एमक्यूएम के गठबंधन में फिर शामिल होने से सरकार को फिलहाल बेशक जीवनदान मिल गया है, लेकिन सरकार को बचाने या गिराने का काम विपक्षी पार्टियों के हाथ में है। इसलिए उसे देश की जनता की समस्याओं को सुलझाने के लिए सभी पार्टियों को साथ लेकर ठो स कदम उठाने होंगे, तभी सरकार अपना बाकी समय पूरा कर पाएगी। भारत एक पड़ोसी होने के नाते चाहता है कि पाकिस्तान में लोकतंत्र कायम रहे, इसी में इस सारे क्षेत्र की भलाई है
पाकिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार में शामिल जमीयत उल्माए इस्लाम और मुतहिदा कौमी मूवमेंट (एमक्यूएम) के सरकार से अलग हो जाने से सरकार अल्पमत में आ गई थी। प्रधानमंत्री युसूफ रजा गिलानी व राष्ट्रपति जरदारी की, अलग हुई दोनों पार्टियों व अन्य पार्टियों का समर्थन हासिल करने के लिए जबर्दस्त कोशिश जारी थी ताकि सरकार कायम रहे। नतीजतन संसद में 25 सांसदों वाली एमक्यूएम सत्तासीन गठबंधन में दोबारा शामिल होने के लिए तैयार तो हो गई है। फिर भी उसने मंत्रिमंडल में शामिल होने से इनकार कर दिया है। सरकार ने एमक्यूएम का समर्थन पाने के लिए उसकी और अन्य विपक्षी पार्टियों की मांग पर पेट्रोलियम पदार्थोंकी हाल ही में बढ़ाई गई कीमतों को वापस ले लिया है और जनरल सेल्स टैक्स कानून में सुधार व विस्तार मामले को भी ठण्डे बस्ते में डाल दिया है। सरकार इस कानून का विस्तार करके ज्यादा टैक्स वसूल करना चाहती थी। उसके इस कदम से आम जनता व सरकार को दोनों को राहत मिली है। एमक्यूएम का कहना है कि उसने यह कदम राष्ट्रीय, आर्थिक स्थिति और देश के सामने मौजूद सुरक्षा की चुनौती को देखते हुए उठाया है। दूसरी तरफ अमेरिका ने कीमतों को वापस लेने के फैसले से नाराजगी जताई है। उसका मानना है कि सरकार का कीमतों में कमी करने का फैसला गलत है। वह यह भी मानता है कि पाकिस्तान सरकार अर्थव्यवस्था में सुधार करने के लिए वचनबद्ध है जो कि एक मुश्किल काम है। इससे राजनीतिक समस्याएं खड़ी हो सकती हैं। लेकिन अब इसके बिना कोई दूसरा रास्ता नहीं है। दूसरी तरफ इस कदम से सरकार को जीवनदान मिल गया है, पर अभी कहना मुश्किल है कि वह अपनी बाकी दो साल की अवधि पूरी कर सकेगी। नये चुनाव सन् 2013 में होने हैं। पाकिस्तान सरकार के पहले अल्पमत में आने, फिर बहुमत हासिल करने के इस सारे घटनाक्रम में कुछ बातें खुलकर सामने आ गई हैं जिससे जेयूआई और विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी पीएमएल (नवाज) का असली चेहरा सामने आ गया है। अपने एक मंत्री को प्रधानमंत्री द्वारा बर्खास्त करने से नाराज होकर अलग हुई धार्मिक पार्टी जेयूआई की भी असलियत का पर्दाफाश हो गया है और उसके मुखिया मौलाना फजल-उल-रहमान की पोल खुल गई है। विकीलीक्स में छपी मौलाना की अमेरिकी दोस्ती की रिपोर्ट आने के बाद उनकी अपनी पार्टी में काफी तनातनी थी। मौलाना के समर्थकों ने इस बात पर सख्त नाराजगी जताई कि मौलाना सत्ता के लिए गुपचुप अमेरिका के दर पर सर झुकाते रहे जबकि दूसरी तरफ मौलाना खुले आम अमेरिका का विरोध करते हैं। इसलिए मौलाना ने इस नुक्ताचीनी से बचने के लिए सत्ता से अलग होकर यह बताने की चेष्टा की है कि उन्हें सत्ता का लालच नहीं है और इससे अमेरिका के समर्थक होने का दाग भी धुल जाएगा। काबिले गौर है कि जेयूआई बलूचिस्तान प्रांत की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की सरकार में शामिल है और सत्ता का सुख भोग रही है। जब अल्पमत में सरकार आ गई तो उस समय मुस्लिम लीग (नवाज) के मुखिया नवाज शरीफ ने गिलानी सरकार को बाहर से समर्थन देने का वादा किया और विश्वास दिलाया कि वह सरकार को गिरने नहीं देंगे। वरना देश में अस्थिरता फैलेगी और लोकतंत्र पटरी से उतर जाएगा। अभी इस विश्वास की स्याही सूखी ही नहीं थी कि नवाज