पिछले दिनों अमेरिका ने संयुक्तराष्ट्र में फिलस्तीन के उस प्रस्ताव पर वीटो कर दिया, जिसमें फिलस्तीनी भू-भाग पर इस्रइली बस्तियों के निर्माण की निंदा की गयी थी। हो सकता है अमेरिका के इस निर्णय में किसी दूरगामी रणनीतिक महत्व की बात छिपी हो लेकिन अमेरिकी प्रशासन इस पर अब तक इस्रइल का जो विरोध कर रहा था, उसका मतलब क्या था। फिलस्तीनी मुक्ति संगठन (पीएलओ) द्वारा समर्थित इस प्रस्ताव को सुरक्षा परिषद में 14 देशों ने समर्थन दिया था लेकिन अमेरिका के वीटो कर देने से इसका अस्तित्व खत्म हो गया। एक रिपोर्ट के मुताबिक इस प्रस्ताव को वीटो करने के लिए वाशिंगटन पर अमेरिकी कांग्रेस और इस्रइल का दबाव था। गौरबलत है कि अमेरिकी कांग्रेस में इस्रइल समर्थक लॉबी का काफी दबदबा है। यही कारण है कि पिछले दिनों ओबामा प्रशासन द्वारा सम्बंधों के खराब होने की धमकी देने के बावजूद इस्रइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने बस्तियों के निर्माण की प्रक्रिया नहीं रोकी। अब अमेरिका बहाना बना रहा है कि इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में लाने से इस्रइल और फिलस्तीनियों के बीच बातचीत बहाली की प्रक्रिया और उलझेगी। पीएलओ का यह प्रस्ताव भले ही अमेरिकी वीटो की भेंट चढ़ गया हो लेकिन इसने यह बता दिया कि इस मुद्दे पर फिलस्तीन का साथ देने वाले अधिक हैं। प्रस्ताव को करीब 130 देशों ने समर्थन दिया है। मध्य-पूर्व की वर्तमान स्थितियों का अमेरिका सहित पूरे पश्चिम को ध्यान रखना चाहिए। अमेरिका जिन देशों या तानाशाहों के जरिए अपने हितों साधता है, उनका पतन शुरू हो चुका है। चूंकि इन देशों की जनता अमेरिका और पश्चिम के प्रति सदभावनापूर्ण नजरिया नहीं रखती इसलिए अमेरिका को इस नये वातावरण को देखते हुए मध्य-पूर्व में अपनी नीतियों को आगे बढ़ाने का कार्य करना चाहिए। दरसअल 1967 में पश्चिमी तट और पूर्वी येरुशलम पर नियंतण्रके बाद से इस्रइल वहां सौ से ज्यादा बस्तियां बना चुका है जिनमें करीब पांच लाख यहूदी रहते हैं। अन्तरराष्ट्रीय कानून की दृष्टि में यह निर्माण अवैध है लेकिन इस्रइल इसे गलत नहीं मानता। उसके गृह मंत्रालय ने मार्च में 1600 औरयहूदी बस्तियों के निर्माण की घोषणा की थी। दरअसल यहूदियों के ओल्ड टेस्टामेंट के आख्यान के अनुसार यह नगर उनके पूर्वज फादर अब्राहम ने देवभूमि के रूप में स्थापित किया था। ईसाई इसे ईसा के क्रास पर लटकाए जाने के कारण पवित्र मानते हैं। यहीं ईस्टर ने पुनर्जीवन पाया था। मुसलमान इसको अपने ‘हरम-उल-हाफिज’ के रूप में स्वीकार करते हैं। उनका कहना है कि पैगम्बर मुहम्मद यहीं से जन्नत गये थे। पश्चिमी येरुशलम एक अत्यंत आधुनिक नगर और इस्रइल की राजधानी है और पूर्वी येरुशलम संयुक्तराष्ट्र के 1948 के बंटवारे के अनुसार फिलस्तीनियों का था, लेकिन इस्रइल ने उस पर कब्जा कर लिया और 1980 में उसने दोनों को एक कर वहां अपना शासन स्थापित कर लिया। फिलस्तीनी पूर्वी येरुशलम वापस मांग रहे हैं लेकिन इस्रइल इसके तैयार नहीं है। पश्चिमी एशिया की गतिविधियों पर ध्यान दें लगता है कि फिलस्तीन और इस्रइल विरोधाभासी अपेक्षाओं से सम्पन्न होकर मध्यस्थों के जरिए निष्कर्ष निकालने का सपना देख रहे हैं या फिर दुनिया को सपना दिखा रहे हैं। इस्रइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की दक्षिण पंथी सरकार, पश्चिमी तट (वेस्ट बैंक) और येरुशलम पर हो रहे निर्माण कार्य को रोके बिना अप्रत्यक्ष वार्ता शुरू करना चाहती है जबकि फिलस्तीन