हाल ही संपन्न चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ की अमेरिकी राजकीय दौरे पर सारे संसार की नजर टिकी हुई थी। इसका मुख्य कारण यह था कि गत एक वर्ष में अमेरिका और चीन के संबंधों में बहुत कटुता आई है। सच यह है कि आज भी दोनों देशों के बीच एक तरह से अलिखित शीतयुद्ध चल रहा है और इसके लिए दोनों देश एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते हुए तनाव के कारण ऐसा लग रहा था कि चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओ का राजकीय दौरा शायद और भी कटुताओं से भर जाएगा और दोनों देशों के नेता खुलकर एक दूसरे की आलोचना करेंगे। परंतु लगता ऐसा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने व्यावहारिक रुख अपनाया और चीनी राष्ट्रपति हू के साथ गरम और नरम दोनों तरह की बातें की। इसके पहले चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओ छह वर्ष पहले अमेरिका गए थे। उस समय दोनों देशों में इतनी कटुता नहीं थी। परंतु पिछले कुछ महीनों से दोनों देशों के बीच राजनीतिक और आर्थिक मामलों को लेकर तनाव बढ़ता जा रहा है। अमेरिका का कहना है कि उत्तर कोरिया पूर्वी एशिया में गैर जिम्मेदाराना हरकत कर रहा है और उसे केवल चीन ही रोक सकता है, क्योंकि उत्तर कोरिया इतना अधिक गरीब देश है कि उसकी जनता को खाने के लाले पड़े हुए हैं तथा खाद्यान्न और अन्य आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति के लिए वह पूरी तरह चीन पर आश्रित है। अमेरिका की शिकायत है कि चीन ने उत्तर कोरिया की गैर जिम्मेदाराना हरकतों को रोकने का कोई प्रयास नहीं किया। इसमें कोई संदेह नहीं कि उत्तर कोरिया ने कई परमाणु हथियार बना लिए हैं और आधुनिकतम मिसाइलों को बनाकर वह पड़ोसी देशों को तंग कर रहा है। हाल में उत्तर कोरिया ने दक्षिण कोरिया के कुछ द्वीपों पर तोपों से हमला कर दिया था। जैसे ही अमेरिका को इसकी खबर लगी, अमेरिका ने दक्षिण कोरिया के समर्थन में अपने लड़ाकू युद्धपोत वहां तैनात कर दिए। चीन की शिकायत थी कि अमेरिका के युद्धपोत भेजने से उस क्षेत्र में तनाव बहुत अधिक बढ़ गया है। चीन का कहना है कि अमेरिका ने पिछले कुछ वर्षो से एशिया के अपने मित्र देशों, खासकर जापान, दक्षिण कोरिया और ताइवान को उनकी तकदीर पर छोड़ दिया था, परंतु अचानक वर्ष 2010 में अमेरिका फिर से एशियाई देशों के मामले में टांग अड़ाने लगा है। अमेरिका का कहना है कि वह एशिया, खासकर पूर्वी एशिया के मित्र देशों की रक्षा के लिए आगे आया, क्योंकि चीन ने उन्हें आंख दिखाना शुरू कर दिया था। दक्षिण कोरिया और जापान को पूर्वी चीन सागर और दक्षिणी चीन सागर में वह तंग कर रहा था। अमेरिका का कहना है कि उत्तर कोरिया का रवैया अत्यंत ही शत्रुतापूर्ण है। वह उन पड़ोसी देशों पर जो अमेरिका के मित्र हैं, कब आक्रमण कर बैठे कहना कठिन है। उसने अपने परमाणु कार्यक्रम को बंद नहीं किया है। उत्तर कोरिया ने हाल में यह घोषणा की है कि यूरेनियम को परिस्कृत करने के लिए उसने नए प्लांट लगाए हैं। इस खबर से अमेरिका का चिंतित होना स्वाभाविक था। पहली बार चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ ने कहा कि उत्तर कोरिया का ऐसा करना निश्चित रूप से गैर जिम्मेदाराना है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि उत्तर कोरिया