नया दशक, नई भूमिकाएं। दुनिया के मंच पर 2011 के साथ शुरू हुआ 21वीं सदी का दूसरा दशक भारत की भूमिका का वर्जन 2.0 लेकर आया है। उभरती ताकत के तौर पर भारत जहां करीब दो दशक बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में है, वहीं दुनिया की दूसरी सबसे तेज रफ्तार अर्थव्यवस्था वाले इस मुल्क की आवाज पर अब हर कोई कान देता है। दरअसल, दुनिया की उभरती नई तस्वीर में भारत संतुलन की एक जरूरत है। लिहाजा, अब हर किसी को उसकी दोस्ती की दरकार है। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत ने जिम्मेदारी भले ही अस्थायी सदस्य के तौर पर संभाली हो। लेकिन उसके फैसलों पर अमेरिका, रूस, ब्रिटेन समेत वीटो अधिकार रखने वाले उसके सभी दोस्तों की नजर होगी। आर्थिक मंदी की मार से दुनिया को निकालने की कवायद में भी नई दिल्ली की अहमियत कम नहीं है। जी-20 और आसियान जैसे बड़े आर्थिक मंचों पर भारत की भूमिका लगातार बढ़ रही है। इस मोर्चे पर भारत की अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बीते दिनों सिओल के जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान दुनिया में वित्तीय सुधारों की रफ्तार पर निगरानी का जिम्मा जिन दो देशों पर डाला गया उनमें भारत भी है। इसके अलावा नए साल के साथ ही भारत संयुक्त राष्ट्र के 22 अरब डॉलर (985 अरब रुपये) से अधिक के बजट का प्रबंधन करने वाली कार्यकारी समिति का भी अगले तीन साल के लिए सदस्य बन गया है। उल्लेखनीय है कि इसके लिए पिछले दिनों हुए चुनाव में रिकॉर्ड जीत दर्ज की थी। इस दौड़ में भारत को 570 में से 164 मत हासिल हुए थे। हालांकि नई जिम्मेदारियों को संभालने के लिए भारत को अपने कंधों की मजबूती भी साबित करनी होगी। भारतीय थिंक टैंक इंडियन इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस के विशेषज्ञ सुजीत दत्ता का मानना है कि नई भूमिका के साथ ही भारत को बताना होगा कि ऊंची मेज पर वो अपने साथ क्या नए आइडिया लेकर आया है? विश्व अर्थव्यवस्था को संभालने से लेकर जलवायु परिवर्तन तक हर मुद्दे पर उसे यह साबित करना होगा कि दुनिया को देने के लिए उसके पास विचार भी हैं, साधन भी और संकल्प भी। दक्षिण एशिया में यूं तो भारत सबसे बड़ी ताकत है, लेकिन जुलाई, 2011 से अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजों के कटौती कार्यक्रम की शुरुआत के बाद जाहिर तौर पर नजर भारत की भूमिका पर होगी। अफगान लोगों में भारत की साख और युद्ध से टूटे इस मुल्क को खड़ा करने में भारतीय मदद के मद्देनजर यह अपेक्षा और भी बढ़ जाती है। हालांकि पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल नई जिम्मेदारियों के बावजूद 2011 से बहुत अधिक उम्मीदों को खारिज करते हैं। उनके अनुसार दुनिया में भारत के बढ़ते रसूख के बावजूद चीन के साथ सीमा-विवाद, कश्मीर मसले के समाधान और आतंकवाद के मामले में पाकिस्तान की नकेल कसने के मोर्चे पर किसी बड़े नतीजे की उम्मीद बेमानी है। विशेषज्ञों की नजर में दुनिया में अपनी आवाज की धमक बढ़ाने के लिए यह भी जरूरी है कि भारत अपने घर को दुरुस्त करे। सिब्बल कहते हैं कि एक मजबूत कूटनीति के लिए जरूरी है कि घरेलू मोर्चे पर व्यवस्था चाक-चौबंद हो। लिहाजा, 2011 और उसके आगे भी भारत के सामने इस बात की चुनौती बरकरार है कि किसी भी बाहरी दखल को रोकने के लिए वो अपने घर की दीवार मजबूत रखे।
No comments:
Post a Comment