अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा पर चीन का लगातार बढ़ता हस्तक्षेप इस बात का संकेत है कि वह इस सीमा रेखा को बदलने की पुरजोर कोशिश में है। चीनी सैनिकों ने वास्तविक नियंत्रण रेखा लांघकर लद्दाख क्षेत्र में न केवल घुसने का दुस्साहस किया, बल्कि चल रहे काम को भी रुकवा दिया। इससे भी शर्मनाक बात यह हुई कि गृह मंत्रालय के निर्देश पर भारतीय सेना ने दखल देकर राज्य सरकार को यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया। कोई जवाबी कार्रवाई करने की बजाय लाचारी की यह स्थिति चीनी सैनिकों का हौसला और उसके साम्राज्यवादी मंसूबों को भी मजबूत करने वाला है। चीन इस निष्कि्रयता से प्रोत्साहित होकर लेह, अरुणाचल और सिक्किम में दखलंदाजी बढ़ा सकता है। चीन की इस तरह की हरकतें नई नहीं है। भाईचारे और व्यापारिक समझौतों की आड़ में वह भारत की पीठ में छूरा भोंकने से बाज नहीं आता। नवंबर 2009 में भी चीनी सैनिकों ने भारत के लद्दाख क्षेत्र में निर्माणाधीन सड़क को रोकने की चेतावनी दी थी। इस सड़क का निर्माण भी देमचोक इलाके में हो रहा था। इसे रक्षा मंत्रालय द्वारा लेह के तत्कालीन उपायुक्त एके साहू के समक्ष आपत्तियां जताने के बाद रोक दिया गया था। अक्टूबर 2009 में भी दक्षिण-पूर्वी लद्दाख क्षेत्र के देमचोक क्षेत्र में ही एक पहंुच मार्ग का निर्माण चीनी दखल से रोकना पड़ा था और वास्तविक नियंत्रण रेखा पर देमचोक के आखिरी छोरों पर मौजूद दो ग्रामों को जोड़ने वाली सड़क के निर्माण को रोका गया था। चीनी दखल की पराकाष्ठा निर्माणाधीन कायरें को रोकने तक सीमित नहीं है। 31 जुलाई 2009 को तो चीनी सैनिक मर्यादा की सभी हदें पार कर भारत के गया शिखर क्षेत्र में डेढ़ किलोमीटर भीतर घुसकर कई चट्टानों पर लाल रंग से चाइना और चीन-9 लिख चुके हैं। जबकि एक समझौते के तहत शिखर गया को दोनों देश अंतरराष्ट्रीय सीमा की मान्यता देते हैं। इसके अलावा कराकोरम क्षेत्र में भी चीनी हलचलें बढ़ रही हैं। चीन ने सीधे इस्लामाबाद पहंुचने के लिए कराकोरम होकर सड़क मार्ग भी तैयार कर लिया है और अब वह पाक अधिकृत कश्मीर यानी पीओके को पाक का हिस्सा बता रहा है। चीनी दस्तावेजों में अब इस विवादित क्षेत्र को उत्तरी पाकिस्तान दर्शाया जा रहा है। भारत विरोधी मंशा के चलते ही चीन ने पीओके क्षेत्र में 80 अरब डॉलर का पूंजी निवेश किया है। यहां से वह अरब सागर पहंुचने की कोशिश में जुटा है। चीन की पीओके में ये गतिविधियां सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हैं। इन पर भारत को लगातार नजर रखने की जरूरत है। अरुणाचल प्रदेश में भी चीनी हस्तक्षेप बढ़ रहा है। हाल ही में गूगल अर्थ की तर्ज पर शुरू किए ऑन लाइन मानचित्र सेवा में चीन ने अरुणाचल और अक्साई चिन को अपने देश का हिस्सा बताया है। उल्लेखनीय है कि अरुणाचल को दक्षिणी तिब्बत और अक्साई चिन को शिनजियांग प्रांत का अंग बताया है। चीन ने भारत पर शिकंजा कसने के लिए हाल के दिनों में नेपाल में भी दिलचस्पी लेना शुरू किया है। भारत ने भी शक्ति संतुलन बनाए रखने के नजरिए से नेपाल के तराई क्षेत्रों में सड़कों के निर्माण हेतु 750 करोड़ रुपये दिए हैं, जबकि चीन नेपाल में सड़कों का जाल बिछाने