लेखक पड़ोसियों और अमेरिका के साथ कटुतापूर्ण संबंधों से चीन के लिए नई चुनौतियां देख रहे हैं...
अपने पड़ोसियों पर गरजते हुए और विवादित भूभाग पर टकराव को तत्पर चीन टाइगर की तरह नजर आता है। संयोग से चीनी ज्योतिष के अनुसार 2010 टाइगर वर्ष रहा। लगातार आक्रामक होता चीन यूरोप और अमेरिका से भी अपने संबंध बिगाड़ रहा है। प्राकृतिक संसाधनों और कृषि भूमि के लिए अफ्रीका में बड़े पैमाने पर निवेश करने से तनाव बढ़ रहा है, जिसे स्थानीय लोग नवऔपनिवेशिक नीति मानते हैं। चीनी ज्योतिष के अनुसार 2011 खरगोश वर्ष है। क्या चीन बिल में रहने वाले इस जीव के साथ होड़ कर रहा है? क्या इसका यह मतलब है कि चीन नदियों का रुख बदलने और अन्य सामरिक परियोजनाओं के लिए हिमालय में सुरंगों का जाल बिछा देगा? और खरगोश की प्रिय गाजर की मांग पड़ोसियों और शेष विश्व से करेगा। अगर चीनी नेतृत्व दूरदर्शी होता तो यह 3 फरवरी से शुरू होने वाले खरगोश वर्ष का सदुपयोग 2010 में की गई कूटनीतिक गलतियों को सुधारने में करता, जिसके कारण उत्तर कोरियो, पाकिस्तान और म्यांमार जैसे विफल राष्ट्रों को छोड़कर वह शेष विश्व से कट सा गया है। अब जिम्मेदार शक्ति बनने और सावधानी से नियम-कायदों में बंधकर सहयोग लेने-देने का पूरा दायित्व उभरते हुए चीन पर है, किंतु सेना की बढ़ती राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और अगले साल नेतृत्व परिवर्तन के मद्देनजर तेज होते सत्ता संघर्ष को देखते हुए चिंता बढ़ जाती है कि यह साल भी 2010 में टाइगर वर्ष की तर्ज पर ही बीतेगा, जब चीन ने देंग जियाओपिंग के इस सिद्धांत पर चलने से इनकार कर दिया था कि अपनी महत्वाकांक्षाओं और पंजों को छिपाकर रखें। टाइगर आसानी से अपने पंजे को छुपा लेता है, लेकिन चीन का ऐसा कोई इरादा नहीं है। वह इन्हें दिखाने में ही गर्व महसूस कर रहा है। कूटनीति से सीमायी दावों तक बहुत से मुद्दों पर चीन 2010 में दबंगई दिखाता रहा है, जिससे इसकी तेजी से बढ़ती शक्ति और बेलगाम महत्वाकांक्षा को लेकर अंतरराष्ट्रीय जगत में चिंताएं बढ़ गई हैं। यहां तक कि घरेलू मोर्चे पर भी चीनी सरकार राष्ट्रीय भावनाओं को भड़काने, मीडिया और इंटरनेट पर अंकुश लगाने और तिब्बत व जिंगजियांग प्रांत में दमन की नीति पर चल रहा है, किंतु अंतरराष्ट्रीय जगत में खतरे की घंटी तब बजी जब पिछले सितंबर को बीजिंग ने जापान की नौका के कप्तान को हिरासत में लेने की अनुचित प्रतिक्रिया दिखाई। चीनी धौंसपट्टी के दबाव में आने के कारण जापानी प्रधानमंत्री नाओतो कान की घर में काफी छीछालेदर हुई, किंतु अपने कप्तान की तुरंत रिहाई करवा पाने में सफलता के बावजूद इसका असली नुकसान तो चीन को ही हुआ है। जापान की विनम्रता से चीन का गुस्सा और भड़क गया और उसने धमकी भरे अंदाज में प्रतिक्रिया जाहिर की। इस प्रक्रिया में खुद को दबंग के रूप में पेश करके चीन ने न केवल अपने अंतरराष्ट्रीय हितों पर कुठाराघात किया, बल्कि हड़बड़ाहट में इसने वे पत्ते भी खोल दिए जो भविष्य में कूटनीतिक और सैन्य संकट के दौरान वह कभी इस्तेमाल करता। गैरमामूली उकसावे पर भी चीन के आर्थिक जंग पर उतारू हो जाने से अन्य प्रमुख राष्ट्र चीन से सावधान हो गए हैं और इससे दूरी बनाए रखने के उपाय तलाशने लगे हैं। वे चीन पर अपनी निर्भरता घटा रहे हैं और चीन के दुर्लभ प्राकृतिक संसाधनों के आयात पर भरोसा नहीं कर रहे हैं। चीन को एक और नुकसान यह हुआ है कि बहुत से मुद्दों पर अनुचित