हिंसा और धार्मिक कठमुल्लेपन के लिए कुख्यात अफगानिस्तान इन दिनों एक अन्य कारण से चर्चा में है। वहां की पहाड़ी वादियों में जमीन के नीचे अकूत प्राकृतिक खनिज संपदा का भंडार है। सदियों से अनछुए पड़े इन खनिज संपदा में लोहा, तांबा, सोना, कोबाल्ट और लीथियम प्रमुख हैं। वहां सीसा, पारा, अबरख, जस्ता, गंधक, क्रोमाइट, मैग्नेसाइट, पोटाश, ग्रेनाइट, एस्बेस्टस, बॉक्साइट, बेरीलियम, संगमरमर और हीरे-जवाहरात भी प्रचुर मात्रा में मौजूद हैं। अमेरिका इन खनिज संपदाओं की कीमत एक ट्रिलियन डॉलर आंक रहा है।
अफगान सरकार अमेरिका और सहयोगी देशों के निर्देशन में इन खनिजों के दोहन के लिए विश्व भर से प्रस्ताव मंगा रही है। उसका कहना है कि इसके उचित दोहन से देश के बुनियादी व्यय का 50 प्रतिशत पूरा किया जा सकेगा।
भारत के औद्योगिक जगत में भी इसके लिए सुगबुगाहट देखी जा रही है। सरकारी प्रतिष्ठान सेल चार बड़ी निजी इस्पात कंपनियों के साथ मिलकर पड़ोसी देश का यह खनिज भंडार हासिल करने के लिए दांव लगाने की तैयारी कर रहा है। विगत नवंबर में हमारे खनन मंत्री ने काबुल का दौरा भी किया था और अब विदेश और खनन मंत्रालय ने भारतीय प्रतिष्ठानों को टेंडर जमा करने की अनुमति भी दे दी है।
अफगान सरकार को भरोसा है कि सबकुछ ठीक रहा, तो 2014 तक हाजीगाक में इस्पात संयंत्र काम करना शुरू कर देगा और 10 हजार नौकरियों का सृजन होगा।
चौंकाने वाली बात यह है कि पेंटागन द्वारा अफगानी खनिज संपदा की जानकारी दुनिया को देने और राष्ट्रपति ओबामा द्वारा अफगानिस्तान में युद्ध करने की घोषणा लगभग साथ-साथ हुई है। लिहाजा ऐसा लगता ही है कि अमेरिकी प्रशासन अफगानिस्तान में हिंसा को रोकने के लिए ज्यादा सैनिक भेजने की नीति को जायज ठहराने के जरिये वहां की खनिज संपदा पर अधिकार जताने की नीति पर चल रहा है, जैसा कि उसने इराक में किया था। ब्रिटिश सरकार का दावा है कि अफगानी खनिज संपदा उसके वैज्ञानिकों के सौ वर्षों से ज्यादा के परिश्रम के कारण सामने आई है, जबकि अमेरिका अपने सैनिक अभियानों के दौरान खुफिया वैज्ञानिक खोजबीन का दम भर रहा है और इसका श्रेय ले रहा है।
सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध दस्तावेज बताते हैं कि बीती सदी के पचास के दशक से लेकर 1985 तक अमेरिकी भूगर्भवेत्ताओं ने इन खनिज संपदा का अध्ययन किया था। साठ और सत्तर के दशक में सोवियत वैज्ञानिकों ने इन क्षेत्रों के व्यापक सर्वेक्षण किए और महत्वपूर्ण नक्शे बनाए थे।
हालांकि इन खनिज संपदा के दोहन के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रस्ताव आमंत्रित किए जा रहे हैं, पर ऐसा चक्रव्यूह रचा जा रहा है कि उन्हीं प्रतिष्ठानों को खनन का ठेका मिले, जिसे अमेरिकी शासन चाहे। हाजीगाक में लोहे के भारी भंडार मिलने के बाद से पश्चिमी देशों के साथ-साथ चीन की महत्वाकाक्षाएं भी जग गई हैं। ऐसे ब्योरे हैं कि अफगानिस्तान के पूर्व खान मंत्री को अमेरिका के इस आरोप के बाद हटाया गया कि उसने चीन से बड़ी रिश्वत लेकर उसके खनन प्रतिष्ठानों को आगे बढ़ाने की योजना बनाई थी। यही कारण है कि बार-बार खनन प्रस्तावों को खारिज किया जा रहा है।
खनिज पदार्थों पर कब्जे की यह लड़ाई नई नहीं है। प्रथम व द्वितीय विश्व युद्ध क्रमश: जर्मनी और जापान की औद्योगिक जरूरतें पूरी करने के लिए प्राकृतिक संसाधनों पर बलपूर्वक अधिकार जतलाने की जिद के कारण ही हुए। बाद के वर्षों में अफ्रीका और अमेरिका के देशों में चलने वाले दीर्घकालिक संघर्ष और गृह युद्धों में भी खनिज संपदा पर अधिकार की कोशिशों की बड़ी भूमिका रही। कांगो का लंबा गृह युद्ध प्रकारांतर से खनिज युद्ध का ही उदाहरण है। प्रचुर खनिज संपदा वाले गरीब देशों में चलने वाले गृह युद्ध अन्य संघर्षों की तुलना में लंबे चलते हैं। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट बताती है कि पिछले साठ वर्षों में चालीस फीसदी गृह युद्ध प्राकृतिक संसाधनों के लिए लड़े गए हैं।
पड़ोसी होने के नाते भारत को संघर्ष की आशंकाओं को कूटनीतिक स्तर पर सुलझाने की कोशिश तो करनी ही चाहिए, अपने खनिज संसाधनों के बेहतर उपयोग और प्रबंधन की भी सजग पहल करनी चाहिए। ऐसा न हो कि झारखंड और छत्तीसगढ़ में बिखरी हमारी खनिज संपदा भी भविष्य में सामाजिक संघर्षों को जन्म देने लगे।
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