इसलामाबाद से लेकर त्रिपोली तक एशिया में इन दिनों भारी अशांति और अस्थिरता है। पाकिस्तान में दो महीनों के भीतर तालिबान ने दूसरे उदारवादी लोकतांत्रिक नेता की हत्या कर दी है। पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर की ही तरह अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री शाहबाज भट्टी को भी इसलिए मारा गया कि वह कठोर ईशनिंदा कानून में सुधार लाना चाहते थे। उधर टूनीशिया के एक रेहड़ी वाले का गरीबी से तंग होकर चौरास्ते पर किया आत्मदाह देश के तानाशाह जैनुल आबेदिन और फिर मिस्र में हुस्नी मुबारक के तख्ता पलट की शुरुआत करवा गया। क्रमश: विशाल खनिज तेल के मालिक मध्य एशिया के दूसरे देशों में भी अफ्रो-अरब देशों पर बरसों से काबिज जालिम तानाशाहों के खिलाफ जनता सीधे सड़कों पर उतर आई है।
अचरज यह कि न तो खुमैनी या नासिर सरीखा कोई बड़ा नेता इन बगावतियों के पीछे है और न ही तालिबान अथवा अल कायदा जैसा धार्मिक गुट। एक स्वत:स्फूर्त आक्रोश ने विशाल लहर की तरह पूरे क्षेत्र को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। लीबिया पर 41 साल से दमनकारी शासन चलाते रहे गद्दाफी का नंबर अपदस्थ होने वालों में अगला है। संभव है, यह सनकी और बदमिजाज नेता मिस्र या ट्यूनीशिया के शासकों की तरह बदली परिस्थिति का तकाजा समझ कर चुपचाप न हटे। लेकिन पैंसठ लाख लोगों के बीच उफनते आक्रोश तथा विश्व बिरादरी के तेवर को देखते हुए देर-सबेर उनका जाना तय है। शायद गद्दाफी भी भीतरखाने यह सच जानते हैं, क्योंकि सोने-चांदी और अरबों की विदेशी मुद्रा से भरा उसका एक हवाई जहाज रिश्तेदारों सहित मित्र देश जिंबाब्वे चला गया है।
पाकिस्तान की ही तरह इसलामी अफ्रो-अरब देशों में भी टिकाऊ लोकतांत्रिक निजाम कम ही बन पाते हैं। वर्ष 2011 में शायद पहली बार विश्व्यापी नेट तथा ट्विटर और फेसबुक सरीखे माध्यमों की मार्फत और उनकी मदद लेकर देश की दबी-कुचली आम जनता अपना लोकतांत्रिक हक मांग रही है। पर जानकारों को भय है कि तानाशाहों के हटने के बाद वहां सत्ता में बने शून्य की वजह से गृहयुद्ध न छिड़ जाए, जिसका फायदा फिर कोई चालाक फौजी नेता या कट्टरपंथी गुट उठा सकता है। आह की ही तरह क्रांति को भी चाहिए इक उम्र असर होने तक। पर क्या तानाशाहों द्वारा शिक्षा से दूर रखी गई और स्त्री तथा अल्पसंख्यक-विरोधी विचारों तथा कबीलाई गुटबंदियों से ग्रस्त अफ्रो-अरब मुल्कों की जनता में इतना धीरज और सहिष्णुता है कि आम चुनाव वैधानिक रूप से कराये जा सकें? और फिर एक लोकतांत्रिक संविधान, एक कारगर विधायिका व कार्यपालिका का गठन किया जाए, तो समाज उसे पचा सके? आम राय है कि क्रांति सार्थक वहां हो पाती है, जहां लोग पढ़े-लिखे हों और अपने अधिकारों को लेकर सचेत हों। लेकिन यह भी सच है कि माओ या लेनिन चीन और रूस में जिस जनता की मदद से सफल क्रांति कर स्थायी बदलाव लाए, वह लगभग अपढ़ और कई मायनों में बेहद पिछड़ी थी। खुद 1920 का वह भारत, जिसके आम जन को गांधी ने संगठित कर सदियों से चले आ रहे अंगरेजी शासन से सफलतापूर्वक लोहा लिया, आज की तुलना में बेहद पिछड़ा माना जाएगा। फिर भी ये क्रांतियां 1857 के गदर, 1967 में फ्रांस के छात्रों की लंबी हड़ताली पहल या थ्येन आनमन चौक की क्रांति की तुलना में सफल रहीं।