के नेता कब क्या कर बैठेंगे कहना कठिन है और चीन का उन पर कोई नियंत्रण नहीं है। उचित यह होता कि उत्तर कोरिया को आर्थिक मदद दी जाती और उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया के नेता किसी तीसरे देश में बैठकर अपनी समस्याओं को सुलझाते। इस पर राष्ट्रपति ओबामा ने कोई प्रतिक्रिया जाहिर नहीं की, क्योंकि पहले भी वह कह चुके हैं कि उत्तर कोरिया के नेता पूरी तरह धूर्त हैं। वे आर्थिक सहायता ले भी लेंगे और उसे जनकल्याण पर खर्च करने के बजाय परमाणु हथियार और मिसाइलों के उत्पादन में लगा देंगे।। अत: उत्तर कोरिया के मामले में राष्ट्रपति हू और ओबामा के बीच कोई ठोस सहमति नहीं हो पाई। चीन का यह इतिहास रहा है कि उसके नेता कहते कुछ और हैं और करते कुछ और। हू जिंताओ ने अपने अमेरिकी दौरे के दौरान कहा कि चीन अमेरिका को अपना प्रतिद्वंद्वी नहीं मानता है। दोनों मिलजुलकर इस तरह आपस में सहयोग कर सकते हैं जिससे दोनों देशों का आर्थिक विकास हो। चीन अमेरिका की मजबूरी को बहुत अच्छी तरह समझता है। राष्ट्रपति हू ने अमेरिका की इस कमजोरी का पूरा लाभ उठाने का प्रयास किया।। अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है अमेरिका में बढ़ती हुई बेरोजगारी पर नियंत्रण पाना। इसलिए उन्होंने थोड़ा नरम होकर चीन के साथ व्यापारिक समझौतों को प्राथमिकता दी। इस समझौतों के कारण राष्ट्रपति हू ने अपने देश में अमेरिका से अनेक ऐसी औद्योगिक वस्तुओं के आयात का आर्डर दिया जिसके कारण अमेरिका के 2 लाख 35 हजार लोगों को नौकरी मिलेगी। इसमें चीनी कंपनियां अमेरिका से 200 बोइंग हवाई जहाज भी खरीदेंगी जिसका मूल्य 19 अरब डॉलर है। चीनी राष्ट्रपति हू ने अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा को भरोसा दिलाया है कि चीन यह पूरा प्रयास करेगा कि अमेरिका से अधिक से अधिक औद्योगिक सामान खरीदे जाएं और सेवा के क्षेत्र में उसके अनुभव का लाभ उठाया जाए। हालांकि दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंध तब तक सामान्य नहीं हो सकते हैं जब तक चीन अपनी मुद्रा यूआन का अवमूल्यन बंद नहीं करता। अमेरिका पिछले कई वर्षो से कहता आ रहा है कि चीन ने जानबूझकर अपनी मुद्रा यूआन का अवमूल्यन इसलिए कर दिया है कि चीनी वस्तुएं अत्यधिक सस्ती होकर अमेरिकी बाजारों में बिकें। इससे अमेरिका में चीनी वस्तुओं का आयात बहुत अधिक बढ़ गया है और निर्यात बहुत कम रह गया है। राष्ट्रपति हू ने कहा कि वह अमेरिकी तर्क से पूरी तरह सहमत नहीं हैं। फिर भी चीन अपनी मुद्रा के मूल्यों को धीरे-धीरे ठीक करेगा। अमेरिका और चीन में पिछले कई वषरें से मानवाधिकारों के हनन के मुद्दे को लेकर तनाव रहा है। ओबामा ने हू जिंताओ से कहा कि चीन में जिस तरह मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन हो रहा है और वहां आम जनता की आजादी जिस तरह छीनी जा रही है उस पर चीन की सरकार को अविलंब ध्यान देना चाहिए। ओबामा ने यह भी कहा कि चीन के नोबेल पुरस्कार विजेता लिउ श्याओबे को जिस तरह कैद कर रखा गया है और जिस प्रकार उन्हें अमानवीय यातनाएं दी जा रही हैं उसे अविलंब समाप्त किया जाना चाहिए। लिउ श्याओबो को अविलंब रिहा करने का मसला भी अमेरिका ने चीनी राष्ट्रपति के समक्ष उठाया। राष्ट्रपति हू का कहना था कि अमेरिका और चीन की राजनीतिक पृष्ठभूमि अलग-अलग