इसे रोकने के बाद। विशेष तथ्य यह भी है कि फिलस्तीन मानता है कि जून 1967 के युद्ध में इस्रइल ने जो भू-भाग हथिया लिया था, वह फिलस्तीनी राज्य का है और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव संख्या 242 के मुताबिक वह इस्रइल के कब्जे वाला राज्य है इसलिए इस्रइल को उसे लौटा देना चाहिए। लेकिन 1967 की सीमाओं पर लौटने का मतलब होगा इस्रइली बस्तियों के बड़े ब्लॉक का फिलस्तीनी राज्य का हिस्सा बन जाना। यह न इस्रइल की सरकार स्वीकार करेगी, न ही वहां की जनता। अब एक ही रास्ता बचता है कि वार्ता जमीन की अदला-बदली को लेकर हो और इस्रइल को अनुमति दे दी जाए कि वह फिलस्तीन के अंदर भी अपनी बस्तियां रख सकता है। इसके साथ ही वेस्ट बैंक-गाजा पट्टी को कॉरिडोर बना दिया जाए। लेकिन यह भी संभव नहीं है क्योंकि फिलस्तीन में हमास और फतह गुट दो अमित्र राष्ट्रों की तरह नजर आ रहे हैं, जब तक ये दोनों एक नहीं हो जाते या फिर दोनों में से एक समाप्त नहीं हो जाता, तब तक फिलस्तीन की वास्तविक राष्ट्रीय आवश्यकता का ही पता नहीं चल पाएगा। हालांकि इस्रइली रक्षा मंत्री एहुद बराक चाहते हैं कि येरुशलम का विभाजन कर पश्चिमी येरुशलम और 12 यहूदी इलाके इस्रइल को दे दिये जाएं जहां उसके दो लाख से ज्यादा लोग रहते हैं और अरब इलाके फिलस्तीन को जहां ढाई लाख फिलस्तीनी रहते हैं। लेकिन बेंजामिन नेतान्याहू को यह मंजूर नहीं। फिलहाल जब अमेरिका ने उसका खुला समर्थन कर दिया है, तो फिलस्तीन के लिए यह दूर की कौड़ी हो गया है। लेकिन मध्य-पूर्व धीरे-धीरे अशांति की ओर बढ़ रहा है और अमेरिका और उसके सहयोगियों को इस आहट को महसूस करते हुए कदम आगे बढ़ाने चाहिए।
Friday, March 4, 2011
मध्यपूर्व पर अमेरिका की अवसरवादिता
पिछले दिनों अमेरिका ने संयुक्तराष्ट्र में फिलस्तीन के उस प्रस्ताव पर वीटो कर दिया, जिसमें फिलस्तीनी भू-भाग पर इस्रइली बस्तियों के निर्माण की निंदा की गयी थी। हो सकता है अमेरिका के इस निर्णय में किसी दूरगामी रणनीतिक महत्व की बात छिपी हो लेकिन अमेरिकी प्रशासन इस पर अब तक इस्रइल का जो विरोध कर रहा था, उसका मतलब क्या था। फिलस्तीनी मुक्ति संगठन (पीएलओ) द्वारा समर्थित इस प्रस्ताव को सुरक्षा परिषद में 14 देशों ने समर्थन दिया था लेकिन अमेरिका के वीटो कर देने से इसका अस्तित्व खत्म हो गया। एक रिपोर्ट के मुताबिक इस प्रस्ताव को वीटो करने के लिए वाशिंगटन पर अमेरिकी कांग्रेस और इस्रइल का दबाव था। गौरबलत है कि अमेरिकी कांग्रेस में इस्रइल समर्थक लॉबी का काफी दबदबा है। यही कारण है कि पिछले दिनों ओबामा प्रशासन द्वारा सम्बंधों के खराब होने की धमकी देने के बावजूद इस्रइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने बस्तियों के निर्माण की प्रक्रिया नहीं रोकी। अब अमेरिका बहाना बना रहा है कि इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में लाने से इस्रइल और फिलस्तीनियों के बीच बातचीत बहाली की प्रक्रिया और उलझेगी। पीएलओ का यह प्रस्ताव भले ही अमेरिकी वीटो की भेंट चढ़ गया हो लेकिन इसने यह बता दिया कि इस मुद्दे पर फिलस्तीन का साथ देने वाले अधिक हैं। प्रस्ताव को करीब 130 देशों ने समर्थन दिया है। मध्य-पूर्व की वर्तमान स्थितियों का अमेरिका सहित पूरे पश्चिम को ध्यान रखना चाहिए। अमेरिका जिन देशों या तानाशाहों के जरिए अपने हितों साधता है, उनका पतन शुरू हो चुका है। चूंकि इन देशों की जनता अमेरिका और पश्चिम के प्रति सदभावनापूर्ण नजरिया नहीं रखती इसलिए अमेरिका