परमाणु शक्ति को पूरी तरह सुरक्षित बना पाना असम्भव है। भूकम्प और सुनामी नहीं होंगे, तो आग हो सकती है, इंसानी लापरवाहियां हो सकती हैं, आतंकवाद हो सकता है तथा और कुछ नहीं तो किसी सत्तारूढ़ नेता का पागलपन हो सकता है। हर हाल में, परमाणु शक्ति जुआ है। अगर हम इसके बिना काम चला सकते हैं तो ऐसा भयानक जुआ क्यों खेलें? हम अपने नागरिकों का भविष्य दांव पर क्यों लगा रहे हैं
हम लोग एक ऐसे प्रजातांत्रिक देश में रहते हैं, जिसकी सरकार को अपनी ही जनता के जीवन-मरण के सवालों से कोई सरोकार नहीं है। हम यहां भूख, गरीबी, बाढ़ और सूखे की बात नहीं कर रहे हैं। हम उनकी भी बात नहीं कर रहे हैं, जिनका इस व्यवस्था में कोई भविष्य नहीं है और जिनके जीवन-मरण में कोई ज्यादा फर्क नहीं है। हमारा सरोकार जापान के फुकुशिमा शहर में हुए नाभिकीय विस्फोट के भयावह नतीजों से है। और ऐसा भी नहीं है कि यह इस तरह की पहली घटना है। चेरनोबिल (रूस) और थ्री माइल आइलैंड (अमेरिका) में इस तरह का कांड पहले भी हो चुका है। फिर भी हमारी अंत:प्रज्ञा कहती है कि सुनामी न आता, तब भी परमाणु दुर्घटना हो सकती थी। जापान या कहीं भी हो सकती है। हमारे यहां भी। चेरनोबिल और थ्री माइल आइलैंड में परमाणु रिसाव के लिए कोई प्राकृतिक घटना जिम्मेदार नहीं थी। उनका सम्बन्ध सीधे परमाणु संयंत्रों के वजूद से है, जो संहार के खौलते कुंड हैं। रूस, अमेरिका और जापान की तकनीकी क्षमता के सामने हमारा देश बौने जैसा है। फिर भी हमारी सरकार का दावा है कि हम अपनी परमाणु नीति को छोड़ने वाले नहीं हैं। यानी हम मरण उत्सव मनाने के लिए लालायित हैं। वर्तमान परमाणु नीति के बचाव में सरकार का मुख्य तर्क क्या है? संसद में सरकार ने बयान दिया कि इसका सम्बन्ध सीधे हमारी प्रतिरक्षा से है। जब चीन और पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार हैं, तो हम इन्हें हिन्द महासागर में कैसे फेंक सकते हैं? शाबाश ! चीन के हाथों पराजय और पाकिस्तान के रु ख को देखते हुए यह दृष्टिकोण बिलकुल जायज है। तमाम तरह के जोखिम उठाते हुए भी हमें अपनी प्रतिरक्षा तैयारियों को अद्यतन रखना होगा। परमाणु नि:शस्त्रीकरण होगा तो दुनिया भर में होगा किसी अकेले देश में नहीं। जब तक हमारे शत्रुओं या सम्भावित शत्रुओं के पास परमाणु शक्ति के संहारक औजार हैं, हम लापरवाह नहीं हो सकते। राष्ट्रीय हित में जो भी जरूरी है, वह जितना भी खतरनाक हो, उससे मुक्ति नहीं है। लेकिन जापान में परमाणु विभीषिका का जो चेहरा सामने आया है, उसका सम्बन्ध प्रतिरक्षा से नहीं, बिजली पैदा करने से है। उसे प्रचुर मात्रा में बिजली चाहिए थी ताकि वहां के नागरिकों के रहन-सहन के स्तर को बेहतर बनाया जा सके और जापानी उद्योगों की बढ़ती हुई जरूरतों को पूरा किया जा सके। परमाणु शक्ति के विनाशकारी रूप से जापान अनवगत नहीं है। परमाणु शक्ति का पहला संहारक प्रयोग जापान के ही दो शहरों पर किया गया था। इस