है। यह सही है कि जिस तरह मानवाधिकारों की स्वतंत्रता अमेरिका में है वैसी चीन में नहीं है और चीन को उस स्थिति में पहुंचने में अभी कई वर्ष लगेंगे। परंतु उन्होंने एक बात बहुत दृढ़तापूर्वक कही कि चीन अपने आंतरिक मामलों में कोई विदेशी हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करेगा। राष्ट्रपति ओबामा ने हू जिंताओ से यह भी कहा कि चीन को दलाई लामा के प्रतिनिधियों से बात करनी चाहिए जिससे तिब्बत में आम जनता के मानवाधिकार बहाल हों और नागरिकों की धार्मिक आजादी प्रतिबंधित न हो। हू ने ओबामा के इस आग्रह पर कोई ध्यान नहीं दिया। पिछले कुछ अरसे से चीन यह कहता आ रहा है कि जब अमेरिका को मालूम है कि दलाई लामा उसका कट्टर शत्रु है तब दलाई लामा को अमेरिका में इतना सम्मान देना एक तरह से चीन को मुंह चिढ़ाने के समान है। अमेरिका का कहना है कि एक लोकतांत्रिक देश होने के कारण वह संसार के किसी भी धर्मगुरु को सम्मान देने के लिए स्वतंत्र है और इस मामले में चीन का विरोध उचित नहीं है। हाल तक जापान अमेरिका के बाद आर्थिक दृष्टिकोण से संसार का सबसे संपन्न देश था। अब उसकी जगह चीन ने ले ली है। हू जिंताओं ने दृढ़ रवैया अपनाकर अमेरिका को यह बताने का प्रयास किया है कि चीन संसार के किसी देश के सामने नहीं झुकेगा। ओबामा ने यह सोचकर संतोष किया कि आर्थिक मामले में चीन ने अमेरिका से भरपूर आयात करने का फैसला किया है जिससे ढाई लाख लोगों को रोजगार मिलेगा। कुल मिलाकर हू जिंताओ के दौर से अमेरिका को कोई खास लाभ नहीं हुआ है। (लेखक पूर्व सांसद व राजनयिक हैं)
Saturday, January 29, 2011
हू जिंताओ की अमेरिकी यात्रा के निहितार्थ
हाल ही संपन्न चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ की अमेरिकी राजकीय दौरे पर सारे संसार की नजर टिकी हुई थी। इसका मुख्य कारण यह था कि गत एक वर्ष में अमेरिका और चीन के संबंधों में बहुत कटुता आई है। सच यह है कि आज भी दोनों देशों के बीच एक तरह से अलिखित शीतयुद्ध चल रहा है और इसके लिए दोनों देश एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते हुए तनाव के कारण ऐसा लग रहा था कि चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओ का राजकीय दौरा शायद और भी कटुताओं से भर जाएगा और दोनों देशों के नेता खुलकर एक दूसरे की आलोचना करेंगे। परंतु लगता ऐसा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने व्यावहारिक रुख अपनाया और चीनी राष्ट्रपति हू के साथ गरम और नरम दोनों तरह की बातें की। इसके पहले चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओ छह वर्ष पहले अमेरिका गए थे। उस समय दोनों देशों में इतनी कटुता नहीं थी। परंतु पिछले कुछ महीनों से दोनों देशों के बीच राजनीतिक और आर्थिक मामलों को लेकर तनाव बढ़ता जा रहा है। अमेरिका का कहना है कि उत्तर कोरिया पूर्वी एशिया में गैर जिम्मेदाराना हरकत कर रहा है और उसे केवल चीन ही रोक सकता है, क्योंकि उत्तर कोरिया इतना अधिक गरीब देश है कि उसकी जनता को खाने के लाले पड़े हुए हैं तथा खाद्यान्न और अन्य आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति के लिए वह पूरी तरह चीन पर आश्रित है। अमेरिका की शिकायत है कि चीन ने उत्तर कोरिया की गैर जिम्मेदाराना हरकतों को रोकने का कोई प्रयास नहीं किया। इसमें कोई संदेह