और विद्युत संयंत्र लगाने के लिए अरबों पूंजी खर्च कर रहा है। चीन की मंशा है कि नेपाल में जो 20 हजार तिब्बती शरणार्थियों को नियंत्रित रखा जाए। यदि चीन का नेपाल में इसी तरह दखल रहा तो तय है कुछ ही दशकों में चीन, नेपाल की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान के साथ-साथ उसकी भौगोलिक संप्रभुता के लिए भी घातक सिद्ध होगा। चीन का पूर्व का इतिहास भी यही बताता है। ताइवान में भी पहले उसने आर्थिक मदद और विकास के बहाने घुसपैठ की और फिर अधिपति बन बैठा। तिब्बत पर तो चीन के अनधिकृत कब्जे से दुनिया वाकिफ ही है। साम्यवादी देशों की हड़प नीतियों के चलते ही चेकोस्लोवाकिया बरबादी के चरम पर पहंुचा। पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यांमार के बंदरगाहों पर आज चीनी युद्धपोत तैनात हैं। विश्व मंचों पर चीन दुनिया के देशों को संदेश दे रहा है कि भारत के पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश और म्यांमार समेत किसी भी सीमांत देश से मधुर संबंध नहीं हैं। यही नहीं चीन नकली भारतीय मुद्रा छापकर लगातार पाकिस्तान व बांग्लादेश के जरिये भारत पहंुचाकर भारतीय अर्थव्यवस्था को नुकसान पहंुचा रहा है। इसके अलावा चीन द्वारा नकली दवाएं बनाकर उन पर मेड इन इंडिया लिखकर तीसरी दुनिया के देशों में खपाने का सिलसिला भी सार्वजनिक हो चुका है, लेकिन यह जारी है। इन अप्रत्यक्ष व अदृश्य चीनी सामरिक रणनीतियों से आंख मूंदकर भारत मुंह चुराएगा तो अंत में भारत को ही मुंह की खानी पड़ेगी।
Saturday, January 29, 2011
भारत पर शिकंजा कस रहा चीन
अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा पर चीन का लगातार बढ़ता हस्तक्षेप इस बात का संकेत है कि वह इस सीमा रेखा को बदलने की पुरजोर कोशिश में है। चीनी सैनिकों ने वास्तविक नियंत्रण रेखा लांघकर लद्दाख क्षेत्र में न केवल घुसने का दुस्साहस किया, बल्कि चल रहे काम को भी रुकवा दिया। इससे भी शर्मनाक बात यह हुई कि गृह मंत्रालय के निर्देश पर भारतीय सेना ने दखल देकर राज्य सरकार को यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया। कोई जवाबी कार्रवाई करने की बजाय लाचारी की यह स्थिति चीनी सैनिकों का हौसला और उसके साम्राज्यवादी मंसूबों को भी मजबूत करने वाला है। चीन इस निष्कि्रयता से प्रोत्साहित होकर लेह, अरुणाचल और सिक्किम में दखलंदाजी बढ़ा सकता है। चीन की इस तरह की हरकतें नई नहीं है। भाईचारे और व्यापारिक समझौतों की आड़ में वह भारत की पीठ में छूरा भोंकने से बाज नहीं आता। नवंबर 2009 में भी चीनी सैनिकों ने भारत के लद्दाख क्षेत्र में निर्माणाधीन सड़क को रोकने की चेतावनी दी थी। इस सड़क का निर्माण भी देमचोक इलाके में हो रहा था। इसे रक्षा मंत्रालय द्वारा लेह के तत्कालीन उपायुक्त एके साहू के समक्ष आपत्तियां जताने के बाद रोक दिया गया था। अक्टूबर 2009 में भी दक्षिण-पूर्वी लद्दाख क्षेत्र के देमचोक क्षेत्र में ही एक पहंुच मार्ग का निर्माण चीनी दखल से रोकना पड़ा था और वास्तविक नियंत्रण रेखा पर देमचोक के आखिरी छोरों पर मौजूद दो ग्रामों को जोड़ने वाली सड़क के निर्माण को रोका गया था। चीनी दखल की पराकाष्ठा निर्माणाधीन कायरें को रोकने तक सीमित नहीं है। 