Thursday, March 10, 2011

चीनी तैयारियों को जवाब


भारत की सैन्य शक्ति का जायजा ले रहे हैं लेखक
सुखद संकेत है कि चीन के तेजी से फैलते बुनियादी ढांचे और मजबूत होती सैन्य ताकत के प्रति नई दिल्ली सचेत हो रही है। तिब्बत में चीन की बढ़ती सैन्य शक्ति के मद्देनजर भारत ने दो माउंटेन डिवीजनें खड़ी कर ली हैं और सेना की पर्वतीय युद्ध क्षमताओं को मजबूत किया है। इन डिवीजनों पर 14 अरब रुपये का खर्च आया है। नागालैंड में रंगपुर-स्थित 3 कोर और असम में तेजपुर-स्थित 4 कोर की ये दोनों डिवीजने कोलकाता-स्थित पूर्वी कमान के अधीन होंगी। इन दो विशेष डिवीजनों से भारतीय सेना के रणनीतिक कौशल में भारी इजाफा होगा, जो चीन की सीमा से सटे इन इलाकों के सामरिक महत्व को देखते हुए काफी महत्वपूर्ण है। इन डिवीजनों को 50-50 जवानों को लाने-ले जाने में सक्षम हैवी-लिफ्ट हेलीकॉप्टरों, हल्की हाउत्जिर तोपों, मिसाइलों और तोपों से लैस हेलीकॉप्टर गनशिप और मानव-रहित वाहनों (यूएवी) जैसी आधुनिकतम प्रौद्योगिकी से लैस किया गया है। इन हवाई संपत्तियों की मदद से इन दो डिवीजनों को अरुणाचल प्रदेश जैसे दुर्गम इलाकों में आसानी से संचालित किया जा सकेगा। इसके अलावा अरुणाचल स्काउट और सिक्किम स्काउटों की स्थापना एक और सकारात्मक प्रयास है। चीन को ध्यान में रखते हुए असम में तेजपुर में सुखोई एसयू-30 विमानों की लड़ाकू जेट स्क्वेड्रन तैनात की गई है, जिसके लिए एयरफील्डों और हेलीपैडों को विकसित किया जा रहा है। रक्षामंत्री एके एंटनी ने चीन के सैन्य आधुनिकीकरण में बारे में गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि भारत को अपनी रक्षा तैयारी की व्यापक समीक्षा और अपनी सुरक्षा चुनौतियों का सामना करने के लिए सतर्क रहने की जरूरत है। उन्होंने सशस्त्र सेनाओं की क्षमताओं की समीक्षा को एक सतत प्रक्रिया बताया और कहा कि रक्षा तैयारियों की नियमित रूप से समीक्षा की जा रही है। जो भी कमियां पाई जाएंगी उन्हें दूर किया जाएगा। चीन के सैन्य आधुनिकीकरण ने अरुणाचल प्रदेश जैसे इलाकों में सुरक्षा समीकरणों को बदल दिया है। इसलिए इस मुद्दे के बारे में यथार्थवादी रुख अपनाने और सामरिक रोडमैप तैयार करने के लिए पेशेवर दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है। इन हालात में नई दिल्ली केवल नौकरशाही के बूते पर कायदे-कानून नहीं बना सकती, बल्कि इस बारे में थिंक टैंकों का सहयोग लेना होगा, जिनमें पूर्व सैन्य अधिकारी शामिल हों। उदाहरण के लिए चीन की तैयारियों को देखते हुए एक व्यवहारिक तथा अनुकूल सामरिक रक्षा नीति तैयार करने में रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान काफी मददगार साबित हो सकता है। यही नहीं चीन से संबंधित नीतियों को भी यह ध्यान में रखते हुए बनाया जाना चाहिए कि भारत को चकमा देने और पूर्व एशियाई क्षेत्र में सर्वाधिक ताकतवर खिलाड़ी के रूप में उभरने की अपनी कोशिशों में इस पड़ोसी देश ने निवेश और सहायता के जरिए म्यांमार की सैन्य सरकार को साधने के साथ-साथ बांग्लादेश को भी सहायता देनी शुरू की है। फिर स्टि्रंग आफ प‌र्ल्स की रणनीति के जरिए चीन भारत को घेर लेना चाहता है, जिसके लिए वह हांगकांग से लेकर सूडान तक बढि़या समुद्र संचार मार्ग विकसित कर रहा है। केवल नौकरशाहों को ही नहीं, हमारे नीति-निर्माताओं को भी इस घटनाक्रम को ध्यान में रखना होगा और उसके अनुसार ही रणनीति का खाका बनाना होगा। इसी में सामरिक मामलों के विशेषज्ञों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि वे सरकार को सबसे कारगर रास्ता सुझा सकते हैं। लेकिन क्या ऐसा उस प्रणाली में संभव हो सकता है, जो नौकरशाही के पक्ष में झुकी हो और जहां राजनेताओं को उन लोगों से सलाह लेने में हिचक होती हो, जो वास्तव में उपयोगी हैं? चीन जैसे देश की तैयारियों को देखते हुए सैन्य और बुनियादी ढांचे की दृष्टि के लिहाज से 21वीं सदी में भारत को एक नया दृष्टिकोण अपनाना होगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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