Wednesday, March 23, 2011

अफगानिस्तान में शांति पहल


अफ-पाक के संयुक्त बयान पर लेखक की टिप्पणी
इस्लामाबाद की अपनी यात्रा के बाद अफगानिस्तान के विदेशमंत्री जिलमई रसूल ने दावा किया कि दोनों देशों के संबंधों में सुधार हुआ है। अगर इस बात में सच्चाई है तो इसका मुख्य कारण यह है कि राष्ट्रपति हामिद करजई पाकिस्तान को यह समझाने में कामयाब रहे हैं कि अफगानिस्तान के भविष्य के बारे में पत्ते बांटने का जो हाई-प्रोफाइल प्रयास हो रहा है उससे नुकसान ही होगा, क्योंकि दुनिया को संदेश यही मिल रहा है कि अफगानिस्तान की नियति का फैसला अफगानी करेंगे, पाकिस्तान नहीं। यह संदेश पाकिस्तान के राजनीतिक नेतृत्व तक पहंुच गया है। यह तब और स्पष्ट हो गया जब रसूल की मुलाकात के दौरान राष्ट्रपति जरदारी ने उन्हें पाकिस्तानी तटस्थता और अहस्तक्षेप का आश्वासन दिया। मात्र आधे घंटे में तैयार संयुक्त वक्तव्य के ये शब्द बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। अगर इनके छुपे मतलब को देखा जाए तो दशकों से अफगानिस्तान में किए जा रहे पाक हस्तक्षेप की निंदा की गई है। यह आश्वासन इतनी आसानी से दे दिया गया है कि संदेह होता है कि क्या पाकिस्तान इस पर अमल करना चाहता भी है या नहीं। पाकिस्तान अफगानिस्तान क्षेत्र में आतंक के खिलाफ लड़ाई का काफी शोर मचा रहा है और उसने आतंकवाद के सफाए के लिए दो स्तरों वाले एक संयुक्त आयोग के गठन पर भी सहमति जताई है, लेकिन सामरिक पैठ के बारे में पाकिस्तान की सोच और शांति की अफगानी चाहत के बीच एक बड़ा फासला है। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और नवाज शरीफ की पाकिस्तान मुस्लिम लीग के पूर्ण समर्थन से पाकिस्तान के सैन्य तंत्र ने अपने पड़ोसी देशों खास तौर से भारत और अफगानिस्तान में और कुछ हद तक शिया ईरान में अस्थिरता फैलाने के लिए आतंक की रणनीति में माहिर जिहादियों का इस्तेमाल किया है। पाक सेना जोर देकर कहती रही है कि भारत के खिलाफ किसी बड़ी लड़ाई की स्थिति में लश्करेतैयबा और यूनाइटेड जिहाद काउंसिल जैसे संगठन उसके अनियमित लड़ाकू दस्तों के रूप में लड़ेंगे। अफगानिस्तान में यही हो भी रहा है जहां आइएसआइ के इशारों पर सीमा पर और अफगानिस्तान के भीतर तालिबान से जुड़े नेटवर्क आपरेट कर रहे हैं। पाकिस्तान सिराजुद्दीन हक्कानी और गुलबुद्दीन हिकमतयार जैसे रसूखदार पश्तून कबाइली नेताओं के जरिये अपने पत्ते खेल रहा है। बड़ी संख्या में इन दोनों के लड़ाकुओं को आइएसआइ से ट्रेनिंग मिली है। युद्घ से तबाह अफगानिस्तान की संभावित भावी सरकार में अपने प्रभुत्व की पाकिस्तानी जिद के बारे में मतभेद उस समय उभर कर सामने आया जब तालिबान सहित विपक्ष से बातचीत के लिए काबुल द्वारा रखी गई शर्तो के बारे में विदेशमंत्री रसूल ने कहा कि उन्हें संविधान का भी आदर करना चाहिए, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और महिलाओं के अधिकारों में विश्वास रखना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि जो लड़ाकू किसी भी आतंकवादी समूह से जुड़े नही हैं वे शांति प्रक्रिया का हिस्सा बन सकते हैं। रसूल ने अफगानिस्तान में शांति स्थापित करने में पाकिस्तान की अहम भूमिका को भी स्वीकार किया। संयुक्त बयान में पाकिस्तान इस प्रकार की भाषा के लिए राजी कैसे हो गया। स्पष्ट है कि पाकिस्तान को अपने अतीत के भूत को उतारने और मौजूदा हकीकत को समझने की जरूरत समझ आने लगी है, जिनमें से एक हकीकत यह है कि वह आज अपने ही कर्मो के आतंकवादी दलदल में फंसने वाला एक नाकाम देश बन गया है। निष्कर्ष यही निकलता कि जिस सहजता से संयुक्त बयान में पाकिस्तान की तटस्थता और अहस्तक्षेप जैसे शब्दों का इस्तेमाल और स्वीकारोक्ति की गई है वह उन अनुभवों से भिन्न नहीं हैं जो तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की लाहौर की बस यात्रा के दौरान भारत के साथ दोहराया गया था। इस पहल के फौरन बाद कारगिल हमला सामने आया था। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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