भूकंप और सुनामी के बाद खड़ा हुआ जापान का परमाणु संकट हाथ से निकलता प्रतीत हो रहा है। बुधवार को एक स्थिति ऐसी आई जब भूकंप में क्षतिग्रस्त हुए फुकुशिमा के देइची परमाणु संयंत्र में लगातार बढ़ते विकिरण के कारण इसे रोकने के प्रयास में लगे कर्मचारियों को पूरी तरह हटा लिया गया। साथ ही सबसे खतरनाक साबित हो रहे रिएक्टर नंबर तीन की कूलिंग के लिए हेलीकॉप्टर से पानी गिराने की योजना विफल हो गई। इससे पहले तड़के रिएक्टर नंबर चार में आग लग गई थी। जिससे अफरा-तफरी मच गई। सोमवार को इस रिएक्टर में विस्फोट हुआ था। क्योदो समाचार एजेंसी के अनुसार मुख्य कैबिनेट सचिव यूकिओ एदानो ने स्वीकार किया है कि रिएक्टर नंबर तीन काफी क्षतिग्रस्त हो चुका है। विशेषज्ञों का कहना है कि जापान में यह परमाणु विकिरण दुनिया की सबसे घातक औद्योगिक दुर्घटनाओं में से है। अमेरिका के मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के डॉ. थॉमस नैफ के अनुसार, यह धीमी गति से बढ़ता हुआ दुस्वप्न है। परमाणु उद्योग में 39 वर्ष से कार्य करने और देइची जैसे संयंत्रों के डिजायन बनाने वाले एर्नी गंडेरसन के अनुसार 50 या 100 लोग परमाण संयंत्र में पैदा हुए खतरे से नहीं निपट सकते। उन्होंने कहा, कंपनी ने अपने 700 कर्मचारियों को वहां से निकाल लिया है, इसका मतलब है कि वे हार रहे हैं। संयंत्र का काम देखने वाली टोक्यो इलेक्टि्रक पावर कंपनी ने कहा है कि उसने रिएक्टरों की कूलिंग के लिए कर्मचारियों की संख्या बुधवार को 50 से बढ़ा कर सौ कर दी है। उसने कहा कि विकिरण के खतरे के कारण कूलिंग के प्रयास नियमित नहीं है। विकिरण का स्तर बढ़ने पर कर्मचारियों को बाहर निकलने को कहा जाता है। कंपनी के प्रवक्ता ने माना कि सुबह विकिरण के खतरनाक स्तर तक पहुंचने के बाद करीब एक घंटे तक संयंत्र में कोई भी कर्मचारी नहीं था। दूसरी ओर जापान पुलिस को भी संयंत्र के बाहर नियुक्त करने पर विचार चल रहा है, जिससे वह पानी की बौछार कर कूलिंग में मदद दे सके। बड़ी दुर्घटना की तमाम आशंकाओं के विपरीत जापान सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों ने दावा किया है कि संयंत्र के 30 किलोमीटर के दायरे बाहर विकिरण का स्तर इतना नहीं है कि स्वास्थ्य को खतरा हो। जापान रेडक्रॉस सोसायटी ने भी टोक्यो को अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों के लिए सुरक्षित बताया है।
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