नेपाल और भारत में माओवादी आंदोलन को हवा देने के लिए चीन ने भाषाई जाल फेंका है। नेपाल के पहाड़ी कैंपों में दोनों देशों के प्रमुख आंदोलनकारियों को चीनी भाषा पढ़ाई जा रही है। खुफिया एजेंसियों को जानकारी मिली है कि चीनी भाषा की पढ़ाई इसलिए की जा रही है जिससे दोनों देश के माओवादी वार्ता कर संयुक्त अभियान चला सकें और सुरक्षा एजेंसियां सर्विलांस पर उनकी बातचीत सुनें भी तो तत्काल कोई एक्शन न ले सकें। भारत सीमा पर नेपाल के हिस्से में माह भर पहले तक बोर्ड लगाकर चीनी स्टडीज सेंटर चल रहे थे। खुफिया एजेंसियों के चौकन्ना होने के बाद रातों-रात इन केंद्रों की जगह बदल गई है। ये सेंटर अब नेपाल के पहाड़ी इलाकों में चल रहे हैं। सूत्रों की माने तो चीन की मंशा सुरक्षा एजेंसियों को भाषाई जाल में उलझाना है। इसका उदाहरण 17 जनवरी को देखने को मिला, जब नेपाल सीमा से बहराइच में अवैध तरीके से घुसपैठ करने वाले चीनी नागरिक सुश्री यांग लियु, चेनरांग व सू डांग ली को पकड़ा गया। तब पुलिस और एसएसबी के जवान उनकी भाषा समझ नहीं सकें। यह पता नहीं चल सका कि तीनों नागरिक किस मकसद से भारतीय सीमा में घुसे। हालांकि उन्हें रिमांड पर लेकर नये सिरे से पूछताछ हो रही है। नेपाल व भारत के माओवादियों को एक मुहिम से जोड़ने के चीन के खेल का एक और उदाहरण देखने को मिला, जब वार्दिया नेशनल पार्क के पास नेपाली अधिकारियों ने दो चीनी नागरिक पकड़े गये, जिनके पास से 20 लाख नेपाली मुद्रा और भारतीय राशन कार्ड मिले थे। खुफिया एजेंसियों तक यह सूचना है कि नेपाल और भारत के बौद्ध मठों (ज्यादातर यूपी) में चीनी प्रशिक्षु बौद्ध भिक्षु बनकर रह रहे हैं, जिनका मकसद माओवादी आंदोलन को हवा देना और उसके लिए रिमोट कंट्रोलर तैयार करना है। उधर मुश्किल यह है कि चीनियों ने माओवादियों को अपनी भाषा सिखानी शुरू कर दी, और इससे वाकिफ होने पर भी यहां की सुरक्षा एजेंसियों के पास उनकी भाषा समझने वालों का अकाल है। हालांकि विशेष पुलिस महानिदेशक कानून- व्यवस्था ब्रजलाल कहते हैं कि हर गतिविधि पर हमारी नजर है। हमारे पास चीन की भाषा समझने वाले लोग हैं और उनसे पूछताछ भी की गयी है। सभी बातें मीडिया को नहीं बता सकते हैं।
Wednesday, January 26, 2011
चीन ने फेंका भाषाई जाल
नेपाल और भारत में माओवादी आंदोलन को हवा देने के लिए चीन ने भाषाई जाल फेंका है। नेपाल के पहाड़ी कैंपों में दोनों देशों के प्रमुख आंदोलनकारियों को चीनी भाषा पढ़ाई जा रही है। खुफिया एजेंसियों को जानकारी मिली है कि चीनी भाषा की पढ़ाई इसलिए की जा रही है जिससे दोनों देश के माओवादी वार्ता कर संयुक्त अभियान चला सकें और सुरक्षा एजेंसियां सर्विलांस पर उनकी बातचीत सुनें भी तो तत्काल कोई एक्शन न ले सकें। भारत सीमा पर नेपाल के हिस्से में माह भर पहले तक बोर्ड लगाकर चीनी स्टडीज सेंटर चल रहे थे। खुफिया एजेंसियों के चौकन्ना होने के बाद रातों-रात इन केंद्रों की जगह बदल गई है। ये सेंटर अब नेपाल के पहाड़ी इलाकों में चल रहे हैं। सूत्रों की माने तो चीन की मंशा सुरक्षा एजेंसियों को भाषाई जाल में उलझाना है। इसका उदाहरण 17 जनवरी को देखने को मिला, जब नेपाल सीमा से बहराइच में अवैध तरीके से घुसपैठ करने वाले चीनी नागरिक सुश्री यांग लियु, चेनरांग व सू डांग ली को पकड़ा गया। तब पुलिस और एसएसबी के जवान उनकी भाषा समझ नहीं सकें। यह पता नहीं चल सका कि तीनों नागरिक किस मकसद से भारतीय सीमा में घुसे। हालांकि उन्हें रिमांड पर लेकर नये सिरे से पूछताछ हो रही है। नेपाल व भारत के माओवादियों को एक मुहिम से जोड़ने के चीन के खेल का एक और उदाहरण देखने को मिला, जब वार्दिया नेशनल पार्क के पास नेपाली अधिकारियों ने दो चीनी नागरिक पकड़े गये, जिनके पास से 20 लाख नेपाली मुद्रा और भारतीय राशन कार्ड मिले थे। खुफिया एजेंसियों तक यह सूचना है कि नेपाल और भारत के बौद्ध मठों (ज्यादातर यूपी) में चीनी प्रशिक्षु बौद्ध भिक्षु बनकर रह रहे हैं, जिनका मकसद माओवादी आंदोलन को हवा देना और उसके लिए रिमोट कंट्रोलर तैयार करना है। उधर मुश्किल यह है कि चीनियों ने माओवादियों को अपनी भाषा सिखानी शुरू कर दी, और इससे वाकिफ होने पर भी यहां की सुरक्षा एजेंसियों के पास उनकी भाषा समझने वालों का अकाल है। हालांकि विशेष पुलिस महानिदेशक कानून- व्यवस्था ब्रजलाल कहते हैं कि हर गतिविधि पर हमारी नजर है। हमारे पास चीन की भाषा समझने वाले लोग हैं और उनसे पूछताछ भी की गयी है। सभी बातें मीडिया को नहीं बता सकते हैं।
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