दलाई लामा के राजनीतिक पद से निवृत्त होने की घोषणा पर चीन की नकारात्मक प्रतिक्रिया स्वाभाविक है। चीन हमेशा से दलाई लामा को विघटनकारी एवं धोखेबाज कहता रहा है। दुनिया में भले ही दलाई लामा की छवि शांति, अहिंसा एवं सहिष्णुता का संदेश फैलाने वाले संत की हो और दुनिया भर में फैले तिब्बती उन्हें अपना मार्गदर्शक मानते हों, पर चीन उन्हें देशद्रोही मानता है। मगर दुनिया चीन की प्रतिक्रिया पर नहीं, दलाई लामा के कथन पर विश्वास कर रही है। निर्वासित तिब्बती समुदाय अभी तक दलाई लामा को छोड़कर किसी अन्य को अपना नेता मानने का मन नहीं बना पाया है।
10 मार्च, 1959 को ल्हासा से भारत आए दलाई लामा का भारत में निर्वासन का यह 52वां वर्ष है। उनकी राजनीतिक निवृत्ति की घोषणा पर निर्वासित तिब्बती सरकार के प्रधानमंत्री सामदोंग रिनपोचे ने कहा कि दलाई लामा के अनुरोध के बावजूद तिब्बती एवं निर्वासित सरकार उनके बिना अपना नेतृत्व स्वयं करने में खुद को सक्षम नहीं मानती। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि तिब्बती सरकार को लोगों की आकांक्षाओं एवं उनकी चाहत को समायोजित करने के लिए नए रास्ते ढूंढने होंगे। दलाई लामा को जानने वाले जानते हैं कि ऐसा नहीं है। वह उम्र के ऐसे पड़ाव पर हैं, जहां विश्व समुदाय की दृष्टि में मान्य परंपरा की स्थापना न करना तिब्बती समुदाय के लिए ही घातक होगा। अपने संदेश में उन्होंने कहा, ‘तिब्बतियों को एक ऐसा नेता चाहिए, जो लोगों द्वारा स्वतंत्र रूप से निर्वाचित हो, जिसे मैं अपना अधिकार हस्तांतरित कर सकूं।’
पिछले कुछ वर्षों से वह अपने उत्तराधिकारियों के बारे में लगातार कोई न कोई वक्तव्य देते रहे हैं। वह तिब्बतियों के धार्मिक एवं राजनीतिक प्रमुख हैं। किंतु चीनी नेतृत्व उनके दोनों उत्तराधिकारियों का निर्णय सूत्र अपने हाथों में लेने की कोशिश करता रहा है। जब 1995 में उन्होंने 11वें पंचेन लामा का चयन किया, तो उसके पीछे सोच यही थी कि दलाई लामा के अगले अवतार के चयन में उनकी मुख्य भूमिका होगी। चीन ने इस पंचेन लामा को ही गायब कर दिया और एक दूसरा पंचेन लामा खड़ा कर दिया। उसके माध्यम से चीन दलाई लामा के नए अवतार के रूप में किसी को भी सामने ला सकता है। निश्चय ही उससे तिब्बती मुक्ति आंदोलन को धक्का लगेगा। दलाई लामा को इसका एहसास है, इसलिए वह समय पूर्व समाधान कर देना चाहते हैं।
इसके बारे में उन्होंने अब तक जो कुछ कहा, उसमें तीन बातें शामिल हैं। एक, या तो दलाई लामा का पद समाप्त कर दिया जाए। दो, वह अपने जीवन काल में ही उत्तराधिकारी का चयन कर लें और तीन, तिब्बती अपने अगले नेता का लोकतांत्रिक प्रणाली से निर्वाचन कर लें। पहला विकल्प संभव नहीं। इसलिए आगे उन्होंने अपने धार्मिक उत्तराधिकारी के चयन का भी वक्तव्य दिया। 2007 में पहली बार उन्होंने कहा कि पुनर्जन्म के बजाय वह स्वयं अपने उत्तराधिकारी का चयन कर देंगे। वर्तमान घोषणा से उन्होंने राजनीतिक उत्तराधिकारी के चयन की पहल कर दी है। आज के समय में निर्वाचित प्रतिनिधि के अलावा किसी अन्य को राजनीतिक नेतृत्व सौंपने पर सामान्यत: सहमति नहीं हो सकती है। चूंकि दलाई लामा का व्यक्तित्व बड़ा है, इसलिए दुनिया ने उन पर सवाल नहीं उठाया, लेकिन आगे उठ सकता है। इसलिए सोच-समझकर दलाई लामा ने यह निर्णय लिया है।
दलाई लामा भी जानते हैं कि यह आसान नहीं होगा, इसलिए उन्होंने काफी समय पूर्व से ऐसी घोषणा शुरू कर दी थी। तिब्बतियों के कई सम्मेलनों में उन्होंने कहा कि लोगों को अपने भविष्य का नियंत्रण अपने हाथों में लेना चाहिए। मगर तिब्बतियों के एक बड़े वर्ग में यह भय भी है कि इससे तिब्बत मुक्ति आंदोलन हिंसक मोड़ ले सकता है। दलाई लामा का सक्रिय नेतृत्व तिब्बतियों के लिए आचरण की सबसे बड़ी कसौटी है। पर तिब्बतियों के लिए भी अधिकार हस्तांतरण की प्रक्रिया को ज्यादा दिनों तक टालना ठीक नहीं होगा। दलाई लामा की जिंदगी में ही अगर ऐसा हो जाए, तो उसे आम तिब्बतियों को स्वीकार कराना ज्यादा आसान होगा। भारत के लिए भी उनके दोनों उत्तराधिकारियों का निर्णय जल्द हो जाना अच्छा है। केंद्र सरकार को उनके दोनों उत्तराधिकारियों के निर्णय के लिए पहल करनी चाहिए। हालांकि चीन कभी इसे स्वीकार नहीं करेगा, इसलिए उसके वक्तव्य का कोई मतलब नहीं है।
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