नहीं कि उत्तर कोरिया ने कई परमाणु हथियार बना लिए हैं और आधुनिकतम मिसाइलों को बनाकर वह पड़ोसी देशों को तंग कर रहा है। हाल में उत्तर कोरिया ने दक्षिण कोरिया के कुछ द्वीपों पर तोपों से हमला कर दिया था। जैसे ही अमेरिका को इसकी खबर लगी, अमेरिका ने दक्षिण कोरिया के समर्थन में अपने लड़ाकू युद्धपोत वहां तैनात कर दिए। चीन की शिकायत थी कि अमेरिका के युद्धपोत भेजने से उस क्षेत्र में तनाव बहुत अधिक बढ़ गया है। चीन का कहना है कि अमेरिका ने पिछले कुछ वर्षो से एशिया के अपने मित्र देशों, खासकर जापान, दक्षिण कोरिया और ताइवान को उनकी तकदीर पर छोड़ दिया था, परंतु अचानक वर्ष 2010 में अमेरिका फिर से एशियाई देशों के मामले में टांग अड़ाने लगा है। अमेरिका का कहना है कि वह एशिया, खासकर पूर्वी एशिया के मित्र देशों की रक्षा के लिए आगे आया, क्योंकि चीन ने उन्हें आंख दिखाना शुरू कर दिया था। दक्षिण कोरिया और जापान को पूर्वी चीन सागर और दक्षिणी चीन सागर में वह तंग कर रहा था। अमेरिका का कहना है कि उत्तर कोरिया का रवैया अत्यंत ही शत्रुतापूर्ण है। वह उन पड़ोसी देशों पर जो अमेरिका के मित्र हैं, कब आक्रमण कर बैठे कहना कठिन है। उसने अपने परमाणु कार्यक्रम को बंद नहीं किया है। उत्तर कोरिया ने हाल में यह घोषणा की है कि यूरेनियम को परिस्कृत करने के लिए उसने नए प्लांट लगाए हैं। इस खबर से अमेरिका का चिंतित होना स्वाभाविक था। पहली बार चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ ने कहा कि उत्तर कोरिया का ऐसा करना निश्चित रूप से गैर जिम्मेदाराना है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि उत्तर कोरिया के नेता कब क्या कर बैठेंगे कहना कठिन है और चीन का उन पर कोई नियंत्रण नहीं है। उचित यह होता कि उत्तर कोरिया को आर्थिक मदद दी जाती और उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया के नेता किसी तीसरे देश में बैठकर अपनी समस्याओं को सुलझाते। इस पर राष्ट्रपति ओबामा ने कोई प्रतिक्रिया जाहिर नहीं की, क्योंकि पहले भी वह कह चुके हैं कि उत्तर कोरिया के नेता पूरी तरह धूर्त हैं। वे आर्थिक सहायता ले भी लेंगे और उसे जनकल्याण पर खर्च करने के बजाय परमाणु हथियार और मिसाइलों के उत्पादन में लगा देंगे।। अत: उत्तर कोरिया के मामले में राष्ट्रपति हू और ओबामा के बीच कोई ठोस सहमति नहीं हो पाई। चीन का यह इतिहास रहा है कि उसके नेता कहते कुछ और हैं और करते कुछ और। हू जिंताओ ने अपने अमेरिकी दौरे के दौरान कहा कि चीन अमेरिका को अपना प्रतिद्वंद्वी नहीं मानता है। दोनों मिलजुलकर इस तरह आपस में सहयोग कर सकते हैं जिससे दोनों देशों का आर्थिक विकास हो। चीन अमेरिका की मजबूरी को बहुत अच्छी तरह समझता है। राष्ट्रपति हू ने अमेरिका की इस कमजोरी का पूरा लाभ उठाने का प्रयास किया।। अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है अमेरिका में बढ़ती हुई बेरोजगारी पर नियंत्रण पाना। इसलिए उन्होंने थोड़ा नरम होकर चीन के साथ व्यापारिक समझौतों को प्राथमिकता दी। इस समझौतों के कारण राष्ट्रपति हू ने अपने देश में अमेरिका से अनेक ऐसी औद्योगिक वस्तुओं के आयात का आर्डर दिया जिसके कारण अमेरिका के 2 लाख 35 हजार लोगों को नौकरी मिलेगी। इसमें चीनी कंपनियां अमेरिका से 200 बोइंग हवाई जहाज भी खरीदेंगी जिसका मूल्य 19 