Tuesday, March 29, 2011

नई सोच की जरूरत


भारत-पाक वार्ता पर लेखक की टिप्पणी
भारत और पाकिस्तान के गृह सचिवों की दो दिवसीय बातचीत 28 मार्च को शुरू हुई। यह लगभग एक साल बाद होने वाली पहली आधिकारिक मुलाकात है। महत्वपूर्ण बात यह है कि थिंपू वार्ता के बाद दोनों पक्ष सभी महत्वपूर्ण लंबित मामलों पर चर्चा करने को राजी हो गए हैं। पाकिस्तान के गृह सचिव चौधरी कमर जमां छह सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे हैं। भारत के गृह सचिव गोपाल कृष्ण पिल्ले और उनके पाकिस्तानी सहयोगी चौधरी कमर जमां के बीच होने वाली इस भेंट के दौरान कई मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है। भारत ने हमेशा माना है कि आपसी मसलों का समाधान बातचीत से ही संभव है। नई दिल्ली को उम्मीद है कि स्थायी संबंधों के लिए वह इस्लामाबाद के साथ मतभेदों को पाट सकेगा। इसमें कोई शक नहीं कि नकारात्मक सोच वाले पाकिस्तानी नेताओं से निपटना हमेशा ही दिक्क्त भरा रहा है। आर्मी और आइएसआइ के अपने अलग एजेंडे हैं। परवेज मुशर्रफ एक वृहद अफ-पाक प्रभाव क्षेत्र कायम करने का अपना सपना पाले हुए हैं और इस क्षेत्र में वह भारत को दरकिनार करना चाहते हैं। इसे किसी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। बातचीत का आगे का रास्ता बड़ा ही ऊबड़-खाबड़ है। समस्या यह नहीं है कि गुलाबों के साथ कांटे भी हैं, बल्कि समस्या तो गुलाबों के रूप में केवल कांटों के पेश किए जाने की है। ऐसे में हमारे सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान अपने पुराने कल के खेल को तो नहीं दोहराएगा? इस सवाल का सीधा और ईमानदारी भरा जवाब तो नहीं है, लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि इस बारे में पाकिस्तान का रिकार्ड बहुत ही खराब रहा है। हमने आगरा तथा दूसरे ऐतिहासिक मौकों पर ताकतवर आर्मी चीफ जनरल परवेज मुशर्रफ का व्यवहार देखा ही है। मौजूदा गतिरोध को दूर करने के शार्टकट तलाशने की उम्मीद तो बेकार है। इन सालों में हम यही तो करते आए हैं। हम घूमफिर कर वापस पहले की स्थिति पर आते रहे हैं। इसी वजह से पाकिस्तान की शह पर चल रहे आतंकवाद का सवाल तकनीकी या कानूनी बहानों में उलझ कर रह गया है। पाकिस्तान की शह पर मुंबई में 26 नवंबर, 2008 को हुए खूनी आतंकवादी खेल खेलने वाले उग्रवादियों के बारे में इस्लामाबाद के रुख पर ही गौर करें। इस मुद्दे पर पाकिस्तानी नेताओं के साथ की गई कोशिशें अत्यंत ही निराशाजनक साबित हुई हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सामने चुनौती यह है कि वह पाकिस्तान से निपटने के पेचीदा काम को कैसे अंजाम दें। प्रधानमंत्री कभी-कभी इसे जितना आसान समझ लेते हैं, उतना आसान यह काम है नहीं। मैं समझता हूं कि भारत को बहुआयामी अल्पावधि तथा दीर्घावधि रणनीतियां बनानी चाहिए ताकि पाकिस्तान के नागरिक तथा सैन्य नेताओं को शांति तथा विकास के सही मार्ग पर प्रेरित किया जा सके। सबसे पहले नई दिल्ली को पाकिस्तान की सैन्य सोच का अंदाजा लगाना होगा, क्योंकि पाकिस्तान की नीतियों और रणनीतियों की कुंजी, खास कर भारत, अफगानिस्तान और सुरक्षा तथा आतंकवाद के मुद्दों के बारे में जनरलों और आइएसआइ के हाथों में है। क्या नई दिल्ली इस दुष्चक्र को भेद सकती है? जब तक हम सीधे आइएसआइ और सैन्य प्रतिष्ठान से बातचीत नहीं करेंगे, यह काम मुश्किल ही रहेगा। अब जब वार्ता प्रक्रिया शुरू हो गई है, मैं समझता हूं कि भारतीय नीति निर्माताओं को पाकिस्तान की बौखलाहट से निपटने के लिए बिल्कुल नई सोच अपनानी होगी। आशा है कि इस्लामाबाद के नेता, नई दिल्ली के साथ वार्ता की अपनी नई पारी, खुले दिमाग से शुरू करेंगे और आर्मी तथा आईएसआई में मौजूद शरारती तत्वों को पाकिस्तान की भारत मैत्री ऐक्सप्रेस को पटरी नहीं उतारने देंगे। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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