दरअसल जनांदोलनों के लोकतंत्र गठन में विफल होने की मूल वजह है सही नेतृत्व का अभाव। अरब देशों में जनता की जीत से पूंजीवाद और अमेरिका की किरकिरी भले हो गई हो, पर अभी तक वहां सर्वस्वीकार्य, सक्षम और लोकतंत्र में यकीन रखनेवाले नेतृत्व के दर्शन नहीं हो रहे हैं। सड़कों पर उतरे विभिन्न वर्गों के बीच जो एकजुटता दिखती है, वह अभी स्टंट फिल्मों के चीखते अंत की फॉरमूला बहादुरी से आगे नहीं जाती। ऐसे सुखांत सिनेमा पर हम चटखारे लेकर कहते हुए भले घर जाएं कि जैसी इनकी बहुरी, सबकी बहुरे। लेकिन वास्तविक जीवन की धरती पर ऐसा आत्मतोष अकसर फिल्मी प्रमाणित हुआ है।
स्थायित्व के लिए लोकतंत्र में तीन बातें जरूरी हैं : शिक्षित वृहत्तर समाज (सिविल सोसाइटी), धार्मिक सहिष्णुता और तरक्कीपसंद अंतरराष्ट्रीय मंचों से जुड़ाव। गद्दाफी सहित मध्य एशिया के तमाम शासकों ने खुद भले ही पूंजीवादी पश्चिमी सुविधाओं तथा संयुक्त राष्ट्र संगठन की छतरी को जी भरकर भोगा और पश्चिमी शिक्षा संस्थानों में अपने बच्चों को पढ़ाया हो, लेकिन आम जनता के बीच बारंबार यही कहा है कि पश्चिमी सभ्यता और तालीम इसलाम-विरोधी और पतनशील है। इस वजह से यहां जब कभी क्रांतियां हुईं, टिकाऊ लोकतांत्रिक व्यवस्था बनाने और चलाने के सवाल पर प्रतिगामी विचारों वाले शक्की मिजाज कबीलाई संगठन भिड़ गए और सत्ता फिर तानाशाह ले भागे। तेल पिपासु पश्चिमी विश्व को भी सस्ता तेल पाते रहने के लिए कारगर लोकतंत्र की अनेक पेचीदगियों से निपटने के बजाय एक तानाशाह की झक पूरी करना अधिक आसान पड़ता है, लिहाजा एक उदारवादी वृहत्तर समाज, जिसमें स्त्री-पुरुष, इसलामी- गैर इसलामी, शिया-सुन्नी सभी तरह के नागरिकों के बीच आर्थिक, राजनीतिक तथा सामाजिक समता हो और जो शस्त्र के बजाय तर्क पर आधारित संवाद कर सकें, इस इलाके में बनना आसान नहीं। पूर्वी लीबिया में आजादी पाने के बाद वहां भुखमरी सिर उठाने लगी है और अल कायदा की गिद्ध दृष्टि तो इलाके पर है ही। अमेरिकी सेना आई का हौआ खड़ा कर गद्दाफी स्थिति अपने पक्ष में करने की कोशिश करने लगे हैं। ऐसे में मध्य वर्ग मुख्यधारा से कटा हो, सेना तानाशाह की हो और भुखमरी बढ़ने लगे, तो आकुल हो अशिक्षित धर्मभीरु आम जनता पुराने तानाशाह या नए कट्टरपंथी धड़ों की तरफ मुड़ जाती है, पाकिस्तान इसका प्रमाण है।
एक सार्थक क्रांति के लिए सिर्फ भावनात्मक उफान या बड़ी तादाद में जुनूनी नारेबाज भीड़ से काम नहीं चलता। ठंडे दिमाग और एक साफ दर्शन से प्रेरित, अनुशासित और दीर्घकालिक रणनीति देने वाला नेतृत्व भी जरूरी है। सवाल यह है कि मध्य एशिया में क्या उस तरह का कोई नया सक्षम जन नेता तैयार हो रहा है? वहां की जनता ने जिस बहादुरी से अपनी आजादी की लड़ाई लड़ी है, उसको देखते हुए दुआ करनी चाहिए कि इस सवाल का जवाब ‘हां’ में हो।
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