Saturday, March 26, 2011

फुकुशिमा के सबक


तत्काल ज़रूरत तो न्यूक्लियर एनर्जी विस्तार की ओर दौड़ पड़ने के लिए भारत के अधपकी योजनाओं की समीक्षा करने तक भारत के न्यूक्लियर कार्यक्रम का एक स्वतंत्र, विश्वसनीय आडिट करने की है जिसमें परमाणु ऊर्जा विभाग के बाहर के लोग भाग लें। शुरुआत रिएक्टर के निर्माण पर तत्काल रोक लगा कर की जानी चाहिए, जिसमें अरेवा के यूरोपीयन प्रेशराइज्ड रिएक्टर जैसा वह मॉडल भी आता है जिसका अभी तक परीक्षण नहीं हुआ है और भारत जिसको महाराष्ट्र के जैतापुर में लगाने की योजना बना रहा है
पहले दिन यानी 12 मार्च को उन्होंने सबसे पहले तो इसे छोटी-मोटी दुर्घटना कह कर टाल दिया, जिस पर जापान का अत्यंत उन्नत न्यूक्लियर उद्योग जल्द काबू पा लेगा। दूसरे दिन, जब फुकुशिमा दाइची न्यूक्लियर संयंत्र में, जिसमें ठंडा करने वाला पानी (कूलेंट) नहीं रहा था, विस्फोट हुआ तो उन्होंने कहा कि यह पूरी तरह से एक रसायनिक प्रक्रिया है, न कि न्यूक्लियर आपदा जैसा कि मीडिया के कुछ हिस्सों में कहा गया है। इनमें से एक ने तो यह तक कहा, जापान में कोई न्यूक्लियर दुर्घटना या घटना नहीं है। यह एक सुनियोजित आपातकालीन तैयारी कार्यक्रम है जिसे न्यूक्लियर संचालक कम्पनी संयंत्र के अपने आप बंद हो जाने के बाद बची हुई गर्मी को बटोरने के लिए चला रही है। तीसरे दिन, जब जापान का न्यूक्लियर संकट बेहद बिगड़ गया, उन्होंने दावा किया कि जिस चीज को सारी दुनिया हर पल बुरी तरह से आतंकित होकर देख रही थी, वह संकट शीघ्र ही खत्म हो जाएगा। ये महानुभाव हमारे न्यूक्लियर ऊर्जा सम्राट हैं, जिन्होंने अपने आपको आश्वस्त कर लिया है कि वे सर्वज्ञ और अमोघ हैं। जिस व्यक्ति को ऊपर उद्धृत किया गया है वह परमाणु ऊर्जा विभाग के सचिव और परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष श्रीकुमार बनर्जी हैं। दूसरे सज्जन भारत में 20 रिएक्टरों को चलाने वाले न्यूक्लियर पावर कारपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआईएल) के प्रमुख एस के जैन हैं। परमाणु ऊर्जा विभाग के मुखियाओं के वक्तव्य केवल यह प्रदर्शित करते हैं कि वे कितने कटे हुए हैं यथार्थ से और किस तरह से उनकी जड़ सोच उनको तब भी ठोस तथ्यों को स्वीकार करने से रोकती है। जब वे कूलेंट के खत्म होने की दुर्घटना ( एलओसीए ) के चलते फुकुशिमा रिएक्टरों के अति गर्म होने के कारण विस्फोट का रूप ले लेते हैं और वायुमंडल में भारी मात्रा में विषाक्त रेडियोधर्मिता छोड़ देते हैं।
चेरनोबिल से भी बड़ा संकट
