Sunday, January 23, 2011

वाघा सीमा के पार लोकतंत्र


जब-जब पाकिस्तान पर गृहयुद्ध की भयावह बिजली गिरती है, तब-तब उसकी क्षणिक कौंध वाघा सीमा पार का डरावना भूगोल उजागर करती है। एक तरफ वहां पश्चिम एशिया की इसलामी दुनिया की ओर खुलने वाले उजाड़ बर्फीले दर्रों के बीच अमेरिकी ड्रोन हवाई जहाजों को चरका देकर पाक आतंकवाद को अफगानिस्तान की आदिम तोरा-बोरा गुफाओं तक ले जा रहे गुरिल्ला दस्ते हैं। दूसरी तरफ पाकिस्तान के यूरोप, अमेरिका या दुबई में छुट्टियां मनाने वाले भ्रष्ट नेताओं और उनके अनिवासी परिवारों की हृदयहीन सामंती और निठल्ली जीवन शैली जनता में फनफनाता गुस्सा पैदा कर रही है। तीसरी तरफ बंदूकधारी तालिबानी जत्थे हैं, जो मदरसों से कट्टरपंथी वहाबी इसलाम की दीक्षा लेकर पूरी दुनिया के काफिरों के खिलाफ जेहादी नारे लगा रहे हैं। सबने मिलकर निरंतर बाढ़, सुखाड़ और निरक्षरता से असहाय हुई अवाम के जीवन को ऐसा मध्ययुगीन बीहड़ बना डाला है, जिसमें सही तालीम के स्रोत बचे हैं, ही उदार विचार।
इतिहास का सामान्य नियम है कि राज-समाज में जब आत्मघाती कूढमग्जी हद से बढ़ जाए, तो पढ़े-लिखे युवा प्रतिगामिता को एक खमठोंक सामयिक चुनौती देकर नई रोशनी लाते हैं। लेकिन पाकिस्तान में इसका उलट हो रहा है। पुरानी पीढ़ी अब भी अन्य धर्मों और लोकतंत्रिक विचारों को लेकर कुछ उदारवादी है, पर नई पीढ़ी, जो जियाउल हक के शासन तले जनमी और संस्कारित हुई है, सऊदी रियालों के साथ आए कट्टरपंथी वहाबी इसलाम में डूबी हुई है। वह दूसरे धर्मों के अनुयाइयों ही नहीं, शियाओं और अहमदियों को भी काफिर, पश्चिमपरस्त और देश के शासकों को इसलाम का दुश्मन मानकर मिटाने पर तुली है। देश के सुविधाभोगी और भ्रष्ट इलीट से बेतरह खफा अनपढ़ अवाम कट्टरपंथियों का पक्ष ले रही है। पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर का वध उनके युवा अंगरक्षक ने इस आधार पर किया कि तासीर लगातार ईश निंदा पर मृत्युदंड दिलाने वाले और विधर्मियों तथा औरतों को समान अधिकार देने वाले अमानवीय और अलोकतांत्रिक शरिया कानून में सुधार की वकालत कर रहे थे। तासीर के युवा हत्यारे जैसों की राय में तासीर से लेकर सलमान रुश्दी तक तमाम उदारवाद के पक्षधर मुसलमान वध के योग्य हैं। कट्टरपंथियों के असर और भय से लाहौर के इमामों ने मृतक को दफनाने से इनकार कर दिया और जनता ने हत्यारे को फूल की पंखुड़ियों से नवाजा।
आज नेट और सोशल नेटवर्किंग साइट्स की मदद से दुनिया भर में किए जा रहे कट्टरपंथी इसलाम के प्रचार से विदेशों में बसे कई पाकिस्तानी मूल के परिवारों के युवा भी प्रभावित हो रहे हैं और अपनी उदारवादी तालीम और लोकतांत्रिक परिवेश को नकार कर दुनिया भर में काफिरों के खिलाफ हिंसा को जायज मानकर आतंकी दस्तों के साथ लामबंद हैं। गौरतलब है कि खुद तासीर उस मायने में उदारवादी नहीं थे, जिस मायने में उनके पूर्ववर्ती नेता सीमांत गांधी खान अब्दुल गफ्फार खान थे या उनके समवर्ती रुश्दी और तसलीमा नसरीन हैं। अपना सियासी करियर बनाने और इसलाम परस्त मतदाताओं को रिझाने के लिए दो दशक पहले जिस तासीर ने अपनी सिख पत्नी और बेटे को त्याग दिया था और जो कश्मीर मसले पर भारत को लगातार कोसते रहे, उन्हें धर्मविरोधी मान कर की गई हत्या में एक तरह की काव्यात्मक विडंबना है, जो दिखाती है कि हर तरह की कट्टरपंथिता के शेर की सवारी गांठना घातक है।
