महाशक्ति देश ने हमारे यहां प्रभावशाली हैसियत हासिल कर ली है
भारत से भेजे गए अमेरिका के गोपनीय कूटनीतिक तार संदेशों ने एक ही झटके में उजागर कर दिया कि संप्रग और उससे पहले राजग सरकार के कार्यकाल में अमेरिका और भारत के बीच जो रिश्ता कायम हुआ, उसकी प्रकृति क्या है। अब तक सामने आए संदेशों से साफ जाहिर होता है कि अमेरिका ने हमारे देश में बहुत ही प्रभावशाली हैसियत हासिल कर ली है और इसमें रणनीतिक मामले, विदेश नीति और आर्थिक नीति, सभी कुछ शामिल हैं।
याद करना चाहिए कि अपने पहले कार्यकाल में मनमोहन सिंह की सरकार न्यूनतम साझा कार्यक्रम के अपने इस वायदे से मुकर गई थी कि वह एक स्वतंत्र विदेश नीति पर चलेगी। विदेश नीति में बदलाव को किस तरह अंजाम दिया गया, इसे विकिलीक्स द्वारा उजागर किए गए अनेक संदेश स्पष्ट करते हैं। सितंबर, 2005 में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी में ईरान के खिलाफ मतदान करने की मनमोहन सरकार की पलटी ऐसा ही एक उदाहरण थी। इस मामले में अमेरिका ने भारत पर अधिकतम दबाव बनाया था। यह धमकी तक दी गई थी कि अगर भारत ने ईरान के खिलाफ रुख नहीं अपनाया, तो अमेरिकी संसद परमाणु सौदे के अनुमोदन के लिए विधेयक कभी भी पारित नहीं करेगी।
जिस दूसरे क्षेत्र में अमेरिका का प्रभाव उल्लेखनीय तरीके से बढ़ा है, वह सैन्य और रक्षा सहयोग का क्षेत्र है। यूपीए सरकार ने जून, 2005 में अमेरिका के साथ रक्षा सहयोग समझौते पर दस्तखत किए थे। भारत द्वारा किसी देश के साथ किया गया इस तरह का यह पहला समझौता था। विकिलीक्स के जरिये सामने आए संदेशों से स्पष्ट हो जाता है कि अमेरिकी सरकार तथा पेंटागन द्वारा इस तरह के समझौते की तैयारियां तथा इसके लिए बातचीत राजग सरकार के समय से ही चल रही थीं।
ये गोपनीय संदेश यह भी दिखाते हैं कि किस तरह दोनों देशों के सुरक्षा प्रतिष्ठानों के बीच तालमेल बढ़ता गया है और यह प्रक्रिया मुंबई पर आतंकवादी हमले के बाद उच्च स्तर पर सहयोग के स्तर तक पहुंच गई है। दिवंगत राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम के नारायणन के संबंध में अमेरिकियों की राय थी कि वह बहुत दूर तक सुरक्षा सहयोग स्थापित करने के लिए तैयार थे, जिसमें एफबीआई तथा सीआईए जैसी एजेंसियों के साथ सहयोग भी शामिल था।
ये कूटनीतिक संदेश यह भी दिखाते हैं कि किस तरह अमेरिकी हमारे देश के खुफिया और सुरक्षा तंत्रों में घुसपैठ करने में कामयाब हुए। दोनों देशों की खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों के बीच सहयोग के कारण अमेरिका की घुसपैठ पहले ही हो चुकी है। जासूसी के दो मामले तो अब तक सामने भी आ चुके हैं। राजग के कार्यकाल में रॉ के अधिकारी रबिंदर सिंह को सीआईए ने अपना एजेंट बना लिया था। संप्रग सरकार के दौर में भी राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के दफ्तर में एक सिस्टम एनलिस्ट के सीआईए में शामिल हो जाने का राज खुला था।
अमेरिका को भारत में किस तरह भारी राजनीतिक प्रभाव हासिल है, यह 2006 में मंत्रिमंडल विस्तार से संबंधित एक और गोपनीय कूटनीतिक संदेश से स्पष्ट हो जाता है। अमेरिकी राजदूत ने मंत्रिमंडल में फेरबदल का जो आकलन अमेरिका भेजा था, उसमें कहा गया था : ‘बहरहाल, इस उलटफेर का कुल नतीजा एक ऐसी कैबिनेट है, जो भारत में (और ईरान में) अमेरिकी लक्ष्यों के लिए बेहतरीन होगी।’ उक्त गोपनीय रिपोर्ट में दर्ज किया गया कि पुख्ता अमेरिका परस्त पांच लोगों को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया।
मनमोहन सिंह के निजाम में अमेरिकियों को सरकार के हरेक क्षेत्र में घुसपैठ करने की खुली छूट दे दी गई है। लिहाजा इन मौकों का फायदा उठाने के लिए अमेरिकियों को दोष देने का कोई फायदा नहीं है। आखिरकार, संप्रग सरकार ने ही तो 2007 में यह फैसला लिया था कि आईएएस अधिकारियों के लिए अपने करियर के बीच में अमेरिकी विश्वविद्यालयों में प्रशिक्षण हासिल करना अनिवार्य कर दिया जाए। चाहे वे प्रशासनिक अधिकारी हों या सेनाधिकारी, तरक्की का एक ही रास्ता है : अमेरिका में प्रशिक्षण हासिल करें।
ये गोपनीय कूटनीतिक संदेश यह दिखाते हैं कि भारत की राजनीतिक व्यवस्था में उच्च स्तर पर जो भ्रष्टाचार चल रहा है, अमेरिकी उस पर पैनी नजर रखते हैं। यह स्वाभाविक ही है कि उस गोपनीय संदेश से हंगामा खड़ा हो गया है, जिसमें भारत में अमेरिकी दूतावास से यह खबर दी गई थी कि जुलाई, 2008 में हुए विश्वास मत के लिए विपक्षी सांसदों की खरीद-फरोख्त के लिए भारी मात्रा में पैसा जमा कर रखा गया था। इसी प्रकार चेन्नई स्थित अमेरिकी वाणिज्य दूतावास के एक संदेश में इसका विस्तृत ब्योरा दिया गया है कि द्रमुक किस तरह मतदाताओं में पैसे बांटता है। इस तरह की जानकारियों के बूते अमेरिकी भ्रष्ट राजनेताओं को सही-सही तोल सकते हैं और यह भी समझ सकते हैं कि अपने काम के लिए उन्हें कैसे खरीदा जा सकता है।
परमाणु सौदे से पहले तक के तथा इस पर छिड़े राजनीतिक संघर्ष से संबंधित गोपनीय दस्तावेज दिखाते हैं कि इस सौदे को अंजाम तक पहुंचाने में अमेरिका की ही सर्वाधिक दिलचस्पी थी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तथा उनके इर्द-गिर्द जमा अधिकारीगण वास्तव में अमेरिकी हितों को ही आगे बढ़ा रहे थे। जाहिर है कि अमेरिका सिर्फ परमाणु रिएक्टरों की बिक्री से मिलने वाले चंद अरब डॉलर के व्यापारिक फायदे के पीछे ही नहीं लगा था, बल्कि उसकी मंशा भारत को एक रणनीतिक सहयोगी के रूप में अपने बगल में खड़ा करने की भी थी। विकिलीक्स के इन संदेशों से पता चलता है कि मनमोहन सिंह की सरकार और कांग्रेस ने इस देश को कैसे रसातल में पहुंचा दिया है।
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