फुकुशिमा रिएक्टर अब भयानक तबाही के कगार पर हैं जिसका विस्तार 1979 में अमेरिका में हुए थ्री माइल आईलैंड विध्वंस से कहीं-कहीं अधिक है। वे इतनी विशाल मात्रा में विकिरण कर रहे हैं कि सैकड़ों नहीं बल्कि हज़ारों की संख्या में लोग मर सकते हैं और इसकी तुलना 25 साल पहले यूक्रेन में हुए चेरनोबिल न्यूक्लियर विघटन से ही की जा सकती है। चेरनोबिल से वैश्विक न्यूक्लियर उद्योग पूरी तरह से कभी भी उबर नहीं पाया। यह बुरा संयोग और भयंकर विडम्बना है कि अगला संकट चेरनोबिल के 25वां साल पूरे होने के (25 अप्रैल ) के इतना निकट आया है। कुछ मायनों में यह संकट चेरनोबिल में पैदा हुए संकट से अधिक गम्भीर है। यूक्रेन के हादसे का दोष डिज़ाइन में कमी और औद्योगिक तौर पर पिछड़े समाज में घटिया संचालन के मत्थे मढ़ा जा सकता है। फुकुशिमा के बारे में यह नहीं कहा जा सकता है। जापान 55 रिएक्टर चलाता है जिनसे वहां की बिजली का एक तिहाई पैदा होता है और इस मामले में दुनिया में इसका स्थान तीसरा है।
अमेरिकी कम्पनी की थी डिजाइन
न्यूक्लियर रिएक्टर के सुरक्षा मानकों के स्तर के मामले में जापान को दुनिया के न्यूक्लियर उद्योग में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। परंतु जापान का न्यूक्लियर विद्युत उत्पादन कार्यक्रम गड़बड़ियों से भरा रहा हेै जैसे कि विस्फोट, भूकम्पजनित टूट-फूट,फास्ट-ब्रीडरों में खराबी और छोटे स्तर पर विकिरण होना। लेकिन जापान में न्यूक्लियर दुर्घटना ने कभी भी तबाही के आयाम ग्रहण नहीं किए थे। अब यह उस न्यूक्लियर पावर स्टेशन में हुआ है जिसके छह रिएक्टरों की डिज़ाइन अमेरिकी कम्पनी जनरल इलेक्ट्रिक ने की है और जिसका संचालन विकसित देशों की एक सबसे बड़ी न्यूक्लियर पावर कम्पनी, टोक्यो इलेक्ट्रिक पावर कम्पनी (टीईपीसीओ) द्वारा किया जा रहा है। जब किसी उद्योग के विश्व नेता का विघटन होता है, सम्पूर्ण वैश्विक उद्योग र्थरा जाता है।
तबाही के संदर्भ : संकट के प्रभाव
फुकुशिमा तबाही के संदर्भ को समझने के लिए पहले के संकटों के प्रभावों को याद करना ज़रूरी है। 1979 के थ्री माइल आईलैंड ने 104 पावर रिएक्टर के साथ दुनिया के सबसे बड़े अमेरिकी न्यूक्लियर उद्योग को लुंज-पुंज कर दिया था। यह पहले से ही परेशानी में था कि 1973 के बाद इसके पास नए रिएक्टर का एक भी आर्डर नहीं था। थ्री माइल आईलैंड के बाद सुरक्षा नियमों को और कड़ा किया गया तथा रिएक्टरों की, पहले से भी ज्यादा कीमत को और बढ़ा दिया गया, और इसलिए न्यूक्लियर पावर की कीमत भी बढ़ गई। तब से वॉलस्ट्रीट ने न्यूक्लियर उद्योग पर पूरी रोक लगा रखी है। 10 साल पहले कर्ज के लिए उदार गारंटियों और दूसरी आर्थिक सहायताओं का प्रस्ताव करके राष्ट्रपति बुश ने अमेरिका में न्यूक्लियर नवजागरण लाने की कोशिश की थी परंतु सब बेकार। अमेरिका में एक भी नए रिएक्टर को लाइसेंस नहीं दिया गया है।
यूरोप में एक भी नया रिएक्टर नहीं
