Sunday, March 27, 2011

अरब-अफ्रीका की अशांति


पश्चिम एशिया में सीरिया, यमन और बहरीन तथा उत्तरी अफ्रीका में लीबिया का मौजूदा घटनाक्रम इस क्षेत्र में चल रही सामाजिक-राजनीतिक सुनामी का एक हिस्सा है। इस सुनामी की शुरुआत गत दिसंबर में ट्यूनीशिया में जैसमिन क्रांति के साथ हुई थी और धीरे-धीरे इसका असर अन्य देशों तक पहुंच गया। अरब दुनिया को दशकों तक सार्थक लोकतंत्र से वंचित रखा गया। इसके पीछे पश्चिमी देशों के दोहरे आचरण और क्षेत्र (विशेषकर तेल संपन्न देशों) के तानाशाहों, राजाओं और अमीरों के संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थो की मुख्य भूमिका रही, जिन्होंने कथित स्थिरता के नाम पर अपने-अपने हितों की पूर्ति की। अब वही अरब दुनिया उबल रही है। मिF और ट्यूनीशिया में पहले ही पुराना राजनीतिक ढांचा बदल चुका है और अन्य देशों में अशांति, असंतोष अलग-अलग तरीके से बाहर आ रहा है। सीरिया में खून-खराबा बढ़ गया है। वहां के शहरों में सत्ता विरोधी प्रदर्शनों की संख्या बढ़ती जा रही है। राष्ट्रपति असद और उनके पिता ने चार दशकों तक सीरिया पर शासन किया, लेकिन अब वे अरब की सड़कों पर उतरी क्रांति के निशाने पर हैं। यह स्पष्ट है कि जो परिदृश्य उभर रहा है उसमें शासन प्रणाली का सुगम और कष्टरहित स्थानांतरण नहीं होने वाला, जैसा कि मिF और ट्यूनीशिया में हुआ। लीबिया में कर्नल गद्दाफी को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रतिबंधों का सामना करना पड़ रहा है। इसके अतिरिक्त उनके समक्ष अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन तथा अन्य सहयोगी देशों की संयुक्त सेनाओं की चुनौती भी है। यह महत्वपूर्ण है कि एक अरब देश कतर उड़ान रहित क्षेत्र संबंधी अभियान में शामिल हुआ है और संयुक्त अरब अमीरात राजनीतिक गठबंधन का हिस्सा है। यहां यह तर्क आगे बढ़ाया जा रहा है कि गद्दाफी शासन लीबिया के निर्दोष नागरिकों की जान ले रहा है। प्रदर्शनकारी और बागी गुट बेनगाजी में एकत्रित हैं और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की यह जिम्मेदारी है कि वह उनकी रक्षा करे। नि:संदेह यह एक प्रशंसनीय पहल है, लेकिन तथ्य यह है कि एक छोटी अरब राजशाही बहरीन में इसी तरह की लोकतांत्रिक क्रांति को सऊदी सेनाओं की मदद से कुचला जा रहा है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय मौन है। बहरीन में पर्ल स्क्वायर ढहाए जाने की घटना के शुरुआती मीडिया कवरेज के बाद बीबीसी तक ने वहां की घटनाओं पर चुप रहना ही बेहतर समझा। इस दुखद सच्चाई का एक कारण यह है कि बहरीन की क्रांति ने बहुमत वाले शिया समुदाय को अल्पमत सुन्नी शासन के खिलाफ खड़ा कर दिया है। बहरीन अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के अरब जगत में लोकतांत्रिक क्रांति के संदर्भ में दोहरे दृष्टिकोण का आदर्श उदाहरण है। बहरीन सऊदी अरब के नजदीक है, भौगोलिक रूप से भी और वैचारिक रूप से भी और यही कारण है कि वहां लोकतंत्र के पक्ष में उठी आवाज को लेकर पश्चिमी देश दोहरे मानदंड अपना रहे हैं। सऊदी अरब में भी शियाओं की अच्छी-खासी आबादी है, जो तेल की संपदा से संपन्न इस देश में उपेक्षित पड़ी हुई है। यहां के सुन्नी शासक इस्लाम की कट्टर सुन्नी-वहाबी विचारधारा का समर्थन करते हैं। बहरीन और सऊदी अरब, दोनों ही देशों में शिया नागरिक दूसरे दर्जे के नागरिक हैं। यही कारण है कि बहरीन में लोकतंत्र के समर्थन में चल रहे आंदोलन को शिया आंदोलन के रूप में देखा जा रहा है, जो ईरान और इराक (दोनों शिया बहुल देश) को क्षेत्रीय-राजनीतिक इस्लाम रणनीतिक गणित में ले आता है। जाहिर है, इस आधार पर इस आंदोलन को दबाया ही जाना है ताकि यह अमेरिका के एक महत्वपूर्ण सहयोगी सऊदी अरब में अपना असर न दिखा सके। आश्चर्य नहीं कि जब सऊदी अरब की सेनाएं संयुक्त राष्ट्र की किसी रजामंदी के बिना बहरीन पहुंचीं तो वैश्विक समुदाय ने लीबिया के एकदम विपरीत अपनी आंखें बंद रखना ही बेहतर समझा। लीबिया में फ्रांस ने 19 मार्च को पहला हवाई हमला किया और इस सैन्य कार्रवाई का उद्देश्य निर्दोष नागरिकों तथा लोकतंत्र समर्थक समूहों की रक्षा करना बताया गया है, हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने बार-बार कहा है कि लीबिया में अमेरिकी सेना नहीं भेजी जाएगी। ब्रिटेन अथवा फ्रांस के पास उस तरह की सैन्य क्षमता नहीं जैसी अमेरिका के पास है। हवाई युद्ध एक सीमित असर ही डाल सकता है। यह प्रतीत होता है कि लीबिया को रक्तरंजित गतिरोध की ओर आगे बढ़ाया जा रहा है, जिसमें यह देश दो भागों में विभाजित होगा। एक, गद्दाफी के शासन वाला त्रिपोली और पूर्वी भाग तथा दूसरा, बागियों के कब्जे वाला बेनगाजी। जाहिर है, लीबिया में गृहयुद्ध की आशंका गहराती जा रही है। इस भूलभुलैया में ऐसी अटकलें भी लगाई जा रही हैं कि कर्नल गद्दाफी आतंक का सहारा ले सकते हैं। इस संदर्भ में यह विस्मृत नहीं किया जा सकता कि लीबिया 1989 के पैन एम धमाकों के लिए जिम्मेदार था। गद्दाफी या तो सीधे-सीधे या फिर अल कायदा के जरिए आतंकवाद का रास्ता अख्तियार कर सकते हैं। (लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)


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