावित चुनावों के बजाय कुछ माह के अंदर नए चुनाव कराने का आश्वासन दिया। वर्ष 2009 में ही बेन अली पांचवी बार ट्यूनीसिया के राष्ट्रपति निर्वाचित हुए थे। इन दिनों तानाशाह बेन अली सऊदी अरब में शरण लिए हुए हैं। शरण देने के एवज में सऊदी सरकार ने बेन अली पर राजनीति न करने और मीडिया से दूर रहने की शर्त रखी है। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि बेन अली को उस मुल्क में शरण लेनी पड़ी, जिसके शाहों के साथ ट्यूनीसिया के संबंध कभी सामान्य नहीं रहे। इसकी वजह इस्लाम की विशिष्ट परंपरा थी, जिसमें स्ति्रयों को भी बराबरी के अधिकार मिले थे। ट्यूनीसिया में इस्लाम का वह रूप कभी स्थापित नहीं हो सका, जिसकी हिमायत सऊदी अरब करता आया है। ट्यूनीसिया की संसद में 20 फीसदी महिलाएं सदस्य हैं और पुरुषों की तरह ही कारोबार करती हैं। बुरका पहनने को कभी भी सरकारी समर्थन नहीं मिला, बल्कि इसे निरुत्साहित ही किया गया। मुस्लिम बहुल मुल्कों में जिस तरह तुर्की ने कमाल पाशा की अगुआई में अपने मुल्क को आधुनिक रास्तों पर डालने की कोशिश की थी, वैसी ही पहल बेन अली के पूर्ववर्ती बुरगुइबा ने की। उन्हें एक रक्तहीन क्रांति के जरिये बेन अली ने अपदस्थ किया था। बेन अली के खिलाफ जनविद्रोह के सफल होने में कई कारकों में विकीलीक्स के उद्घाटनों से संबंधित भी है। जानने योग्य है कि विकीलीक्स ने जिन डिप्लोमेटिक केबल्स का खुलासा किया उसमें कुछ केबल ट्यूनीसिया में अमेरिका के राजदूत द्वारा अपने वरिष्ठों को भी भेजे गए थे, जिसमें उन्होंने बेन अली परिवार खासकर उनकी दूसरी पत्नी एवं उसके रिश्तेदारों द्वारा जमा की अकूत संपत्ति को लेकर जनता के गुस्से का जिक्र किया था और यह भी कहा था कि सरकार की नीतियों के खिलाफ जनता का गुस्सा बढ़ रहा है और स्थितियां काबू के बाहर भी जा सकती है। स्पष्ट है कि सब कुछ इस कदर तेजी से घटित हुआ कि पश्चिमी और अरब जगत के तमाम चौधरियों का खुला समर्थन काम नहीं आ सका। इस घटनाक्रम से जनता पूरी तरह आशान्वित है। यह महज संयोग नहीं कि मिस्र, अल्जीरिया, जॉर्डन जैसे मुल्कों मे आर्थिक नीतियों और हुक्मरानों की मनमानी के खिलाफ लोग सड़कों पर उतरे हैंै। 16 जनवरी को यमन की राजधानी की सड़कों पर हजारों छात्रों और युवाओं ने जोरदार प्रदर्शन कर ट्यूनीसिया की अवाम को अपना सलाम भेजा। यह महज प्रतीकात्मक नहीं था कि उनका यह प्रदर्शन ट्यूनीसिया के दूतावास पर जाकर खत्म हुआ। अपने यहां के हुक्मरानों का नाम लिए बगैर उन्होंने आवाज बुलंद की कि वह भी ट्यूनीसिया से सबक लेकर अपना पद छोड़ें। दूसरी तरफ अरब हुक्मरानों की बेचैनी को जुबां देती हुई तकरीर लीबिया के शासक मुहम्मद गद्दाफी की है जो 1968 से वहां सत्ता पर कुंडली मारे बैठे हैं। अपने भाषण में उन्होंने ट्यूनीसिया की जनता की निंदा की। कुछ ऐसा ही हाल मिस्र के होस्नी मुबारक का है जो विगत तीस साल से वहां के शासक हैं और आने वाले दिनों में अपने बेटे को सत्ता सौंपने वाले हैं। ट्यूनीसिया के घटनाक्त्रम ने अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस जैसे मुल्कों के लोकतंत्र को लेकर पाखंड को भी उजागर किया है। जब ट्यूनीसिया की सड़कों पर सुरक्षा बल निहत्थे प्रदर्शनकारियों की लाशें बिछा रहे थे तब यह मौन थे। आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में ट्यूनीसिया को शामिल रखने वाले इन पश्चिमी मुल्कों के लिए इस बात से कोई गुरेज नहीं था कि वह वहां दो दशक से अधिक समय से सत्तासीन बेन अली ने जनता को तमाम जनतांत्रिक अधिकारों से वंचित रखा था। मानवाधिकारों के घोर हनन के लिए ट्यूनीसिया की आलोचना करना तो दूर फ्रांस ने इतना भी कह दिया कि वह चाहे तो दंगाइयों को काबू में करने के लिए वह अपनी दंगा निरोधी पुलिस बल को भी भेज सकता है। ट्यूनीसिया जैसे अरब मुल्कों में आधुनिक समझे जाने वाले मुल्क की अवाम का इस कदर करवट लेना एक मायने में शुभसंकेत समझा जाना चाहिए। एक ऐसे समय में जबकि अमेरिका एवं बाकी पश्चिमी देशों की शह पर यहां तमाम अरब देशों की हुकूमतें किसी भी किस्म के व्यापक राजनीतिक-सामाजिक सुधारों से अपनी अवाम को वंचित रख रही हैं, तब यहां जनविद्रोह एक नई बयार लाने में सफल हो सकता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ये सभी अमेरिकापरस्त हुकूमतें जनता के संभावित आंदोलनों से हमेशा ही इतनी आतंकित रही हैं कि इनमें से कई देशों में फिलिस्तीन की हिमायत में जोरदार प्रदर्शन करने पर या कोई मुहिम चलाने पर उन्होंने अनधिकृत पाबंदी लगा रखी है। हालांकि वे सभी हुक्मरान जानते हैं कि जनता जब तक गाफिल है तब तक तो ठीक है जब जाग जाएगी तो बकौल फैज तख्त़ गिराए जाएंगे और ताज उछाले जाएंगे का दौर कभी भी शुरू हो सकता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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