अरब डॉलर है। चीनी राष्ट्रपति हू ने अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा को भरोसा दिलाया है कि चीन यह पूरा प्रयास करेगा कि अमेरिका से अधिक से अधिक औद्योगिक सामान खरीदे जाएं और सेवा के क्षेत्र में उसके अनुभव का लाभ उठाया जाए। हालांकि दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंध तब तक सामान्य नहीं हो सकते हैं जब तक चीन अपनी मुद्रा यूआन का अवमूल्यन बंद नहीं करता। अमेरिका पिछले कई वर्षो से कहता आ रहा है कि चीन ने जानबूझकर अपनी मुद्रा यूआन का अवमूल्यन इसलिए कर दिया है कि चीनी वस्तुएं अत्यधिक सस्ती होकर अमेरिकी बाजारों में बिकें। इससे अमेरिका में चीनी वस्तुओं का आयात बहुत अधिक बढ़ गया है और निर्यात बहुत कम रह गया है। राष्ट्रपति हू ने कहा कि वह अमेरिकी तर्क से पूरी तरह सहमत नहीं हैं। फिर भी चीन अपनी मुद्रा के मूल्यों को धीरे-धीरे ठीक करेगा। अमेरिका और चीन में पिछले कई वषरें से मानवाधिकारों के हनन के मुद्दे को लेकर तनाव रहा है। ओबामा ने हू जिंताओ से कहा कि चीन में जिस तरह मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन हो रहा है और वहां आम जनता की आजादी जिस तरह छीनी जा रही है उस पर चीन की सरकार को अविलंब ध्यान देना चाहिए। ओबामा ने यह भी कहा कि चीन के नोबेल पुरस्कार विजेता लिउ श्याओबे को जिस तरह कैद कर रखा गया है और जिस प्रकार उन्हें अमानवीय यातनाएं दी जा रही हैं उसे अविलंब समाप्त किया जाना चाहिए। लिउ श्याओबो को अविलंब रिहा करने का मसला भी अमेरिका ने चीनी राष्ट्रपति के समक्ष उठाया। राष्ट्रपति हू का कहना था कि अमेरिका और चीन की राजनीतिक पृष्ठभूमि अलग-अलग है। यह सही है कि जिस तरह मानवाधिकारों की स्वतंत्रता अमेरिका में है वैसी चीन में नहीं है और चीन को उस स्थिति में पहुंचने में अभी कई वर्ष लगेंगे। परंतु उन्होंने एक बात बहुत दृढ़तापूर्वक कही कि चीन अपने आंतरिक मामलों में कोई विदेशी हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करेगा। राष्ट्रपति ओबामा ने हू जिंताओ से यह भी कहा कि चीन को दलाई लामा के प्रतिनिधियों से बात करनी चाहिए जिससे तिब्बत में आम जनता के मानवाधिकार बहाल हों और नागरिकों की धार्मिक आजादी प्रतिबंधित न हो। हू ने ओबामा के इस आग्रह पर कोई ध्यान नहीं दिया। पिछले कुछ अरसे से चीन यह कहता आ रहा है कि जब अमेरिका को मालूम है कि दलाई लामा उसका कट्टर शत्रु है तब दलाई लामा को अमेरिका में इतना सम्मान देना एक तरह से चीन को मुंह चिढ़ाने के समान है। अमेरिका का कहना है कि एक लोकतांत्रिक देश होने के कारण वह संसार के किसी भी धर्मगुरु को सम्मान देने के लिए स्वतंत्र है और इस मामले में चीन का विरोध उचित नहीं है। हाल तक जापान अमेरिका के बाद आर्थिक दृष्टिकोण से संसार का सबसे संपन्न देश था। अब उसकी जगह चीन ने ले ली है। हू जिंताओं ने दृढ़ रवैया अपनाकर अमेरिका को यह बताने का प्रयास किया है कि चीन संसार के किसी देश के सामने नहीं झुकेगा। ओबामा ने यह सोचकर संतोष किया कि आर्थिक मामले में चीन ने अमेरिका से भरपूर आयात करने का फैसला किया है जिससे ढाई लाख लोगों को रोजगार मिलेगा। कुल मिलाकर हू जिंताओ के दौर से अमेरिका को कोई खास लाभ नहीं हुआ है। (लेखक पूर्व सांसद व राजनयिक हैं)
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