जो लोग कट्टरपंथी पाकिस्तान के लिए जिन्ना और मुसलिम लीग को जिम्मेदार ठहराते हैं, वे भूल जाते हैं कि इसके लिए सबसे अधिक जिम्मेदार एशिया के बीच कई सदियों से पलता एक अखिल एशियाई इसलामी साम्राज्य का सपना है, जो आज फिर सिर उठा रहा है। वर्ष 1934 में जब ऑक्सफोर्ड के एक युवा छात्र रहमत अली ने पाकिस्तान का नाम ईजाद किया, तो उसकी कल्पना थी कि इस इसलामी देश के नक्शे में पंजाब, सिंध के अलावा अफगानिस्तान, ईरान और तुर्किस्तान भी शामिल हों। जिन्ना भी चाहते थे कि भारत के जिन-जिन इलाकों में मुसलिम अधिक हैं, जैसे कि हैदराबाद और जूनागढ़, वे भी दुनिया के पहले इसलामी गणतंत्र का हिस्सा बनें। जैसा कि मौलाना आजाद ने तभी कह दिया था, धर्माधारित लोकतंत्र बनाने का यह सपना पानी में खिंची लकीर साबित हुआ। 1947 के बाद पाक ने जहां सेक्यूलर भारत से दुश्मनी गाढ़ी की, वहीं अपनी लोकतांत्रिक इसलामी पहचान बढ़ाने को अरब, ईरान या उत्तर अफ्रीका के इसलाम बहुल अमीर देशों से सघन रिश्ते बनाए (और भारी मात्रा में फायदे बटोरे) पर उसने यह नहीं देखा कि इन देशों में समृद्धि राजकाज में जनता की लोकतांत्रिक भागीदारी से नहीं आई, बल्कि तेल के कुदरती संसाधन से घर बैठे मिलने वाली रॉयल्टी की बदौलत उपजी है। मध्य एशिया में सत्ता की बागडोर लगभग हर जगह अंगरेजों के बनाए-बढ़ाए सीमित कबीलाई तंत्र के ही हाथों में है, जो सर्वधर्मसमभाव से कतई फिरंट है। ऐसे दोस्तों की संगत में पाकिस्तान की जो संस्कृति आधी सदी में लगातार विकसित हुई है, उसके कारण आनेवाले दिनों में तालिबानी दस्तों की नफरत की यह आग अब सिर्फ कश्मीर या फलस्तीन के मुद्दों के हल से नहीं मिटाई जा सकेगी। मृत गवर्नर के दफन पर व्यक्त हर्ष, और उसके हत्यारे की निंशुल्क वकालत को दो सौ से ज्यादा वकीलों का तुरंत आगे जाना वर्तमान पाकिस्तान में लोकतंत्र और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की सीमित उदारवादी इस्लामिक राजनीति की अलोकप्रियता और विफलता ही नहीं साबित करता।
वह यह भी दिखाता है कि इस समय कोई बेनजीर या तासीर या शेरी रहमान उदारवादी लोकतंत्र के पक्षधर और प्रवक्ता बनकर सामने जाएं, तो भी आम पाकिस्तानी उनको बाहरिया, अंगरेजपरस्त और धर्म विमुख मानकर उन पर हमले उचित मानेगा। इसलिए जब दुबई तथा यूरोप में पली-बढ़ी भुट्टो खानदान की अगली पीढ़ी से कोई फातिमा भुट्टो या बिलाल जरदारी ऐसी अनुदारता के खिलाफ जिहाद की घोषणा करें, तो उनकी सफलता की संभावना को लेकर उत्साह नहीं जागता, उनकी जान को लेकर ही चिंता होती है। पाक की तकलीफों का हल या तो उसकी जमीन से ही निकलेगा या फिर उसका अस्तित्व ही मिट जाएगा, जो रक्तबीज की संतानों की तरह भारत के लिए कई नये सिरदर्द पैदा करेगा।


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