31 जुलाई 2009 को तो चीनी सैनिक मर्यादा की सभी हदें पार कर भारत के गया शिखर क्षेत्र में डेढ़ किलोमीटर भीतर घुसकर कई चट्टानों पर लाल रंग से चाइना और चीन-9 लिख चुके हैं। जबकि एक समझौते के तहत शिखर गया को दोनों देश अंतरराष्ट्रीय सीमा की मान्यता देते हैं। इसके अलावा कराकोरम क्षेत्र में भी चीनी हलचलें बढ़ रही हैं। चीन ने सीधे इस्लामाबाद पहंुचने के लिए कराकोरम होकर सड़क मार्ग भी तैयार कर लिया है और अब वह पाक अधिकृत कश्मीर यानी पीओके को पाक का हिस्सा बता रहा है। चीनी दस्तावेजों में अब इस विवादित क्षेत्र को उत्तरी पाकिस्तान दर्शाया जा रहा है। भारत विरोधी मंशा के चलते ही चीन ने पीओके क्षेत्र में 80 अरब डॉलर का पूंजी निवेश किया है। यहां से वह अरब सागर पहंुचने की कोशिश में जुटा है। चीन की पीओके में ये गतिविधियां सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हैं। इन पर भारत को लगातार नजर रखने की जरूरत है। अरुणाचल प्रदेश में भी चीनी हस्तक्षेप बढ़ रहा है। हाल ही में गूगल अर्थ की तर्ज पर शुरू किए ऑन लाइन मानचित्र सेवा में चीन ने अरुणाचल और अक्साई चिन को अपने देश का हिस्सा बताया है। उल्लेखनीय है कि अरुणाचल को दक्षिणी तिब्बत और अक्साई चिन को शिनजियांग प्रांत का अंग बताया है। चीन ने भारत पर शिकंजा कसने के लिए हाल के दिनों में नेपाल में भी दिलचस्पी लेना शुरू किया है। भारत ने भी शक्ति संतुलन बनाए रखने के नजरिए से नेपाल के तराई क्षेत्रों में सड़कों के निर्माण हेतु 750 करोड़ रुपये दिए हैं, जबकि चीन नेपाल में सड़कों का जाल बिछाने और विद्युत संयंत्र लगाने के लिए अरबों पूंजी खर्च कर रहा है। चीन की मंशा है कि नेपाल में जो 20 हजार तिब्बती शरणार्थियों को नियंत्रित रखा जाए। यदि चीन का नेपाल में इसी तरह दखल रहा तो तय है कुछ ही दशकों में चीन, नेपाल की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान के साथ-साथ उसकी भौगोलिक संप्रभुता के लिए भी घातक सिद्ध होगा। चीन का पूर्व का इतिहास भी यही बताता है। ताइवान में भी पहले उसने आर्थिक मदद और विकास के बहाने घुसपैठ की और फिर अधिपति बन बैठा। तिब्बत पर तो चीन के अनधिकृत कब्जे से दुनिया वाकिफ ही है। साम्यवादी देशों की हड़प नीतियों के चलते ही चेकोस्लोवाकिया बरबादी के चरम पर पहंुचा। पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यांमार के बंदरगाहों पर आज चीनी युद्धपोत तैनात हैं। विश्व मंचों पर चीन दुनिया के देशों को संदेश दे रहा है कि भारत के पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश और म्यांमार समेत किसी भी सीमांत देश से मधुर संबंध नहीं हैं। यही नहीं चीन नकली भारतीय मुद्रा छापकर लगातार पाकिस्तान व बांग्लादेश के जरिये भारत पहंुचाकर भारतीय अर्थव्यवस्था को नुकसान पहंुचा रहा है। इसके अलावा चीन द्वारा नकली दवाएं बनाकर उन पर मेड इन इंडिया लिखकर तीसरी दुनिया के देशों में खपाने का सिलसिला भी सार्वजनिक हो चुका है, लेकिन यह जारी है। इन अप्रत्यक्ष व अदृश्य चीनी सामरिक रणनीतियों से आंख मूंदकर भारत मुंह चुराएगा तो अंत में भारत को ही मुंह की खानी पड़ेगी।
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