Thursday, March 10, 2011

खतरनाक मोड़ पर लीबिया


लीबिया में गृह युद्ध पर लेखक की टिप्पणी
लीबिया में मानवीय और राजनीतिक संकट पूरी दुनिया को एक खतरनाक मोड़ पर ले जा रहा है। वैश्विक दबावों के बावजूद लीबियाई राष्ट्रपति मुअम्मर गद्दाफी अब और आक्रामक होते जा रहे हैं, जिसे देखते हुए अमेरिका और नाटो देश लीबिया पर हमले का मन बनाने लगे हैं। अगर गद्दाफी गद्दी नहीं छोड़ते हैं और आम नागरिकों पर ऐसे ही हमले जारी रखते हैं तो हो सकता है लीबिया में एक बार फिर अफगानिस्तान और इराक का इतिहास दोहराया जाए। अब तो गद्दाफी और ज्यादा आक्रामक होते जा रहे हैं। तेल की खान कहे जाने वाले बेंगाजी शहर पर तो उन्होंने लड़ाकू विमानों से बम भी बरसाए। गद्दाफी की स्थिति हुस्नी मुबारक या मध्य-पूर्व के अन्य तानाशाहों से भिन्न है। लीबिया में सत्ता संतुलन सेना तय नहीं करती, बल्कि इसकी जगह कई अर्धसैनिक ब्रिगेड्स का नेटवर्क और कर्नल गद्दाफी के समर्थकों की रिवोल्यूशनरी समितियां, कबायली नेता तथा विदेशों से लाए गए भाड़े के सैनिक तय करते हैं। लीबिया में कई विशेष ब्रिगेड्स हैं जिनकी जवाबदेही सेना के प्रति नहीं, बल्कि गद्दाफी की रेवोल्यूशनरी समितियों के प्रति है। सही मायने में लीबियाई सेना तो प्रतीकात्मक ही है। चूंकि कर्नल गद्दाफी तख्तापलट के जरिए सत्ता में आए थे, इसलिए उन्होंने एक ऐसी दीर्घकालिक रणनीतिक व्यवस्था बनाई कि उन्हें सेना की तरफ से कभी भी तख्तापलट का सामना न करना पड़े। गद्दाफी की आक्रामकता के कारण अब यह संभावना प्रबल हो रही है कि नाटो फौजें लीबिया में अफगानिस्तान या इराक जैसी कार्रवाई आरंभ कर देंगी। इस दिशा में पहला कदम होगा लीबिया को नो फ्लाई जोन यानी लीबियाई युद्धक विमानों के उड़ान भरने के लिए निषिद्ध क्षेत्र घोषित करना। आरंभिक इनकार के बाद अब अरब लीग ने भी नो फ्लाई जोन बनाने की स्वीकृति दे दी है। लेकिन अभी कुछ अनुत्तरित प्रश्न हैं, जिनका उत्तर अमेरिका और उनके नाटो सहयोगियों को तलाशना होगा। पहली बात तो यह कि अभी अमेरिका इराक और अफगानिस्तान में उलझा हुआ है और सबसे बड़ी बात यह है कि वहां पर वह अपने उद्देश्यों में पूरी तरह से कामयाब नहीं हो पाया है। दूसरा अहम प्रश्न यह है कि यदि अमेरिका गद्दाफी के विरुद्ध जनता का साथ देता है तो फिर सऊदी अरब जैसे देशों में जनता के भड़कने की स्थिति में वह क्या करेगा? तीसरा प्रश्न यह है कि मध्य-पूर्व में तानाशाहों का जाना क्या अमेरिका के लिए शुभ होगा, खासकर उस स्थिति में जब जनता के बहाने कट्टरपंथी ताकतें सत्ता तक पहुंचने की कोशिश में हों? उधर, संयुक्त राष्ट्र परिषद के सभी 15 सदस्यों ने लीबिया के गद्दाफी प्रशासन पर सर्वसम्मति से कड़े प्रतिबंध लगा दिए हैं और देश में हो रहे खूनखराबे की जांच अंतरराष्ट्रीय युद्ध अपराध के रूप में कराने के आदेश दिए हैं। प्रतिबंधों में 68 वर्षीय गद्दाफी तथा उनके परिवार की संपत्तियां सील करना, लीबियाई नेता और उनके परिवार तथा प्रशासन के अन्य नेताओं की यात्रा पर रोक, शस्त्रों के कारोबार पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना शामिल है। इन प्रतिबंधों के बाद इंटरपोल भी गद्दाफी और उनके परिवार के सदस्यों को लेकर अलर्ट हो गया है। इस बीच लीबिया को संयुक्त राष्ट्र ने आम सहमति से संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद से निलंबित कर दिया है। इस तरह से देखा जाए तो कर्नल गद्दाफी अंतरराष्ट्रीय मंच पर लगातार अलग-थलग पड़ते जा रहे हैं। लेकिन इसके बावजूद उन पर कोई फर्क पड़ता दिखाई नहीं दे रहा है। उधर, चीन ने लीबिया की क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान किए जाने की बात कही है। ईरान ने खुलकर धमकी दी है कि यदि नाटो सेनाओं ने लीबिया पर सैन्य कार्रवाई की तो वहां उसके सैनिकों की कब्रगाह बन जाएगी। क्यूबा, निकारागुआ और वेनेजुएला भी गद्दाफी के साथ नजर आ रहे हैं। देखना यह है कि स्थितियां दुनिया को विश्र्व युद्ध जैसी स्थिति की ओर ले जाती हैं या फिर मानवीय संकट का हल शांतिपूर्ण निकालने में समर्थ होती हैं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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