इसके बाद आया चेरनोबिल जिसने यूरोप के न्यूक्लियर उद्योग पर घातक हमला किया। न्यूक्लियर ऊर्जा उत्पादन पर बाजार का पहले से ही कमजोर विश्वास पूरी तरह से ढह गया। पिछले 25 सालों के दौरान यूरोप में एक भी नया न्यूक्लियर रिएक्टर नहीं बनाया गया है। सरकारों को भी आखिरकार न्यूक्लियर ऊर्जा के विरुद्ध जनता के विरोध का और राजकोष पर बढ़ती हुई अपेक्षाओं का ध्यान रखना पड़ता है। यूरोपीय उद्योग ज्यादा से ज्यादा थोड़ी सी न्यूक्लियर परियोजनाओं के साथ गुजारा कर रहा है। फ्रांस के अरेवा द्वारा विकसित और फिनलैंड में बन रहे यूरोपीयन प्रेशराइज्ड रियेक्टर ( ईपीआर) की अगुआई में वे अब सब के सब मुसीबत हैं। लागत में 90 फीसद की बढ़ोतरी के साथ ईपीआर अपने नियत समय से 42 माह पीछे चल रहा है और इसके सामने फिनलैंड, इंग्लैंड, अमेरिका और फ्रांस तक से उठाए गए 3000 से अधिक सुरक्षा सम्बन्धी सवाल खड़े हैं। ऊंची और बढ़ती हुई लागतों के चलते यदि परियोजना को छोड़ दिया जाता है तो फिनलैंड के प्रत्येक नागरिक पर लगभग 5000 रुपए का बोझ पड़ेगा। तीखी मुकदमेबाजी के बीच इससे यूरोप में न्यूक्लियर ऊर्जा विस्तार के अंत की घंटी बज सकती है।
परमाणु ऊर्जा उद्योग पर संकट
जापानी दुर्घटना इतनी शक्तिशाली और दूरगामी है कि यह वैश्विक न्यूक्लियर उद्योग के लिए खत्म होने का संकट पैदा कर सकती है। स्विट्ज़रलैंड ने तीन रिएक्टर बनाने की अपनी योजना को पहले ही रद्द कर दिया है। और जर्मनी ने न्यूक्लियर ऊर्जा उत्पादन को लम्बे अरसे बाद समाप्त करने के अपने निर्णय को रद्द कर दिया है। दूसरे देश भी ऐसा ही कर सकते हैं। फ्रांस तक ने जो अपनी बिजली का 3/4 से अधिक हिस्सा न्यूक्लियर रिएक्टरों से प्राप्त करता है, फुकुशिमा संकट को विनाशकारी स्तर तक उठा दिया है। फुकुशिमा संकट पैदा कैसे हुआ? भूकम्प ने 3 रिएक्टरों को बंद कर दिया। इससे रिएक्टरों के गर्म-केंद्रक को ठंडा करने वाली बिजली बंद हो गई। जैसे कि बनाए गए थे सहायक डीज़ल जेनरेटर चल निकले, परंतु न मालूम वजहों से, एक घंटे बाद वे भी बंद हो गए। सैकड़ों टन ईंधन से भरा केंद्रक (कोर) और भी गर्म होने लगा। पानी प्रवाहित होना जैसे ही बंद हुआ 3 और 1 रिएक्टरों के आधे केंद्रक और रिएक्टर 2 के सभी केंद्रक खुल गए। तीनों रिएक्टरों पर एलओसीए की मार पड़ी जिससे केंद्रक के आंशिक या पूर्ण रूप से पिघलने की आशंका पैदा हो गई। शीघ्र ही विकिरण की अनिश्चित मात्रा मुक्त हो गई। दाइची के विकिरण का पता 100 किलामीटर दूर उड़ रहे एक हेलीकॉप्टर से लगा। इसमें विशेष महत्त्व आइयोडीन-131(जो थायोराइड में जमा होकर कैंसर पैदा करती है) और केसियम-137 (जो पोटेशियम जैसी है और मानव उत्तकों द्वारा आसानी से चूस ली जाती है) का है।
भारत के लिए अनेक पाठ
यह संकट भारत को अनेक सबक सिखाता है जो न्यूक्लियर विद्युत विस्तार के विशाल कार्यक्रम की ओर बढ़ रहा है जिससे भारत की न्यूक्लियर विद्युत उत्पादन क्षमता दोगुनी और फिर तीन गुनी हो जाएगी। पहला सबक तो यह है कि न्यूक्लियर बिजली उत्पादन जन्मजात रूप से जोखिम से भरा है। ऊर्जा उत्पादन का यही एक वह रूप है जो लम्बे समय तक के लिए सेहत को नुकसान पहुंचाने और वायुमंडल को विषाक्त करने वाली विनाशकारी दुर्घटनाओं को जन्म दे सकता है। मानवीय चूक या प्राकृतिक आपदा से