Friday, March 25, 2011

तिब्बती राजनीति को झटका लगेगा


दलाई लामा की ओर से राजनीति से अलग होने का लिया गया फैसला उन लाखों निर्वासित तिब्बतियों के लिए बड़ा छटका है, जो पिछले 52 सालों से स्वायत्तता की लड़ाई लड़ते आ रहे हैं। तिब्बतियों का आंदोलन पिछले छह दशकों से चल रहा है। चीन द्वारा तिब्बतियों का शोषण पिछले कई वर्षो से किया जाता आ रहा है। तिब्बत की अपनी एक अलग राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक पहचान है। मगर चीन सरकार द्वारा उसकी इसी पहचान को मिटाने की साजिश की जा रही है। चीन की इसी अदूरदर्शिता की वजह से तिब्बत का मसला बजाए सुलझने के और उलझता चला जा रहा है। जो बौद्ध भिक्षु हमेशा न सिर्फ स्वयं अहिंसा के अनुयायी रहे, बल्कि दुनिया को भी हमेशा अहिंसा के रास्ते पर चलने का संदेश दिया, आज उन्हीं का वतन हिंसा की आग में जल रहा है। हम कह सकते हैं कि दलाई लामा का यह निजी और व्यक्तिगत फैसला हो सकता, लेकिन नैय्या को यों बीच भंवर में छोड़ देना समझ से परे है। पूरे तिब्बत में पिछले छह दशकों से रह रहे तिब्बती जिन्हें चोल्खा-सम (यू-शांग, खाम तथा आमदो) के नाम से जाना जाता है, चीनी सरकार की दमनकारी नीतियों के साये में जिंदगी जीने को मजबूर हैं। उनकी धार्मिक मान्यताओं, अनोखी सांस्कृतिक विरासत तथा राष्ट्रीयता के बोध ने उन्हें इस आस से बांधे रखा है कि कभी तो आजादी मिलेगी। इस उम्मीद के चलते वे शांतिपूर्ण ढंग से निरंतर अपने अधिकारों की आवाज बुलंद करते रहते हैं। चीन के जुल्म की ही बानगी देखिए, जब 10 मार्च 1959 की घटना की 49वीं बरसी के मौके पर तमाम लोग इकट्ठा होकर उन शहीदों को याद कर रहे थे, जिन्होंने इसी दिन ल्हासा में शुरू हुए इस आंदोलन में अपनी जान गंवा दी थी। चीन ने उनके इस शांतिपूर्ण मार्च पर न सिर्फ दमनात्मक कार्रवाई की, बल्कि जबरदस्त खून-खराबा किया, जिसमें करीब सौ से ज्यादा बौद्ध भिक्षुओं की जान गई। इस पूरे मामले की निष्पक्ष अंतरराष्ट्रीय जांच की जानी चाहिए थी, लेकिन चीन के प्रभाव के कारण ऐसा न हो सका। कहने को तो तिब्बत को स्वायत्त क्षेत्र, स्वायत्त देश तथा स्वायत्तशासी प्रदेश जैसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है, लेकिन यह स्वायत्तता सिर्फ नाम की है और हकीकत में तिब्बत को कभी स्वायत्तता मिली ही नहीं। बड़ी अजीब बात तो यह है कि इस पर उन लोगों का शासन चलता है, जो इस क्षेत्र की परिस्थितियों से पूरी तरह अनभिज्ञ हैं। चीनी सरकार की इसी अदूरदर्शी नीतियों की वजह से तिब्बत का कुदरती माहौल पूरी तरह से गड़बड़ा गया है। उनकी जनसंख्या स्थानांतरण की नीतियों की वजह से आज पूरे क्षेत्र में गैर तिब्बती आबादी कई गुना बढ़ गई है और तिब्बती खुद अपने ही वतन में अल्पसंख्यक बनकर रह गए हैं। इसके अलावा भाषा, रीति-रिवाज तथा परंपराएं जिनसे तिब्बत की मूल पहचान है, वह धूमिल पड़ती जा रही है। तिब्बतियों को चारों तरफ से चीनी आबादी द्वारा घेर लिया गया है। इसी छद्म स्वायत्तता का नतीजा है कि इस क्षेत्र के मूल निवासियों के हालात दिन-ब-दिन खराब होते जा रहे हैं। चीन की छल-कपट वाली नीतियों की वजह से न सिर्फ तिब्बतियों को नुकसान पहंुच रहा है, बल्कि खुद चीन की एकता और अखंडता भी प्रभावित हो रही है। चीनी सरकार का तिब्बत पर वर्ष 1951 से कब्जा है, जिसकी स्वायत्ता की मांग तिब्बती हमेशा से करते रहे हैं। तिब्बती अलग देश की मांग नहीं कर रहे हैं, सिर्फ अपनी उस स्वायत्तता की मांग कर रहे हैं, जहां वह खुली फिजा में सांस ले सकें। अपने धर्म, संस्कृति और रीति-रिवाजों की रक्षा कर सकें। दलाई लामा ने हमेशा चीन सरकार से ऐसी नीति अमल में लाने की अपील की, जिसमें दोनों के निहितार्थ हों, लेकिन उनकी किसी ने नहीं सुनी। तिब्बतियों ने जब भी चीनी सरकार की ओर अपना दाहिना हाथ बढ़ाया तो बजाए इसे गर्मजोशी से थामने के चीन ने उन्हें खाली ही लौटाया। तिब्बतियों ने अब अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मदद की गुहार लगाई है कि वह तिब्बत का समर्थन करें। दलाई लामा ने भारत का हमेशा अभार व्यक्त किया, जिसने हमेशा साथ दिया और निर्वासित तिब्बतियों को अपने यहां पनाह दी। ऐसे में भारत की जिम्मेदारियां काफी बढ़ जाती हैं। दलाई लामा ने हमेश भारत-चीन के बेहतर ताल्लुकात की वकालत की है। शायद इससे तिब्बत के मसले का हल निकालने में मदद मिले। हालांकि ऐसा नामुमकिन लगता है, फिर भी भारत ने हमेशा तिब्बत की स्वायत्तता की हिमायत की है और लाखों तिब्बती शरणार्थी राजधानी दिल्ली समेत देश के अन्य शहरों में पनाह लिए हुए हैं।


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