शरीफ ने सरकार को 6 दिन का अल्टीमेटम देकर चुनाव की चुनौती दी और सरकार के सामने 11 मांगें भी रख दीं जिसमें सरकारी खर्च में 30 प्रतिशत कटौती, सत्ताधारी पार्टी के कार्यकर्ताओं व नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों में अदालत के आ चुके फैसलों को अमलीजामा पहनाना शामिल है। अपनी पार्टी के नेताओं के खिलाफ चल रहे मुकदमे वापस लेने और कुछ मंत्रियों को हटाने की मांग भी की गई। ये मांगें तुरंत पूरी नहीं की जा सकेंगी। पर पूरी न हुई तो मुस्लिम लीग (नवाज) सरकार गिराने की कोशिश में दूसरी विपक्षी पार्टियों के साथ बात कर सकती है। इधर पंजाब के राज्यपाल सलमान तासीर की अपने ही अंगरक्षक के हाथों हत्या को लेकर नये संदेह उभरे हैं। पीपीपी के नेताओं का पंजाब में पीएमएल (नवाज) के नेतृत्व वाली सरकार पर आरोप है कि उसने हत्यारे पुलिसकर्मी कादरी की स्वीकारोक्ति को रद्द करते हुए, इसके पीछे राजनीतिक मंशा बताया है। इससे पीएमएल (नून) व पीपीपी में कशिश और बढ़ गई है। एमक्यूएम ने सरकार में दोबारा शामिल होने का ऐलान कर दिया है, लेकिन अभी नहीं कहा जा सकता कि गठबंधन कब तक चलेगा। असल में एमक्यूएम और पीपीपी का गठबंधन शुरू से रस्साकशी का शिकार रहा है। जब राष्ट्रीय मेल मिलाप आर्डिनेंस नेशनल असेम्बली में स्वीकृति के लिए पेश हुआ तब एमक्यूएम ने इसका विरोध किया था। एमक्यूएम सिंध में जनरल जिया द्वारा लागू नाजिम व्यवस्था जारी रखना चाहती है जबकि सरकार कमिश्नरी व्यवस्था लागू करने के पक्ष में है जो दूसरे प्रांतों में लागू हो चुकी है। यही कारण है कि एमक्यूएम ने कराची को पांच जिलों में तकसीम नहीं होने दिया। हाल ही की कशिश का कारण ‘टारगेट किलिंग’ मसला बना। सिंध सरकार के गृहमंत्री डॉ. मिर्जा ने एमक्यूएम को ‘टारगेट किलिंग’ का जिम्मेदार ठहराया। एमक्यूएम का मानना है कि सरकार ने कराची में बाहर से पठानों व पख्तूनों को लाकर बसा दिया है जो उनके कार्यकर्ताओं की हत्या कर रहे हैं। सिंधी समुदाय भी एमक्यूएम (जिसका आधार मुहाजिर, यानी वे मुसलमान हैं जो देश के बंटवारे के लिए पाक चले गये थे) से दुश्मनी रखता है। यही कारण है कि पाजामा पहनने वाले, पान खाने वाले व उर्दू भाषी मुहाजिरों को मूलधारा में अभी तक शामिल नहीं किया गया और उन्हें मुहाजिर यानी शरणार्थी कहा जाता है। गर्ज ये कि अगर सरकार ने एमक्यूएम के लोगों की समस्याओं का कोई पुख्ता समाधान न किया तो यह पार्टी एक बार फिर गठबंधन से अलग हो सकती है। दूसरे शब्दों में पाक सरकार के आने वाले दिन और कठिन हैं। देश के सामने सुरक्षा बहुत बड़ी चुनौती है। बजट घाटे और मुद्रास्फीति पर दबाव और बढ़ गया है। अमेरिका की भारी माली मदद के बावजूद पाक अर्थव्यवस्था केवल 3-4 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। अमरीका कट्टरपंथियों के खिलाफ पाक पर ज्यादा शदीद कार्यवाही करने के लिए दबाव डाल रहा है। आत्मघाती हमले रुकने का नाम ही नहीं ले रहे। पंजाब के राज्यपाल तासीर की हत्या से यह बात खुलकर सामने आ गई है कि पाक में धार्मिक आतंकवाद ने जड़ें जमा ली हैं। कट्टरपंथी मांग कर रहे हैं कि तासीर की हत्या का फैसला शरिया कानून और मुसलमानों की भावनाओं के अनुसार होना चाहिए। कहा जा सकता है कि एमक्यूएम के गठबंधन में फिर शामिल होने से सरकार को फिलहाल बेशक जीवनदान मिल गया है, लेकिन सरकार को बचाने या गिराने का काम विपक्षी पार्टियों के हाथ में है। इसलिए उसे देश की जनता की समस्याओं को सुलझाने के लिए सभी पार्टियों को साथ लेकर ठोस कदम उठाने होंगे तभी सरकार अपना बाकी समय पूरा कर पाएगी। भारत एक पड़ोसी होने के नाते चाहता है कि पाकिस्तान में लोकतंत्र कायम रहे, इसी में इस सारे क्षेत्र की भलाई है.
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