लाभ उठाने के मामले में अब उस पर नियमों के अनुसार चलने का अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ गया है। इन मुद्दों में सबसे महत्वपूर्ण है अंतरराष्ट्रीय व्यापार में लाभ हासिल करने के लिए अपनी मुद्रा का जानबूझकर अवमूल्यन करना और विदेशी ठेके लेने के लिए अपनी फर्मो को अनुदान देना। चीन की कथनी और करनी में अंतर भी साफ दिखाई पड़ रहा है। उदाहरण के लिए चीन ने कई सप्ताह तक जापान को दुर्लभ प्राकृतिक संसाधनों की आपूर्ति रोके रखी, जबकि सार्वजनिक रूप से कहता रहा कि उसने निर्यात पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया है। इसी प्रकार पिछले साल भी दो मामलों में चीन साफ मुकर गया। एक तो पाक अधिकृत कश्मीर में चीनी सैनिकों की तैनाती पर और दूसरे गरीब और कमजोर राष्ट्रों में जारी अपनी परियोजनाओं में कैदियों को कामगारों के रूप में नियुक्त करने पर। सच को छिपाने वाला चीन का रवैया समस्याएं पैदा कर रहा है। सुधार के बजाय इस साल चीन की अंतरराष्ट्रीय छवि और गर्त में ही जाएगी। चीन में विभिन्न स्तरों पर पदों के लिए अनेक राजनेताओं में होड़ मची है। कम्युनिस्ट पार्टी में पद पाने के लिए जबरदस्त कशमकश जारी है। वरिष्ठ नेता राष्ट्रीय भावनाओं का ज्वार पैदा कर पद पक्का करने की जुगत में लगे हैं। साथ ही सत्ता और व्यवस्था कायम रखने के लिए कम्युनिस्ट पार्टी की सेना पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। वरिष्ठ सैन्य अधिकारी विदेश नीति को सीधे-सीधे प्रभावित कर रहे हैं। कभी पार्टी के अधीन रहने वाली सेना के बजट में 1990 के बाद तेजी से वृद्धि हुई है। साथ ही इसे विश्व के सबसे बड़े संगठन कम्युनिस्ट पार्टी की कीमत पर अधिकाधिक स्वायत्तता और अधिकार भी मिले हैं। माओ त्सेतुंग और देंग जैसे कद्दावर नेताओं के अभाव में पार्टी में शीर्ष नेतृत्व के फैसलों को सिरमाथे पर रखने की परंपरा खत्म हो रही है। वास्तव में, कूटनीतिक और अंतरदेशीय मामलों में सेना ने पार्टी को बेदखल करना शुरू कर दिया है। इसके पीछे सीधा-सीधा तथ्य यह है कि विश्व की सबसे बड़ी एकदलीय शासन प्रणाली सीमित लोगों के अधिपत्य के शिकंजे में फंस रही है, जो सत्ता पर पकड़ बनाए रखने के लिए राष्ट्रवाद फैला रहा है। असलियत यह है कि चीन ने पूंजीवाद को जितना अधिक गले लगाया है, विचारधारा के स्तर पर उतना ही संकीर्ण हुआ है। पश्चिम से आयातित मार्क्सवादी सिद्धांतों से पीठ फेरने के बाद देश के सत्तारूढ़ कुलीनों ने चीन में राष्ट्रवाद को राजनीतिक वैधता का केंद्र बना दिया है। हू जिंताओ के मनगढ़ंत उत्तराधिकारी-जी जिनपिंग समेत नेताओं की नई फसल घोर राष्ट्रवादी खांचे में ढली है। इससे संकेत मिलता है कि 2011 में चीन के अपने पड़ोसी देशों-अमेरिका और यूरोप के साथ संबंध बनाने के स्तर पर नई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। चीनी ज्योतिष कैलेंडर के अनुसार 2012 ड्रैगन वर्ष है। इस साल भारत पर चीनी हमले के पचास वर्ष पूरे हो जाएंगे। यह साल विशेष रूप से एशिया के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत के खिलाफ युद्ध का घोषित मंतव्य था-पड़ोसी को सबक सिखाना। इसका दोहराव 1979 में वियतनाम पर हमले के रूप में हुआ था। हाल ही में नौका टकराव मामले में एक बार फिर चीन ने जापान को सबक सिखाया है। (लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)
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