Saturday, March 26, 2011

यह एक और अंतहीन त्रासदी है


परमाणु विरोधी एक्टिविस्ट बहुत समय से चेतावनी देते आ रहे थे कि जापान हर समय भूकम्प के खतरों से घिरा रहता है, इसलिए उसके परमाणु रिएक्टरों को खतरा बना रहेगा लेकिन जापानी वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने पूरा आत्मविश्वास दिखाया कि उसके रिएक्टर फूलप्रूफ हैं और वे अति तीव्र भूकम्पों को भी झेल लेंगे। पर ऐसा नहीं हुआ
जापान के ऊपर अब तक की सबसे बड़ी मुसीबत आई है। उसकी यह त्रासदी गत 11 मार्च को शुरू हुई जो अब तक थमने का नाम नहीं ले रही। पहले तो बहुत शक्तिशाली भूकम्प आया (8.9 स्केल) फिर उसके कारण लगभग 30 फुट ऊंची समुद्री लहरें 'सुनामी'
उठीं और अंत हुआ जापानी परमाणु बिजलीघर फुकुशिमा-डायची पर कहर से। इस बिजलीघर के चार रिएक्टरों पर बहुत बुरा असर पड़ा, जिससे निकलने वाली रेडियो धर्मिता राजधानी टोक्यो तक पहुंच गई। यह आपदा इतनी भीषण है कि सबसे सम्पन्न देश जापान में बसे-बसाए कई शहर बरबाद हो गए। फुकुशिमा परमाणु बिजलीघर के चारों रिएक्टर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हैं और उन्हें बचाने के प्रयत्न हो रहे हैं। उनमें भारी विस्फोट हुए हैं और उनसे भारी रेडियो सक्रियता फैलने का डर है। पता नहीं इससे कितने लोगों पर दुष्प्रभाव पड़ेगा और यह कितने समय तक रहेगा। परमाणु विरोधी एक्टिविस्ट बहुत समय से चेतावनी देते आ रहे थे कि जापान हर समय भूकम्प के खतरों से घिरा रहता है, इसलिए उसके परमाणु रिएक्टरों को खतरा बना रहेगा लेकिन जापानी वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को पूरा आत्मविश्वास है कि उसके रिएक्टर फूलप्रूफ है और वे अति तीव्र भूकम्पों को भी झेल लेंगे। फुकुशिमा संयंत्र के अधिकारियों ने कहा है कि उनके क्षेत्र में विकिरण सारे जोखिम स्तर से ऊपर पहुंच चुका है। त्रासदी के दूसरे दिन ही पहले पेज पर राष्ट्रीय सहारा ने शीर्षक दिया 'धरती कांपी, सागर उफना, सैकड़ों मरे टोक्यो की एक बड़ी रिफाइनरी में आग लग गयी। कूलिंग सिस्टम फेल होने के बाद 11 परमाणु संयंत्र बंद हो गए। एक में आग लग गयी और देश में आपातस्थिति घोषित हो गयी। 20 देशों में सुनामी की आशंका का डर प्रकट किया गया। इंडोनेशिया और फिलिपींस तक पहुंची लहरें।'
पहले दिन से विकिरण का डर
पहले ही दिन से हजारों नागरिकों को विकिरण के डर से दूसरे स्थानों को भेजने की चेतावनी दी गई। तब तक रिसाब का कोई डर नहीं बताया गया। लेकिन कूलिंग सिस्टम ने काम करना बंद कर दिया। फिर भी शटडाउन के बाद भी रिएक्टर कोर गरम रहा। कूलिंग सिस्टम ठीक करने के प्रयास शुरू हो गए। तीन किलोमीटर के घेरे में तीन हजार निवासियों को स्थानांतरित करने को कहा गया। यह भी डर प्रकट किया गया कि यदि रिएक्टर कोर ठंडा नहीं किया गया तो परमाणु धातुएं पिघल जाएंगी यानी मेल्टडाउन हो जाएगा। विशेषज्ञों ने कहा कि यदि कोर रिएक्टर बेसल के रास्ते पिघलता है, तो यह बिल्डिंग में प्रवेश कर जाएगा और पूरा ढांचा गिर जाएगा। यहां पर चेरनोबिल की तरह की दुर्घटना हो जाएगी। दो सबसे भीषण दुर्घटना रिकार्ड में है। 