Thursday, January 13, 2011

नेपाल में चीन की चाल

नेपाल में चीन के बढ़ते प्रभाव पर लेखक  की टिप्पणी
पाकिस्तान को अपने पाले में करने के बाद अब चीनी ड्रैगन नेपाल के साथ पींगे बढ़ा रहा है। यह हिमालय क्षेत्र में प्रभुत्व की दिशा में चीन की एक कुटिल चाल है। सरकारी तौर पर चीनियों ने नेपाल के प्रति सरकार समर्थक नीति की घोषणा की है। विशेषज्ञों के मुताबिक नेपाल-चीन संबंध पंचशील सिद्धांतों पर आधारित हैं। इसके अनुसार चीन, नेपाल की अंदरूनी नीतियों में दखल नहीं देगा और नेपाल, तिब्बत व ताइवान पर चीन की प्रभुसत्ता और प्रादेशिक अखंडता का सम्मान करेगा। इस तरह चीन ने नेपालवासियों के दिल में अपने लिए सम्मान बढ़ा लिया है। हाल ही में, भारतीय सेना के उत्तरी कमान के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल बीएस जसवाल को वीजा देने से इनकार करने के मामले पर भारत और चीन के रिश्तों में खटास आ गई थी। कश्मीरियों को नत्थी वीजा जारी करने, अरुणाचल पर अपना दावा जताने, दलाई लामा को भारत के समर्थन जैसे मुद्दों ने इस तनाव को और भी बढ़ाया है। लगता है भारत के प्रभाव को कम करने के लिए ही चीन ने नेपाल में दखल बढ़ाया है। साफ है कि हमारे पड़ोस के दूसरे देशों में भी चीन यही नीति चलेगा। नेपाल की अंदरूनी स्थिति की बात करें तो सभी जानते हैं कि वहां के माओवादियों को चीन से मदद मिलती है। पिछले महीनों के घटनाक्रम से साफ है कि माओवादी नेपाल में भारतीय दखल को उनकी सत्ता के राह में रोड़ा मानते हैं और इसके लिए वह चीन की मदद चाहते हैं। चीन जानता है कि नेपाल से तिब्बत में आसानी से प्रवेश संभव है और दुनिया में दूसरे नंबर पर सबसे अधिक तिब्बती शरणार्थी नेपाल में हैं। इसलिए चीन नेपाल में बसे करीब 20 हजार तिब्बतियों की भूमिगत गतिविधियों को खास तौर से मार्च 2008 के तिब्बत विद्रोह के बाद रोकना चाहता है। चीन का आरोप है कि अंतरराष्ट्रीय ताकतें नेपाल में मौजूद तिब्बतियों के जरिये चीन के खिलाफ अभियान चला रही हैं। इस सिलसिले में जब फरवरी 2009 में छह नेपाली सांसदों ने दलाई लामा से धर्मशाला में मुलाकात की तो चीन ने गहरी चिंता जताई। इसके बाद ही चीन ने नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ अच्छे संबंध बनाने शुरू कर दिए। दूरदराज के मुस्तांग पर्वतीय क्षेत्र के लिए भारत द्वारा 10 करोड़ डॉलर की विकास सहायता राशि दिए जाने के फौरन बाद चीन ने भारत के प्रभाव को कम करने के लिए उसी इलाके में छोसर गांव में स्कूल संबंधी निर्माण के लिए एक करोड़ रुपये की सहायता की घोषणा की। इन दिनों चीन भारत-नेपाल सीमा के पास नेपाल में एक चीनी अध्ययन केंद्र खोलने जा रहा है। अब तक खोले गए 11 में से सात केंद्र भारत-नेपाल सीमा के निकट हैं। यही कड़ी प्रतिस्पद्र्घा नहीं तो और क्या है। उधर चीन अपनी रेललाइन को तिब्बत से नेपाल सीमा तक ला रहा है, तो भारत भी नेपाल तक रेल लाइन बिछा रहा है। अगर चीन भड़काऊ भूमिका निभाता है तो भारत की सुरक्षा के लिए निश्चित ही इसके गंभीर मायने होंगे। अगर भारत चुप रहा तो वह अपने एक बहुमूल्य पड़ोसी को चीन के हवाले कर देगा और उसकी सामरिक पैठ खत्म हो जाएगी। भारत और चीन दोनों पड़ोसी देशों के लिए आदर्श स्थिति तो यही होगी कि वे नेपाल का बफर देश की हैसियत से सम्मान करें। इससे नेपाल में राजनीतिक स्थिरता पैदा होगी और दोनों देशों के दीर्घावधि हितों के लिए भी हितकर होगा। दोनों ओर के राजनेताओं को शायद इस कठोर सत्य का पता है और वे इस मामले पर भिन्न-भिन्न विचारों में तालमेल बिठाने की कोशिश भी कर रहे हैं। इसलिए अगर हाल ही में चीन के प्रधानमंत्री भारी-भरकम शिष्टमंडल के साथ भारत आए तो हैरानी की बात नहीं है। हम भी पीछे नहीं थे और हमने भी उनके स्वागत में पलक-पांवड़े बिछा दिए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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