अनुभव की रोशनी में जापान को इस दैत्य से कोसों दूर रहना चाहिए था लेकिन वह लालच में पड़ गया। परमाणु शक्ति के गैर-युद्धक प्रयोग के नाम पर वह बिजली पैदा करने के लिए परमाणु तकनीक का इस्तेमाल करने लगा। नतीजा सामने है। हमारी सरकार युद्ध के प्रयोजन के लिए परमाणु शक्ति के उपयोग को जायज ठहराती है। लेकिन हम बिजली पैदा करने के लिए भी परमाणु शक्ति का इस्तेमाल कर रहे हैं। यह इस्तेमाल और ज्यादा बढ़ने वाला है। इसी इरादे से केंद्र सरकार ने अमेरिका से परमाणु करार किया था। इसके विरोधस्वरूप मनमोहन सिंह की सरकार गिरने वाली थी। पर उसे कैसेबचा लिया गया, यह विकीलीक्स के रहस्योद्घाटन से साफ है। उस समय करोड़ों रु पयों का जो आदान-प्रदान हुआ, उसका नतीजा यह है कि हम परमाणु खतरे के साथ जीने के लिए अभिशप्त हैं। तथ्य सामने हैं पर सरकार के हाथ जरा भी नहीं कांप रहे हैं। वह अपनी परमाणु नीति पर अडिग है। काश, वह भ्रष्टाचार मिटाने के मामले में भी इतनी अडिग होती। जो राजनीतिक व्यवस्था इतने बड़े पैमाने पर मौजूद और कार्यशील काले धन से चिंतित नहीं है, उससे परमाणु शक्ति के खतरे के प्रति संवेदनशील होने की मांग करना ही गलत है। सरकार का मनोबल इसलिए बढ़ा हुआ है कि दुनिया के परमाणु देशों ने जापान की विभीषिका का दोष परमाणु शक्ति के खतरों के बजाय जापान सरकार की लापरवाहियों पर थोप दिया है। बताया गया कि जिन संयंत्रों का बुरा हाल हुआ है, वे बीस साल पुराने हैं और उन्हें कभी का बंद कर दिया जाना चाहिए था। यानी जरूरी तैयारियां की जाएं तो परमाणु संयंत्र पूरी तरह सुरक्षित हैं। यह भी कहा जा रहा कि बिजली पैदा करने के लिए परमाणु का कोई विकल्प नहीं है। बिजली नहीं होगी तो आधुनिक सभ्यता की नींव ही हिल जाएगी। इसलिए जब तक ऊर्जा के नए तथा पुनर्चक्रीय स्रेत नहीं ढूंढ लिए जाते, परमाणु का परित्याग नहीं किया जा सकता। इन दोनों ही तर्कों में दोष है। दुनिया के बुद्धिमान इस बात पर सहमत हैं कि परमाणु शक्ति को पूरी तरह सुरक्षित बना पाना असम्भव है। भूकम्प और सुनामी नहीं होंगे, तो आग हो सकती है, इंसानी लापरवाहियां हो सकती हैं, आतंकवाद हो सकता है तथा और कुछ नहीं तो किसी सत्तारूढ़ नेता का पागलपन हो सकता है। हर हाल में, परमाणु शक्ति जुआ है। अगर हम इसके बिना काम चला सकते हैं तो ऐसा भयानक जुआ क्यों खेलें? पेच यहीं है। परमाणु शक्ति को विदा कर दिया जाए, तो वर्तमान सम्पन्नता मुमकिन नहीं है। यूरोप और अमेरिका को अपनी औद्योगिक क्षमता और अपने नागरिकों के रहन-सहन के स्तर को नीचे लाना होगा। ये देश कम सम्पन्न हो कर जीने की क्षमता खो चुके हैं। इसलिए वे परमाणु जुए से विरत नहीं हो सकते। इसलिए इस प्रश्न का सम्बन्ध आधुनिक सभ्यता के ऊर्जा आधार से है। लेकिन हमें क्या हुआ है, हम अब भी यूरोप-अमेरिका नहीं बने हैं। हम अपने नागरिकों का भविष्य दांव पर क्यों लगा रहे हैं?
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