विनाश की शुरुआत केवल इसलिए हो सकती हेै क्योंकि ये रिएक्टर अपने आप में असुरक्षित हैं। रिएक्टर उच्च दाब, उच्च तापमान पण्रालियां हैं जिनमें उच्च ऊर्जा विखंडन अनवरत प्रक्रिया नियंत्रित भर होती है। न्यूक्लियर रिएक्टर पण्राली के तौर पर जटिल और अंदर से मज़बूती से आपस में जुड़े होते हैं। किसी एक भी पण्राली में कोई गलती अथवा खराबी तुरंत ही दूसरी में प्रवेश कर जाती है और इतनी बढ़ जाती हे कि पूरी पण्राली ही संकट की स्थिति में आ जाती है। दूसरे, न्यूक्लियर विद्युत में तथाकथित न्यूक्लियर ईंधन चक्र की सभी अवस्थाओं में-यूरेनियम खनन और ईंधन से रिएक्टर संचलन और देखरेख, आम उत्सर्जनों और निशेष-ईंधन से निपटने, उसके भंडारण और पुन: प्रसंस्करण तक-विकिरण का खतरा बना रहता हैं। न्यूक्लियर रिएक्टर अपने पीछे उच्चस्तरीय रेडियोधर्मी कचरा छोड़ते चलते हैं जो हज़ारों साल तक खतरनाक बना रहता है। विखंडन से पैदा प्लूटोनियम-239 का आधा जीवन 24,400 साल है। विज्ञान को अभी तक यह नहीं पता चला है कि न्यूक्लियर कचरे का लम्बे समय तक सुरक्षित भंडारण किस प्रकार किया जाए, उसको निष्प्रभावी या नष्ट करने की तो बात ही दूर है। तीसरे, भारत में ऐसा कोई स्वतंत्र संगठन नहीं है जो सुरक्षा मानक विकसित कर सके और सुरक्षा के लिए रिएक्टरों को विनियमित कर सके। अपने बजट, संयंत्रों और कर्मियों के लिए परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड पर निर्भर है और परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष को रिपोर्ट करता है, जो परमाणु ऊर्जा विभाग का सचिव भी है। तारापुर रिएक्टरों के लगाए जाने के बाद से चार दशकों से एनईडी छोटे-मोटे बदलावों के साथ अमेरिकी और कनाडियाई डिज़ाइनों को ही सिर्फ लगाता या उनकी नकल करता आ रहा है।
परमाणु ऊर्जा विभाग अक्खड़पन छोड़े
एनईडी से यह नहीं हो सकता कि अक्खड़ दृष्टिकोण को छुड़ाना और भारत के न्यूक्लियर सुरक्षा रिकार्ड में भीतर घुस कर 1993 में नरोरा रिएक्टर में आग, काइगा कंटेनमेंट डैम का ढहना अनेक स्थलों पर अक्सर ही अति विकिरण के मामले, हैवी वाटर की असुरक्षित ढंग से ढुलाई और जादूगुडा की यूरेनियम खदानों तथा राजस्थान रिएक्टरों के पास के इलाकों में स्वास्थ्य पर खतरनाक असर जैसी शर्मनाक विफलताओं पर अपने गिरहबान में झांक कर देखना चाहिए। तत्काल ज़रूरत तो न्यूक्लियर विस्तार की ओर दौड़ पड़ने के लिए भारत के अधपकी योजनाओं की समीक्षा करने तक भारत के न्यूक्लियर कार्यक्रम का एक स्वतंत्र, विश्वसनीय आडिट करने की है जिसमें एनईडी के बाहर के लोग भाग लें। शुरुआत रिएक्टर के निर्माण पर तत्काल रोक लगा कर की जानी चाहिए, जिसमें अरेपा के यूरोपीयन प्रेशराइज्ड रिएक्टर जैसा वह मॉडल भी आता है जिसका अभी तक परीक्षण नहीं हुआ है और भारत जिसको महाराष्ट्र के जैतापुर में लगाने की योजना बना रहा है।


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