Tuesday, March 22, 2011

आने वाले तूफान से बेखबर


अफगानिस्तान से अमेरिकी सेनाओं की वापसी निश्चित है। चीन धैर्यवान देश है, वह प्रतीक्षा कर सकता है। इस इंतजार में पाकिस्तान भी उसके साथ है। अमेरिकी वापसी के बाद दक्षिण एशिया में शक्ति का संतुलन हमारे विरुद्ध हो जाएगा। पाकिस्तान पहले से ही इसकी तैयारी कर रहा है। परेशानी यह है कि दिल्ली में बैठे कुछ सामरिक विश्लेषकों को छोड़ दें, तो आने वाले हालात की चिंता किसी को नहीं है। बहुत से लोग मान बैठे हैं कि सन 62 बहुत दूर की बात हो गई है। अब चीन हमला नहीं कर पाएगा। जहां तक पाकिस्तान का सवाल है, वह कश्मीर पर कुछ ले-देकर हमारा दोस्त हो जाएगा। 1962 के बाद से चीन की स्थिति काफी मजबूत हो चुकी है। अमेरिका और चीन की सामारिक क्षमताओं में जितना फासला तब था, अब नहीं रहा है। अमेरिका अब चीन को नियंत्रित कर सकने की स्थितियों में नहीं रहा। चीन ने स्पष्ट कर दिया है कि कश्मीर के संबंध में उसकी वीजा नीति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। चीनी प्रधानमंत्री बेन जियाबाओ द्वारा भारत यात्रा में बिखेरी गई मुस्कुराहटों का राजनयिक गलियारों में गलत अर्थ निकाला गया। हम हमेशा से चीन के मंतव्यों को समझने की गलती कर जाते हैं। चीनी नीतियां भावनाओं पर नहीं, बल्कि असलियत की खुरदरी जमीन पर खड़ी होती हैं। अगर हम सोचते हैं कि हमारे ज्यादा झुककर सलाम करने से वह नीतियों में मौलिक परिवर्तन कर देगा तो हम गलती पर हैं। चीन जानता है कि हमारी प्रतिक्रिया की क्या सीमाएं हैं। उसे इस बात का भी अंदाजा है कि हम इस स्टेपल वीजा के विरोध में अपने बाजार चीनी सामानों के लिए बंद करने से रहे। उसे हमारी राजनीति की आंतरिक कमजोरियां, हमारी मजबूरियां मालूम हैं। वह अच्छी तरह समझता है कि हम किसी भी बिंदु को सम्मान का मुद्दा क्यों नहीं बना पाते। वह मुंबई आतंकी हमले के परिणामस्वरूप पाकिस्तान के सामने हमारी मजबूरियां और बेचारगी देख रहा है। हमारे बड़े भूभाग पर चीन का कब्जा है। हमने इस कब्जे को बरदाश्त करना, इसके साथ रहना सीख लिया है। कश्मीर, भारत पाकिस्तान के बीच का विवाद हो सकता है। चीन का इससे कोई वास्ता नहीं, लेकिन स्टेपल वीजा के माध्यम से उसने इस विवाद में अपनी भूमिका तलाश ली है। दुर्भाग्य है कि हम आजादी के बाद से ही अपने सामने आ रही विदेशी चुनौतियों के विरुद्ध मजबूती से कभी खड़े नहीं हो सके। न जाने कौन सी हीनभावना है जो हमारे राष्ट्रीय अचेतन का स्थायी भाव बनी हुई है। कारगिल के पाकिस्तानी दुस्साहस ने सिद्ध किया है कि पाकिस्तान अपने को हमारे सामने कहीं अधिक शक्तिशाली समझने लगा है। वह हमारी प्रतिक्रिया की सीमाएं जानता था इसीलिए बेधड़क कारगिल पर हमला कर सका। वह आतंकवाद प्रायोजित करा रहा है। वहां वह नकली नोट छाप रहा है। हम सिवाय सबूतों के बस्ते भेजने के और कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं हैं। ऐसे मजबूर हालात में कोई भी तूफान हमें ताश के महल के समान उड़ा देगा। अगर हम अपनी गुलामी झेलने के आदी हो चुके है और हममें आजाद और खुदमुख्तार कौमों के तेवर नहीं रह गए हैं, तो हमें कुछ नहीं कहना। आखिर हमारी इन कमजोरियों की वजह क्या है? इस खोजबीन के लिए इतिहास ही हमारी शरणस्थली है। मुगलों के बिखरने के बाद यहां किसी नए साम्राज्य की सूरत नहीं बनी। नेतृत्वहीन देश जैसे संन्यासी भाव अपनाकर सत्ताविरत हो गया। विदेशी शक्तियों के लंबे शासनकाल में राष्ट्र की आंतरिक स्वत:स्फूर्त जीवनीशक्ति का Oास हो गया। इतिहास की इसी वय:संधि पर अंग्रेजों का आगमन होता है। भारतीय समाज अपने सीने पर विदेशी शासकों और स्थानीय राजाओं को निष्पृह भाव से झेलता रहा। राजनीतिक भूमिका विहीन भारतीय समाज संसार के असार होने की भावना के साथ भक्ति भावनाओं की सांस्कृतिक भूमि में तुलसी, सूर के साथ हो लिया। हमारी चतुर्वर्णीय व्यवस्था बदल रही परिस्थितियों में हमारे राजनीतिक भविष्य की सबसे बड़ी बाधा बनी। आजादी के बाद विकास तथा समानता के अधकचरे नारे इस आत्मघाती सामाजिक व्यवस्था को महत्वहीन नहीं कर सके। समझौतापरस्त राजनीति ने इस सामाजिक समस्या के साथ रहना सीख लिया है। समझौतापरस्ती से उपजने वाला जातीय, क्षेत्रीय, भाषायी नेतृत्व अपनी संकीर्ण सोच के कारण इन विदेशी चुनौतियों को लक्षित ही नहीं कर पाता। जो सबसे बुरा है, वह है पराजय स्वीकार का स्थायी भाव। नकली मुखौटे पहन कर हम सत्ता के लिए परमाणु करार के विरोध का स्वांग करते हुए राष्ट्रहित के विरोध में खड़े हो जाते हैं। इस क्षेत्रीय-जातीय विभाजन ने एक अशक्त राजनीति की पटकथा लिख दी है, जिसके परिणाम हमें कश्मीर, 1962 की हार से लेकर कारगिल तक मिले हैं। रूबैया सईद अपहरण से लेकर, कंधार विमान अपहरण, मुंबई आतंकी हमला और हाल ही में मलकागिरि कलेक्टर अपहरण पर राज्य और राजनीति का व्यवहार हमारी पराजित सोच का परिणाम है। (लेखक पूर्व सैन्य अधिकारी हैं)

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