Tuesday, March 1, 2011

तानाशाही के घुटने टेकने का दौर


काहिरा के ओरुबा महल से हुस्नी मुबारक का निकल भागना उन लोगों के लिए ताज्जुब की बात नहीं थी, जो अमेरिका, मिस्र और इस्राइल जैसी तीन बड़ी ताकतों के संबंधों से वाकिफ हैं। अरब विश्व के समीकरण अब यूरोप-अमेरिका से पहले जैसे नहीं रहे। दरअसल पहले 1991 और फिर 2003 में इराक पर हमले में एंग्लो-अमेरिकी धड़े का सहयोग करना अरब नेताओं की भयंकर भूल थी। जिस शासक ने एंग्लो-अमेरिकी धड़े के आगे समर्पण कर दिया, वहां अमेरिका को तानाशाही नजर नहीं आई। पर आज पूरे विश्व को मिस्र, लीबिया, ट्यूनीशिया, बहरीन और यमन में तानाशाही दिखाई दे रही है। अमेरिका, ब्रिटेन तथा बाकी यूरोपीय देशों को अरब तेल और पानी में ही दिलचस्पी थी, न कि इन देशों में लोकतंत्र स्थापित करने में।
वर्ष 1981 से 2005 तक प्राय: 25 वर्षों तक हुस्नी मुबारक एंग्लो-अमेरिकी धड़े के बड़े दोस्त बने रहे। लेकिन जब अमेरिकियों ने फलस्तीन के बंटवारे और गाजा पट्टी पर इस्राइल के हमले में सहयोग दिया, तो वह भी सचेत हो गए। मुबारक फलस्तीन पर नई अमेरिकी नीति से खुश नहीं थे। अमेरिका की भी मुबारक में भरोसे में कमी तब उजागर हो गई, जब काहिरा विश्वविद्यालय में राष्ट्रपति ओबामा ने एक उच्च स्तरीय गोष्ठी में उनका नाम तक नहीं लिया। अमेरिका मिस्र में ऐसी सरकार चाहता था, जो खासकर इस्राइल और फलस्तीन के मामले में महाशक्ति देश की नीतियों से सहमत हो। इस्राइली नेतृत्व खासकर प्रधानमंत्री नेतनयाहू इस्राइल की सीमाओं को बढ़ाकर और पुरानी योजनाओं पर अमल करके एक बृहत्तर इस्राइल स्थापित करना चाहते थे।
मिस्र में हाल की घटनाओं से लगता है कि क्रांति लोकप्रिय, शांतिपूर्ण और अनुशासित हो सकती है। विश्व अब भी मिस्र में लोकतंत्र की प्रतीक्षा में है, जब सेना सत्ता त्याग देगी। एक अहिंसक क्रांति ने मिस्र के राष्ट्रपति को तो जरूर हटा दिया है, लेकिन वहां के आठ करोड़ लोग जिस लोकतंत्र का बेताबी से इंतजार कर रहे हैं, वह कब आएगा, यह तो समय ही बताएगा।
इसमें कोई हैरानी की बात नहीं कि क्रांति की लहर पूरी अरब दुनिया में फैल चुकी है और लीबिया, ट्यूनीशिया और अरब खाड़ी के सभी देश इस बदलाव की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं, जिनमें राजशाही, सुल्तानशाही, शेखशाही और तानाशाही वाले देश भी शामिल हैं। लीबिया के तानाशाह कर्नल गद्दाफी पिछले 42 वर्षों से बिना किसी संसद के अपना शासन चला रहे हैं। अपनी ग्रीन बुकमें उन्होंने स्वयं भविष्यवाणी की है कि जब-जब लोगों के शोषण की सीमा पार कर जाती है और हुक्मरान टोला उनके घावों पर मरहम लगाने में नाकाम होता है, तो उसका परिणाम भयंकर होता है और ऐसे शासन का अंत भी स्वाभाविक है।
आज यह भविष्यवाणी खुद गद्दाफी के बारे में भी सच साबित होने जा रही है। लगभग 56 लाख की आबादी वाला यह देश समूल क्रांति के लिए तैयार है। यही हालत खाड़ी देशों की है। बहरीन और सऊदी अरब के तानाशाहों को अपने भविष्य के बारे सोचना जरूरी हो गया है।
मानवाधिकार सजग इस दौर में यह संभव नहीं है कि औरतों को पत्थर मार-मारकर मौत के घाट उतार दिया जाए या मामूली से अपराध के लिए लोगों के हाथ-पांव काट दिए जाएं। तब तो यह और भी संभव नहीं, जब इन देशों के 70 से 80 प्रतिशत तक लोग शिक्षित हो चुके हैं। इसके अतिरिक्त वैश्विक सूचना तंत्र ने तो दुनिया भर की तमाम घटनाओं के बारे में अद्भुत सोच पैदा कर दी है। अब इन तानाशाहों के लोकतंत्र की मर्यादा में ढलने का समय आ गया है। उन्हें चाहिए कि वे भारतीय लोकतंत्र को अपने देशों के लिए आदर्श बनाएं और देश के संविधान में परिवर्तन कर इस आदर्श को अपनाएं।
जाहिर है, 21वीं सदी में किसी एक व्यक्ति का शासन लोगों को स्वीकार नहीं हो सकता। अत: अरब देशों के बाद अफ्रीका के उन देशों की बारी है, जहां के लोगों का शोषण इस युग में भी चरम सीमा पर हो रहा है। इन शासकों को भी तत्काल प्रभाव से अपने यहां लोकतंत्र की वापसी के लिए राह प्रशस्त करनी चाहिए। इससे वे स्वयं को तो राजनीतिक तौर पर सुरक्षित रख ही सकते हैं, अपने देश को भी आंतरिक-बाह्य खतरों से बचा सकते हैं। आज भारत के सामने स्वर्णिम अवसर है कि वह संसदीय लोकतंत्र की रोशनी से दुनिया भर को रास्ता दिखाने का काम करे।

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