1986 की चेरनोबिल (सोवियत रूस) और 1979 में अमेरिका में थ्री माइल आईलैंड रिएक्टर में आंशिक मेल्टडाउन। तीसरे दिन तीनों रिएक्टरों में मेल्टडाउन रोकने के प्रयास होते रहे। तब तक सुनामी भूकम्प में मरने वालों की संख्या दस हजार बतायी गयी। क्षतिग्रस्त रिएक्टरों को ओवरहीट होने से रोके जाने के प्रयास होते रहे। यदि यह नहीं रुका तो कंटेनर को मेल्ट कर देगा और विस्फोट तक हो सकता है। इससे वायुमंडल में रेडियोसक्रिय सामग्री का प्रसार हो सकता है। तीसरे- चौथे दिन रिएक्टरों को ठंडा करने के लिए समुद्री जल छिड़के जाने के प्रयत्न किए गए। चौथे दिन एक रिएक्टर के हाइड्रोजन विस्फोट हो गया और दूसरे में ईधन छड़ों पर असर पड़ने लगा। मेल्टडाउन रोकने की कोशिश की गयी। टोक्यो से 250 किलोमीटर दूर फुकुशिमा न्यूक्लियर कॉम्प्लेक्स में सबसे बड़ा डर कोई बड़ा विकिरण का रिसाव होने का बना रहा। दूसरे और तीसरे दिन दो रिएक्टरों में विस्फोट हो चुका था। तीसरे रिएक्टर में मेल्टडाउन का डर फैल गया क्योंकि इसका कूलिंग सिस्टम फेल हो गया।
मेल्टडाउन का डर
जापानी अधिकारियों के सामने चौथे दिन भी क्षतिग्रस्त रिएक्टरों पर नियंतण्ररखने की समस्या बनी रही। संचालकों को डर रहा कि यदि वे नियंतण्रनहीं कर पाये तो रिएक्टरों में पूरी तरह मेल्टडाउन हो जाएगा, जिससे बहुत विनाशकारी मात्रा में विकिरण फैलेगा। अंतरराष्ट्रीय परमाणु एजेंसी शुरू से यही जताती रही कि विकिरण की मात्रा बहुत सीमित रही है। संयंत्र संचालक टोक्यो इलेक्ट्रिक पॉवर कम्पनी ने कहा कि नम्बर दो रिएक्टर में ईधन छड़ें पूरी तरह जल गई हैं, जिससे ये मेल्टडाउन की स्थिति में पहुंच सकती हैं। पहले व तीसरे रिएक्टरों में आसक्ति मेल्टडाउन हो चुका बताया गया। जापान के प्रमुख कैबिनेट मंत्री ने कहा कि भारी मात्रा में विकिरण फैलने का कोई डर नहीं है। उन्होंने इन अफवाहों का खंडन किया और कहा कि जापानी क्षेत्र से बाहर किसी भी प्रकार का विकिरण फैलने का डर नहीं है।
सुनामी तो झेल ली विकिरण भयावह
इधर, अमेरिका और जापान के विशेषज्ञों ने कहा कि जापान बहुत बड़े संकट से गुजर रहा है और रिएक्टरों से भाप निकलने से विकिरण का खतरा बढ़ गया है। यह सिलसिला कई सप्ताह और महीनों तक चल सकता है। पेंटागन के अधिकारियों ने बताया कि परमाणु संयंत्र से 60 मील दूर उड़ रहे हेलीकॉप्टरों ने रेडियोसक्रिय कण जमा किए, जिनका विश्लेषण किया जा रहा है। निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यह विकिरण