को इस नये वातावरण को देखते हुए मध्य-पूर्व में अपनी नीतियों को आगे बढ़ाने का कार्य करना चाहिए। दरसअल 1967 में पश्चिमी तट और पूर्वी येरुशलम पर नियंतण्रके बाद से इस्रइल वहां सौ से ज्यादा बस्तियां बना चुका है जिनमें करीब पांच लाख यहूदी रहते हैं। अन्तरराष्ट्रीय कानून की दृष्टि में यह निर्माण अवैध है लेकिन इस्रइल इसे गलत नहीं मानता। उसके गृह मंत्रालय ने मार्च में 1600 औरयहूदी बस्तियों के निर्माण की घोषणा की थी। दरअसल यहूदियों के ओल्ड टेस्टामेंट के आख्यान के अनुसार यह नगर उनके पूर्वज फादर अब्राहम ने देवभूमि के रूप में स्थापित किया था। ईसाई इसे ईसा के क्रास पर लटकाए जाने के कारण पवित्र मानते हैं। यहीं ईस्टर ने पुनर्जीवन पाया था। मुसलमान इसको अपने ‘हरम-उल-हाफिज’ के रूप में स्वीकार करते हैं। उनका कहना है कि पैगम्बर मुहम्मद यहीं से जन्नत गये थे। पश्चिमी येरुशलम एक अत्यंत आधुनिक नगर और इस्रइल की राजधानी है और पूर्वी येरुशलम संयुक्तराष्ट्र के 1948 के बंटवारे के अनुसार फिलस्तीनियों का था, लेकिन इस्रइल ने उस पर कब्जा कर लिया और 1980 में उसने दोनों को एक कर वहां अपना शासन स्थापित कर लिया। फिलस्तीनी पूर्वी येरुशलम वापस मांग रहे हैं लेकिन इस्रइल इसके तैयार नहीं है। पश्चिमी एशिया की गतिविधियों पर ध्यान दें लगता है कि फिलस्तीन और इस्रइल विरोधाभासी अपेक्षाओं से सम्पन्न होकर मध्यस्थों के जरिए निष्कर्ष निकालने का सपना देख रहे हैं या फिर दुनिया को सपना दिखा रहे हैं। इस्रइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की दक्षिण पंथी सरकार, पश्चिमी तट (वेस्ट बैंक) और येरुशलम पर हो रहे निर्माण कार्य को रोके बिना अप्रत्यक्ष वार्ता शुरू करना चाहती है जबकि फिलस्तीन इसे रोकने के बाद। विशेष तथ्य यह भी है कि फिलस्तीन मानता है कि जून 1967 के युद्ध में इस्रइल ने जो भू-भाग हथिया लिया था, वह फिलस्तीनी राज्य का है और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव संख्या 242 के मुताबिक वह इस्रइल के कब्जे वाला राज्य है इसलिए इस्रइल को उसे लौटा देना चाहिए। लेकिन 1967 की सीमाओं पर लौटने का मतलब होगा इस्रइली बस्तियों के बड़े ब्लॉक का फिलस्तीनी राज्य का हिस्सा बन जाना। यह न इस्रइल की सरकार स्वीकार करेगी, न ही वहां की जनता। अब एक ही रास्ता बचता है कि वार्ता जमीन की अदला-बदली को लेकर हो और इस्रइल को अनुमति दे दी जाए कि वह फिलस्तीन के अंदर भी अपनी बस्तियां रख सकता है। इसके साथ ही वेस्ट बैंक-गाजा पट्टी को कॉरिडोर बना दिया जाए। लेकिन यह भी संभव नहीं है क्योंकि फिलस्तीन में हमास और फतह गुट दो अमित्र राष्ट्रों की तरह नजर आ रहे हैं, जब तक ये दोनों एक नहीं हो जाते या फिर दोनों में से एक समाप्त नहीं हो जाता, तब तक फिलस्तीन की वास्तविक राष्ट्रीय आवश्यकता का ही पता नहीं चल पाएगा। हालांकि इस्रइली रक्षा मंत्री एहुद बराक चाहते हैं कि येरुशलम का विभाजन कर पश्चिमी येरुशलम और 12 यहूदी इलाके इस्रइल को दे दिये जाएं जहां उसके दो लाख से ज्यादा लोग रहते हैं और अरब इलाके फिलस्तीन को जहां ढाई लाख फिलस्तीनी रहते हैं। लेकिन बेंजामिन नेतान्याहू को यह मंजूर नहीं। फिलहाल जब अमेरिका ने उसका खुला समर्थन कर दिया है, तो फिलस्तीन के लिए यह दूर की कौड़ी हो गया है। लेकिन मध्य-पूर्व धीरे-धीरे अशांति की ओर बढ़ रहा है और अमेरिका और उसके सहयोगियों को इस आहट को महसूस करते हुए कदम आगे बढ़ाने चाहिए।
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