टूनीशिया में हुई ‘जास्मिन क्रांति’ का असर पूरे अरब जगत में दिखाई देने लगा है।
लगता है टूनिशिया में हुई ‘जास्मिन क्रांति’ की सुगंध पूरे अरब जगत में फैलने लगी है और वहां कई पीढ़ियों और दशकों से शासन पर कुंडली मारकर बैठे लोग घबरा गए हैं। एक ओर नोबल शांति पुरस्कार पाने वाले अल बरदेई वियना से अपने मुल्क मिस्र में जुमे को होनेवाले विशाल प्रदर्शनों का नेतृत्व करने पहुंचे हैं, तो बहरीन के शासक हमद बिन इसा अल खलीफा, जो मिस्र के राष्ट्रपति होस्नी मुबारक के समर्थन में डटे हुए हैं, ने अरब शासकों की शिखर बैठक कुचलने की पहल की है। टूनिशिया की अंतरिम सरकार में पूर्व शासक अल अबेदीन बेन अली के समर्थकों को घुसने न देने के साथ ही वहां बदलाव का पहला चरण पूरा हो गया है, तो मिस्र में भी 30 साल से शासन पर कब्जा करके बैठे होस्नी मुबारक के खिलाफ लगभग हर जगह प्रदर्शन हो रहे हैं। पर अब मामला यमन की तरफ बढ़ता दिखता है, जहां भी अली अब्दुल्ला सालेह 30 वर्षों से सत्ता पर काबिज हैं और मुबारक की तरह अपने बेटे को उत्तराधिकारी बनाने का प्रयास कर रहे हैं। साना विश्वविद्यालय के छात्रों की अगुवाई में शुरू हुए आंदोलन के बाद सालेह ने पहला काम फौज की तनख्वाह बढ़ाने का किया। दरिद्रता और धर्मांधता का सागर बना यह मुल्क भी बदलाव के लिए बेचैन दिख रहा है। छात्रों ने सबसिडी में कटौती के सवाल पर आंदोलन शुरू किया, जो अब विशाल रूप ले चुका है। पड़ोस के अल्जीरिया में भी धर्मांधता और दरिद्रता का ऐसा ही आलम है और वहां भी पिछले दिनों खाद्यान की लूट के समय जनमानस की बेचैनी साफ दिखाई दी। सूडान में छात्रों का आंदोलन भले तत्काल दबा दिया गया हो, पर वह इतने से रुक जाएगा कहना कठिन है। जार्डन में भी प्रधानमंत्री विरोधी आंदोलन जोर पकड़ रहा है, तो ओमान में महंगाई का विरोध सरकार विरोध में बदलता दिखता है। सऊदी अरब तक ऐसी सुगबुगाहट से नहीं बचा है। इन चीजों को एक बड़े आंदोलन का रूप लेने और टूनीशिया जैसे बदलाव तक आने में अभी काफी कुछ घटना है। बदलाव अनिवार्यत: होगा, यह कहना भी जल्दबाजी होगी। सारी दुनिया में लोकतंत्र का परचम फहराने के बावजूद बराबरी और भाईचारे का मूल पाठ पढ़ाने वाले इसलाम के असली प्रभाव वाले इलाकों में राजशाही, तानाशाही और गैरबराबरी आज तक बची हुई है, तो इसके भी कारण हैं। समृद्ध प्राकृतिक संपदा और मेहनती-जांबाज लोगों के बावजूद यह इलाका लोकतांत्रिक चेतना के अभाव के कारण अज्ञान, धर्मांधता, दकियानूसी और गैरबराबरी का गढ़ बना हुआ था। आज यह चेतना अगर हिलोरें लेने लगी है और इसके आगे ईरान, पाकिस्तान, अफगानिस्तान में स्थापित सत्ताएं हथियार डाल चुकी हैं, तो इसे अब रोकना अरब तानाशाहों और शाहों के लिए आसान नहीं होगा।