व्यापक पैमाने पर फैल सकता है। भाप निकलना अब मुख्य चिंता का विषय हो गया है। पांचवें दिन टोक्यो और अन्य नगरों के ऊपर विकिरण फैलने से बहुत दहशत हो गयी। कुछ लोग टोक्यो छोड़ने लगे और कुछ जरूरी सामान खरीदने लगे। संकट उस समय बढ़ा जब संचालकों ने बताया कि दो विस्फोटों में से एक ने रिएक्टर इमारत में बड़ा छिद्र कर दिया है, जिसका अर्थ है कि प्रयुक्त परमाणु ईधन वायुमंडल में फैल रहा है। जापान सरकार ने बताया कि परमाणु संयंत्र के पास विकिरण स्तर इतना पहुंच गया है, जिससे मानवीय स्वास्थ्य को बहुत खतरा है। प्रधानमंत्री कान ने 30 किलोमीटर घेरे में एक लाख 40 हजार लोगों को चेतावनी दी कि वे घरों से बाहर न निकलें, क्योंकि चेरनोबिल विनाश के बाद वे सबसे बड़े संकट से गुजर रहे हैं। टोक्यो अधिकारियों ने बताया कि वहां विकिरण सामान्य से दस गुना ज्यादा है। हवाई अड्डे पर एक यात्री योशिदा ने कहा -'मैं एक और भूकंप से नहीं डर रहा लेकिन विकिरण मेरे लिए बहुत भयावह है।' योशिदा अपनी पांच मास की सुपुत्री को गोदी में लिए थे।
खराब और खतरनाक परिदृश्य
नागरिकों को रेडिएशन से स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं के अतिरिक्त एक और खतरा खाद्य श्रृंखला और पानी में घातक विकिरण मिलने का डर है। इसे भी रोकना मुश्किल होगा। बच्चों और पेट में पल रहे शिशुओं को कैंसर का डर समा जाएगा। संयंत्र के अंदर विकिरण और आग का सामना करते हुए 50 कर्मचारी बड़ी बहादुरी से जूझ रहे हैं। वे समुद्री जल खतरनाकरूप से खुले परमाणु ईधन पर पम्प कर रहे हैं जिससे मेल्टडाउन रोका जा सके। यदि पिघला हुआ यूरेनियम और प्लुटोनियम ईधन बाहर छिटकने लगा तो सबसे खराब व खतरनाक से खतरनाक परिदृश्य होगा। कोई नहीं कह सकता कि कितना नरसंहार होगा और कितने लोग पीड़ित या रोगग्रस्त होंगे। सप्ताहांत ऊपर उठते विकिरण और घटते नजर नहीं आ रहे थे। फुकुशिमा रिएक्टरों पर नियंतण्रपाने के सारे प्रयत्न असफल होते नजर आ रहे थे। जापान से अपने देशों को लौटने वाले यात्रियों के कपड़ों पर विकिरण मापा गया है। अमेरिकी सरकार का कहना है कि भूकम्प और सुनामी के बाद स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। अंत में सेना के ट्रक फुकुशिमा संयंत्र पर पानी डाले जा रहे हैं। यदि फिर भी फॉलआउट नहीं रुका तो चेरनोबिल की तरह सारे संयंत्र पर आवरण डालना होगा। उसे कंक्रीट और सीमेंट में दबाया जा सकता है। पूरे जापान पर भीषण संकट है। वह पहले से ही 1945 (द्वितीय विश्व युद्ध) से परमाणु संकट से गुजर रहा है, जो उसकी पहली त्रासदी थी, जिसका अंत अब तक नहीं हुआ। अब दूसरी कभी समाप्त न होने वाली त्रासदी है। अब तो परमाणु ऊर्जा पर से अधिकांश संसार का विश्वास डिगता देख रहा है।


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